मल्हार अध्याय 6 पंक्तियों पर चर्चा

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें पढ़कर समझिए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? कक्षा में अपने विचार साझा कीजिए और लिखिए। (क) “यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं, तो मैं भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निर्वाह करता।”
उत्तर

पहले कठिन शब्द — अति साधारण = बिल्कुल मामूली; भाँति = तरह; संसार-चक्र = दुनियादारी का चक्कर — कमाना, खाना, गृहस्थी चलाना और इसी में उम्र बिता देना; जीवन निर्वाह करता = बस जीवन काट देता।

सीधा अर्थ — बिस्मिल कहते हैं कि अगर मुझे ऐसी माँ न मिली होतीं, तो मैं भी बाक़ी मामूली लोगों की तरह दुनियादारी के चक्कर में फँसकर बस अपनी ज़िंदगी काट देता। कोई बड़ा काम, कोई देश-सेवा मुझसे न हो पाती।

भाव — इस एक वाक्य में बिस्मिल अपनी सारी उपलब्धि माँ के नाम कर देते हैं। वे यह नहीं कहते कि “मैं जन्म से ही वीर था”; वे कहते हैं कि मुझे साधारण से असाधारण मेरी माँ ने बनाया। यही बात वे पाठ में पहले भी कह चुके हैं — “मुझमें जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही परिणाम है।”

‘संसार-चक्र’ शब्द पर ध्यान दीजिए: बिस्मिल ने ‘संसार’ नहीं, ‘संसार-चक्र’ लिखा है। चक्र यानी पहिया — जो गोल-गोल घूमता रहता है और वहीं का वहीं रहता है। यानी बिना किसी बड़े उद्देश्य के जिया गया जीवन आगे नहीं बढ़ता, बस घूमता रहता है। इस एक शब्द से पूरी बात चित्र बन जाती है — यही अच्छे लेखन की पहचान है।
अपने जीवन से जोड़िए: सोचिए, आपके जीवन में वह कौन है जिसने आपकी सोच को कोई नई दिशा दी — माँ, पिता, दादी, कोई शिक्षक या कोई पुस्तक? दो-तीन वाक्यों में लिखिए कि उनके बिना आप आज क्या कर रहे होते। बिस्मिल ने ठीक यही किया है।
प्र2.
(ख) “उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मज़बूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी।”
उत्तर

पहले संदर्भ — ‘इस आदेश’ का अर्थ है माँ का वह सबसे बड़ा आदेश — “किसी की प्राणहानि न हो… अपने शत्रु को भी कभी प्राणदंड न देना।”

सीधा अर्थ — बिस्मिल कहते हैं कि माँ के इस आदेश को निभाने के लिए मुझे मजबूरी में एक-दो बार अपनी ली हुई प्रतिज्ञा तोड़नी पड़ी।

भाव — बिस्मिल क्रांतिकारी दल के सदस्य थे। दल में शामिल होते समय हर सदस्य कुछ प्रतिज्ञाएँ लेता है — दल के निर्णय का पालन करना, सौंपा गया काम पूरा करना। कई बार दल का निर्णय ऐसा रहा होगा जिसमें किसी की जान जाती। तब बिस्मिल के सामने दो कर्तव्य आमने-सामने आ खड़े हुए — दल की प्रतिज्ञा और माँ का आदेश। उन्होंने माँ के आदेश को ऊपर रखा और अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी।

दो कर्तव्य आमने-सामनेबिस्मिल ने क्या चुनाइससे क्या पता चलता है
क्रांतिकारी दल की प्रतिज्ञा — दल के निर्णय का पालनछोड़ दीप्रतिज्ञा तोड़ना उनके लिए आसान नहीं था; इसीलिए वे ‘मज़बूरन’ शब्द लिखते हैं।
माँ का आदेश — किसी की प्राणहानि न होनिभायामाँ की बात उनके लिए दल के अनुशासन से भी ऊपर थी।
यह पंक्ति इतनी बड़ी क्यों है: एक क्रांतिकारी के लिए प्रतिज्ञा तोड़ना बहुत बड़ी बात है — उसमें साथियों की नज़रों में गिरने का ख़तरा रहता है। फिर भी बिस्मिल ने वह जोखिम उठाया, क्योंकि उन्हें माँ की सिखाई यह बात ज़्यादा सच्ची लगी कि लड़ाई अन्याय से है, मनुष्य के प्राणों से नहीं। इसी एक वाक्य से हमें बिस्मिल के भीतर का वह व्यक्ति दिखता है जो बंदूक उठाकर भी हिंसा से बचना चाहता था।
चर्चा के लिए: कक्षा में यह प्रश्न रखिए — “क्या प्रतिज्ञा तोड़ना हमेशा ग़लत है?” अपने उत्तर के साथ एक कारण अवश्य दीजिए। ऐसे प्रश्नों में दोनों पक्ष सुनने पर ही बात पूरी होती है।
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