अन्वेषण अध्याय 11 आइए विचार करें

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
आप ऐसा क्यों सोचते हैं कि सरकार को समाज के वंचित वर्गों की आवश्यकताओं और समस्याओं पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है?
उत्तर

क्योंकि लोकतंत्र की परख इसी से होती है कि जिनके पास सबसे कम शक्ति है, उनकी बात सुनी जाती है या नहीं। पृष्ठ 169 पर पुस्तक नियम इन शब्दों में रखती है — “सभी तीनों स्तरों पर विशेष नियम बनाए गए हैं ताकि जनसमुदाय में से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे वंचित वर्ग के लोगों की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके और उनकी समस्याएँ सुनी जा सकें। इन संस्थाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखने का भी प्रावधान है।”

चार कारण, क्रम से —

कारणगाँव में इसका अर्थ
1. इनकी आवश्यकता सबसे तात्कालिक हैजिस परिवार के पास भूमि और पक्का घर है, वह गाँव के हैंडपंप के बिना भी चल लेगा। भूमिहीन परिवार नहीं। ध्यान वहाँ जाना चाहिए जहाँ आवश्यकता सबसे अधिक है, वहाँ नहीं जहाँ आवाज़ सबसे तेज़ है
2. अन्यथा इनकी बात सुनी ही नहीं जातीबैठक में वही सबसे सहजता से बोलते हैं जिनके पास भूमि, धन या शिक्षा है। नियम न हो तो वही कुछ लोग सब तय करते रहेंगे। वंदना बहादुर मैदा को पहले “गाँव की महिलाओं को सभा की बैठकों में आने के लिए प्रेरित” करना पड़ा, तब उनकी समस्याओं की चर्चा आरंभ हुई
3. समानता संविधान का वचन हैकानून के समक्ष हर नागरिक समान है। परंतु सब समान स्थिति से आरंभ नहीं करते, इसलिए संविधान पिछड़े रह गए वर्गों को आगे लाने के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है
4. लाभ पूरे गाँव को होता हैजो बच्चे विद्यालय में टिके रहें, जो परिवार दूषित जल से बीमार न पड़ें और जिन्हें गाँव में ही काम मिले — इनसे पूरा गाँव सशक्त होता है, केवल वे परिवार नहीं

वंचित वर्ग कौन हैं? मोटे तौर पर वे, जिन्हें ऐसी वंचना मिली जो उन्होंने चुनी नहीं — अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, महिलाएँ, भूमिहीन श्रमिक और अत्यंत निर्धन, दिव्यांगजन, वृद्ध और बच्चे। अध्याय के अपने उदाहरण दिखाते हैं कि नियम काम करते हैं — सोलापुर जिले के तरंगफल गाँव के किन्नर दयानेश्वर कांबले सरपंच चुने गए; भील समुदाय की वंदना बहादुर मैदा खानखांडवी की पहली महिला सरपंच बनीं।

यह किसी के साथ अन्याय क्यों नहीं है: सीटों का आरक्षण किसी और ग्रामवासी से कोई सेवा नहीं छीनता। यह केवल यह बदलता है कि निर्णय के समय कमरे में कौन बैठा है। जिस ग्राम पंचायत में महिलाएँ हैं, वहाँ पेयजल, विद्यालय के शौचालय और स्वास्थ्य की चर्चा अधिक होती है; जिसमें अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्य हैं, वहाँ उस टोले पर ध्यान जाता है जिसकी गली कभी नहीं बनी। पूरी तस्वीर से बेहतर निर्णय निकलते हैं।
क्या आप जानते हैं? 73वें संविधान संशोधन के अनुसार पंचायतों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए सीटें उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षित होती हैं, और कुल सीटों का तथा सरपंच/अध्यक्ष के पदों का कम से कम एक-तिहाई महिलाओं के लिए। अनेक राज्यों ने महिलाओं का यह भाग बढ़ाकर आधा कर दिया है। आरक्षित सीटें एक चुनाव से दूसरे चुनाव में अलग-अलग वार्डों में बदलती रहती हैं, ताकि कोई वार्ड सदा के लिए आरक्षित न रहे।
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