यदि एक ही समूह नियम बनाए, उन्हें लागू करे और विवादों का निर्णय भी करे, तो गलती होने पर उसे सुधारने वाला कोई नहीं बचेगा। अध्याय पृथक्करण का उद्देश्य स्पष्ट बताता है — “इसका उद्देश्य पूरी प्रणाली को नियंत्रित करना एवं संतुलन बनाए रखना है, अर्थात सरकार का प्रत्येक अंग दूसरे अंग के कार्यों की निगरानी कर सकता है तथा यदि कोई अंग अपनी अपेक्षित भूमिका से परे जाकर कार्य कर रहा है, तो उसे नियंत्रित कर पुन: संतुलन स्थापित कर सकता है।”
कक्षा की गतिविधि कैसे कीजिए। कक्षा को तीन समूहों में बाँटिए — विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका — और उन्हें एक छोटा-सा विवाद दीजिए (जैसे, मध्यावकाश में खेल का मैदान किसे मिलेगा)। इसे दो बार खेलिए: पहले तीनों समूह अलग-अलग, फिर तीनों भूमिकाएँ एक ही समूह को देकर। फिर लिखिए कि क्या बदला।
| क्या बिगड़ेगा | क्यों |
|---|---|
| नियम बनाने वालों के अनुकूल नियम | जो समूह नियम भी लिखे और उसी पर निर्णय भी दे, उसे अपने पक्ष में नियम लिखने से कोई रोकेगा नहीं |
| निष्पक्ष सुनवाई नहीं | जो आप पर आरोप लगा रहा है, वही यह भी तय करेगा कि आप दोषी हैं या नहीं। निर्दोष होना भी काम नहीं आएगा |
| शिकायत कहीं नहीं पहुँचेगी | कार्यपालिका गलत करे तो अध्याय के अनुसार न्यायपालिका “जाँच करती है कि क्या कार्यपालिका द्वारा लिया गया कोई निर्णय ठीक है या नहीं”। यह हट जाए तो शिकायत का कोई पता ही नहीं बचता |
| गलतियाँ कभी नहीं सुधरेंगी | कोई नहीं देखेगा कि कानून “भली-भाँति परखा गया है और सभी के हित में है या नहीं”, इसलिए बुरा कानून सदा बना रहेगा |
| नियम कभी भी बदल जाएँगे | वही समूह आज नियम बनाकर कल किसी विशेष मामले के लिए बदल सकता है। तब कोई किसी बात की योजना नहीं बना सकता |
| लोग भाग लेना छोड़ देंगे | यदि आपके वोट और आपकी बात से कुछ न बदले, तो भागीदारी समाप्त हो जाती है — और उसके साथ आधारभूत लोकतंत्र भी |
वास्तविक जीवन की ऐसी परिस्थितियाँ — इन्हें परिस्थिति के रूप में लिखिए, किसी व्यक्ति या दल पर निर्णय के रूप में नहीं:
- विद्यालय या मोहल्ले में। कल्पना कीजिए कि एक ही व्यक्ति मैदान का समय तय करे, नियम तोड़ने वालों को पकड़े और दंड भी सुनाए, और आगे कहीं अपील न हो। अधिकांश विद्यार्थियों ने इसका छोटा रूप देखा है, और वह हमेशा अन्यायपूर्ण लगता है — तब भी जब वह व्यक्ति सही हो।
- भारत में औपनिवेशिक शासन के समय। भारतीयों के लिए कानून एक ऐसे प्रशासन ने बनाए जिसे भारतीयों ने चुना नहीं था, उन्हीं के अधिकारियों ने उन्हें लागू किया और चुनौती भी उसी सत्ता द्वारा बनाए न्यायालयों में देनी पड़ती थी। ‘अपने कानून हम स्वयं बनाएँगे’ — यह स्वतंत्रता आंदोलन की केंद्रीय माँगों में थी, और इसी कारण हमारे संविधान-निर्माताओं ने तीनों अंगों को इतनी सावधानी से पृथक रखा।
- जहाँ शक्तियों का पृथक्करण नहीं होता। इतिहास बताता है कि जहाँ भी तीनों शक्तियाँ एक ही समूह के पास रही हैं, वहाँ एक ही ढर्रा दोहराया गया — असहमति की आवाज़ दबती है, चुनाव अर्थहीन हो जाते हैं और सामान्य व्यक्ति के पास गलत निर्णय को पलटवाने का कोई रास्ता नहीं रहता।