ऊपर दिए गए साइबर अपराधियों के मामले में सरकार के तीनों अंग किस प्रकार कार्य करते हैं, वर्णन कीजिए। वे हस्तक्षेप कैसे करते हैं?
उत्तर
तीनों अंग अलग-अलग समय पर आते हैं, और कोई भी अकेला यह काम पूरा नहीं कर सकता। अध्याय का उदाहरण यह है कि डिजिटल लेन-देन ने एक नए प्रकार की चोरी संभव बना दी, जिसमें अपराधी “अपने स्थान पर बैठे-बैठे” लोगों का धन चुरा लेते हैं।
अंग
कब हस्तक्षेप करता है
इस मामले में ठीक-ठीक क्या करता है
विधायिका (कानून बनाती है)
सबसे पहले — किसी गिरफ़्तारी से भी पहले
पुराने कानून उस चोरी के लिए बने थे जो दिखाई देती है। इसलिए विधायिका साइबर अपराध के विरुद्ध नए कानून बनाती है — अध्याय के शब्दों में, “ऐसी आपराधिक गतिविधियों… को रोकने के लिए अनेक सरकारों ने नए कानून बनाए हैं”। वह अपराध की परिभाषा और दंड तय करती है और नए तरीके सामने आने पर कानून में संशोधन भी करती है
कार्यपालिका (कानून लागू करती है)
उसके बाद — जब अपराध वास्तव में हो जाता है
सरकार साइबर पुलिस बनाती और उसका खर्च उठाती है — इस अभिकरण का नाम अध्याय स्वयं लेता है। वह शिकायत लेती है, डिजिटल सुराग खोजती है, खाते रुकवाती है, साक्ष्य जुटाती है और अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करती है। मंत्री और विभाग नीति, प्रशिक्षण तथा साइबर सुरक्षा के नियम तय करते हैं
न्यायपालिका (निर्णय करती है)
अंत में — जब अभियुक्त न्यायालय के सामने आता है
न्यायालय दोनों पक्षों को सुनकर तय करता है “कि क्या किसी ने कानून तोड़ा है और यदि तोड़ा है, तो उस पर क्या कार्रवाई की जाए”। परिणाम भी अध्याय बताता है — ऐसे अपराधियों “को गिरफ्तार भी किया गया है एवं न्यायालय द्वारा उन्हें दोषी ठहराया गया है। सामान्यत: उन्हें आर्थिक दंड के साथ-साथ जेल की सजा भी दी जाती है।” न्यायालय यह भी परख सकता है कि नया कानून सभी के हित में है या नहीं
एक ही मामला, तीन अंग, क्रम से — पहले कानून बनता है, फिर लागू होता है, फिर न्यायालय उसे लागू करता है; तभी लोगों को वास्तविक सुरक्षा मिलती है।
तीनों क्यों चाहिए: किसी एक को हटा दीजिए, मामला वहीं बिखर जाएगा। विधायिका न हो तो कानून ही नहीं, और जो अपराध ही नहीं है उसके लिए पुलिस किसी को पकड़ नहीं सकती। कार्यपालिका न हो तो कानून किताब में धरा रह जाएगा, क्योंकि जाँच और गिरफ़्तारी कोई करेगा ही नहीं। न्यायपालिका न हो तो अपराध तय करने का काम पुलिस स्वयं करने लगेगी और निर्दोष व्यक्ति के पास जाने के लिए कोई जगह नहीं बचेगी। इसीलिए चित्र 10.3 तीनों को एक ही वृत्त के अलग-अलग भागों के रूप में दिखाता है, बीच में तीर के साथ — पृथक, फिर भी साथ-साथ।
क्या आप जानते हैं? अध्याय बताता है कि ‘मनी ऑर्डर’ और ‘डिमांड ड्राफ्ट’ जैसे शब्द आपने शायद सुने भी न हों — तीस वर्ष पहले पैसा भेजने का अर्थ था फ़ॉर्म, पंक्ति और कई दिनों की प्रतीक्षा। नई तकनीक नई सुविधा लाई, फिर नया अपराध, और फिर नया कानून। यही क्रम बताता है कि विधायिका को “पुराने कानूनों में संशोधन तथा वर्तमान कानून को निरस्त” करने की शक्ति क्यों चाहिए।
क्या यह उपयोगी रहा?प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद!त्रुटि बताएँ