प्र1.
आप पुस्तकालय से रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ की आत्मकथा खोजकर पढ़िए।
उत्तर
यह पढ़ने की गतिविधि है। नीचे बताया गया है कि यह आत्मकथा है क्या और उसे कैसे खोजें-पढ़ें।
पुस्तक के बारे में — बिस्मिल ने यह आत्मकथा गोरखपुर जेल में, फाँसी के कुछ ही दिन पहले, चोरी-छिपे लिखी थी और पन्ने छिपाकर बाहर भिजवाए थे। साथियों ने इसे छपवाया और नाम रखा — ‘निज जीवन की एक छटा’। यही बात पाठ के आरंभ में भी दी गई है। आज यह अनेक प्रकाशकों से ‘आत्मकथा — रामप्रसाद बिस्मिल’, ‘क्रांति गाथा’ आदि नामों से मिलती है।
कैसे खोजें —
- पुस्तकालय में: ‘जीवनी / आत्मकथा’ वाले खाने में देखिए, या पुस्तकालयाध्यक्ष से कहिए — “रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा चाहिए।”
- इंटरनेट पर: सरकारी डिजिटल पुस्तकालय (जैसे National Digital Library of India) और अभिलेखागार की वेबसाइटें देखिए। बहुत पुरानी पुस्तकें वहाँ मुफ़्त पढ़ने को मिल जाती हैं।
- सावधानी: इंटरनेट पर बिस्मिल के नाम से बहुत-सी बातें और शेर चढ़े रहते हैं जो उनके हैं ही नहीं। जो पढ़ें, उसका स्रोत देख लीजिए और शिक्षक से जँचवा लीजिए।
पढ़ते समय यह तालिका भरते चलिए —
| क्या नोट करें | उदाहरण (‘मेरी माँ’ अंश से) |
|---|---|
| कोई एक घटना | वकालतनामे पर पिताजी के हस्ताक्षर करने से मना कर देना |
| कोई एक पंक्ति जो दिल को छू गई | “तुम्हारी दया की छाया में मैंने अपने जीवन भर में कोई कष्ट अनुभव न किया।” |
| कोई नया शब्द | उऋण, अवर्णनीय, ताड़ना |
| अपना एक प्रश्न | फाँसी के इतने पास होकर भी वे इतने शांत कैसे लिख सके? |
ध्यान रहे: आत्मकथा का यह पाठ जितना कोमल है, पुस्तक के दूसरे हिस्से उतने ही कठोर हैं — उनमें जेल, मुकदमे और फाँसी की बातें हैं। पढ़ते समय जो समझ न आए, उसे शिक्षक या घर के बड़ों से पूछ लीजिए।