क्योंकि लोकतंत्र की परख इसी से होती है कि जिनके पास सबसे कम शक्ति है, उनकी बात सुनी जाती है या नहीं। पृष्ठ 169 पर पुस्तक नियम इन शब्दों में रखती है — “सभी तीनों स्तरों पर विशेष नियम बनाए गए हैं ताकि जनसमुदाय में से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति जैसे वंचित वर्ग के लोगों की आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके और उनकी समस्याएँ सुनी जा सकें। इन संस्थाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखने का भी प्रावधान है।”
चार कारण, क्रम से —
| कारण | गाँव में इसका अर्थ |
|---|---|
| 1. इनकी आवश्यकता सबसे तात्कालिक है | जिस परिवार के पास भूमि और पक्का घर है, वह गाँव के हैंडपंप के बिना भी चल लेगा। भूमिहीन परिवार नहीं। ध्यान वहाँ जाना चाहिए जहाँ आवश्यकता सबसे अधिक है, वहाँ नहीं जहाँ आवाज़ सबसे तेज़ है |
| 2. अन्यथा इनकी बात सुनी ही नहीं जाती | बैठक में वही सबसे सहजता से बोलते हैं जिनके पास भूमि, धन या शिक्षा है। नियम न हो तो वही कुछ लोग सब तय करते रहेंगे। वंदना बहादुर मैदा को पहले “गाँव की महिलाओं को सभा की बैठकों में आने के लिए प्रेरित” करना पड़ा, तब उनकी समस्याओं की चर्चा आरंभ हुई |
| 3. समानता संविधान का वचन है | कानून के समक्ष हर नागरिक समान है। परंतु सब समान स्थिति से आरंभ नहीं करते, इसलिए संविधान पिछड़े रह गए वर्गों को आगे लाने के लिए विशेष प्रावधानों की अनुमति देता है |
| 4. लाभ पूरे गाँव को होता है | जो बच्चे विद्यालय में टिके रहें, जो परिवार दूषित जल से बीमार न पड़ें और जिन्हें गाँव में ही काम मिले — इनसे पूरा गाँव सशक्त होता है, केवल वे परिवार नहीं |
वंचित वर्ग कौन हैं? मोटे तौर पर वे, जिन्हें ऐसी वंचना मिली जो उन्होंने चुनी नहीं — अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति, महिलाएँ, भूमिहीन श्रमिक और अत्यंत निर्धन, दिव्यांगजन, वृद्ध और बच्चे। अध्याय के अपने उदाहरण दिखाते हैं कि नियम काम करते हैं — सोलापुर जिले के तरंगफल गाँव के किन्नर दयानेश्वर कांबले सरपंच चुने गए; भील समुदाय की वंदना बहादुर मैदा खानखांडवी की पहली महिला सरपंच बनीं।