ये ग्रामीण भारत में स्थानीय स्व-शासन की निर्वाचित संस्थाएँ हैं। पृष्ठ 164 पर पुस्तक के अपने शब्द हैं —
“भारत के प्रत्येक गाँव की भाँति लक्ष्मणपुर के लोगों के पास भी ‘पंचायत’ नामक स्थानीय शासन व्यवस्था है, जिसे एक ग्रामीण परिषद कह सकते हैं… यही कारण है कि पंचायती व्यवस्था, जिसे पंचायती राज के नाम से भी जाना जाता है, स्व-शासन का एक रूप है।”
‘स्व-शासन’ ही मुख्य शब्द है। गाँव के लोगों को दूर बैठा कोई सड़क या विद्यालय केवल देता नहीं — वे स्वयं बैठक करते हैं, निर्णय लेते हैं, अपनी परिषद चुनते हैं और उसे चलाते हैं।
पंचायती राज कोई एक संस्था नहीं, बल्कि एक त्रिस्तरीय व्यवस्था है। पृष्ठ 164 का चित्र 11.1 इसे पिरामिड के रूप में दिखाता है और पाठ इसे “निम्न से उच्च स्तर तक — ग्राम, खंड और जिला” के क्रम में समझाता है।
चित्र 11.1 का पिरामिड, और उसके नीचे ग्राम सभा — मतदाताओं का वह समूह जिस पर यह पूरी व्यवस्था टिकी है।
संक्षेप में —
स्तर
संस्था का नाम
क्षेत्र
ग्राम (आधार)
ग्राम पंचायत, जिसे ग्राम परिषद भी कहते हैं
एक गाँव, या आस-पास के कुछ छोटे गाँव
खंड (मध्य)
पंचायत समिति, जिसे खंड पंचायत या मंडल परिषद भी कहते हैं
एक खंड — जिले के भीतर गाँवों का समूह
जिला (शीर्ष)
जिला परिषद, जिसे जिला पंचायत भी कहते हैं
पूरा जिला
एक ही संस्था के अलग-अलग नाम क्यों: पृष्ठ 170 पर पुस्तक स्वयं बताती है — “पंचायती राज संस्थाओं के गठन और कार्यों में विविधताएँ हो सकती हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि उन संस्थाओं पर राज्यों का अधिकार है।” इसीलिए खंड स्तर की संस्था महाराष्ट्र और राजस्थान में पंचायत समिति है, आंध्र प्रदेश में मंडल परिषद, और कहीं खंड पंचायत। नाम बदलते हैं, विचार नहीं।
क्या आप जानते हैं? पंचायतें भारत में सदियों से रही हैं, परंतु आज का स्वरूप उन्हें 73वें संविधान संशोधन से मिला, जो 1992 में पारित हुआ और 24 अप्रैल 1993 से लागू हुआ — इसीलिए 24 अप्रैल को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस मनाया जाता है। इसने संविधान में एक नया भाग नौ जोड़ा, 20 लाख से अधिक जनसंख्या वाले राज्यों में त्रिस्तरीय व्यवस्था अनिवार्य की, प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल पाँच वर्ष तय किया और चुनाव कराने के लिए स्वतंत्र राज्य निर्वाचन आयोग की व्यवस्था की।
प्र2.
उनके क्या कार्य हैं?
उत्तर
गाँव के दैनिक जीवन को छूने वाला लगभग हर कार्य। पृष्ठ 165 पर पुस्तक एक ही वाक्य में कहती है — “ये संस्थाएँ एक साथ मिलकर कृषि, आवास, सड़कों का रख-रखाव, जल संसाधनों का प्रबंधन, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कल्याण से लेकर सांस्कृतिक गतिविधियों तक जीवन के सभी पक्षों से जुड़े दायित्वों का निर्वहन करती हैं।”
इसे संस्था-दर-संस्था याद करना सबसे सरल है — किसमें कौन होता है और वह क्या करती है।
संस्था
इसमें कौन होता है
यह क्या करती है
ग्राम सभा (ग्राम स्तर)
गाँव (या आस-पास के गाँवों) का प्रत्येक वयस्क जो मतदाता के रूप में नामांकित है — स्त्री और पुरुष दोनों। इसका चुनाव नहीं होता, सदस्यता स्वत: मिलती है
“अपने क्षेत्र से जुड़े सभी मामलों पर विचार-विमर्श” करके निर्णय लेती है; ग्राम पंचायत के सदस्यों को चुनती है; पंचायत ने क्या किया और धन कैसे व्यय हुआ, इसकी जाँच करती है
ग्राम पंचायत (ग्राम स्तर)
ग्राम सभा द्वारा सीधे चुने गए सदस्य, जिनका प्रमुख सरपंच या प्रधान होता है। सहायता के लिए पंचायत सचिव और भारत के कई भागों में पटवारी
गाँव का रोज़ का काम — पेयजल, गाँव की सड़कें और गलियाँ, प्रकाश-व्यवस्था, नालियाँ और सफ़ाई, प्राथमिक विद्यालय का भवन, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता, तालाब और सार्वजनिक भूमि, अभिलेख एवं प्रमाण-पत्र, तथा गाँव तक पहुँचने वाली योजनाओं को लागू करना
पंचायत समिति (खंड स्तर)
स्थानीय लोगों द्वारा चुने गए सदस्य, तथा “क्षेत्र के गाँवों के सरपंच और राज्य विधान सभा के स्थानीय सदस्य जैसे अन्य सदस्य” भी। गठन “राज्य-दर-राज्य भिन्न होता है”
“ग्राम पंचायत और जिला परिषद के बीच की कड़ी।” यह ग्राम पंचायतों के बीच समन्वय करती है — “सभी ग्राम पंचायतों की विकास योजनाएँ एकत्रित करके” आगे भेजती है, और जो कार्य एक गाँव के बस का नहीं (जैसे कई गाँवों को जोड़ने वाली सड़क) उन्हें देखती है
जिला परिषद (जिला स्तर)
जिले के लोगों द्वारा चुने गए सदस्य, तथा पंचायत समितियों के अध्यक्ष और जिले के विधायक एवं सांसद जैसे अन्य सदस्य
पूरे जिले के लिए योजना और निरीक्षण; संयुक्त विकास योजनाओं को “क्रमश: जिला या राज्य स्तर पर” प्रस्तुत करना; इससे “विकासात्मक कार्यों और… प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना जैसी सरकारी योजनाओं के लिए धनराशि के आवंटन में मदद” मिलती है
और धन कहाँ से आता है? पुस्तक धन के आवंटन की चर्चा करती है पर स्रोत नहीं गिनाती, इसलिए वे यहाँ एक साथ दिए जा रहे हैं।
धन का स्रोत
इसका अर्थ
पंचायत की अपनी आय
छोटे कर और शुल्क जो पंचायत ले सकती है — भवन एवं संपत्ति, जल-आपूर्ति, हाट-बाज़ार और मेले, वाहन; तथा पंचायत की भूमि, तालाब और दुकानों से किराया
राज्य सरकार से
अनुदान तथा राज्य के करों में हिस्सा। कितना मिलेगा, यह राज्य वित्त आयोग की संस्तुति पर तय होता है, जिसे राज्य हर पाँच वर्ष में गठित करता है
केंद्र सरकार से
केंद्रीय वित्त आयोग की संस्तुति पर देश की हर पंचायत को मिलने वाला अनुदान — कुछ भाग पंचायत अपनी इच्छा से व्यय कर सकती है, कुछ पेयजल और स्वच्छता के लिए निर्धारित रहता है
योजनाओं का धन
किसी विशेष योजना के साथ आने वाला धन, जो उसी पर व्यय होता है — बारहमासी सड़कों के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, ग्रामीण रोज़गार के लिए मनरेगा, स्वच्छता और पेयजल के अभियान
स्वयं ग्रामवासी
श्रमदान तथा सामग्री या धन का सहयोग। पृष्ठ 166 का हिवरे बाजार इसी का उदाहरण है — “ग्रामवासियों के सहयोग से”
परीक्षा के लिए संकेत: यदि प्रश्न ‘कार्य’ पूछे, तो केवल तीन स्तरों के नाम मत गिनाइए। प्रत्येक स्तर का एक स्पष्ट कार्य बताइए — ग्राम पंचायत: गाँव के काम और सेवाएँ; पंचायत समिति: गाँव और जिले के बीच समन्वय; जिला परिषद: जिला स्तर की योजना और धन का प्रवाह।
प्र3.
शासन और लोकतंत्र में ये क्यों महत्वपूर्ण हैं?
उत्तर
क्योंकि ये निर्णय लेने की जगह को उन्हीं लोगों के पास ले आती हैं जिन पर निर्णय का असर पड़ता है। पृष्ठ 164 का पहला ही वाक्य यही कहता है — पंचायत “शासन को लोगों के समीप लाती है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी संभव बनाती है”।
पाँच कारण, जिनमें से हर एक का आधार अध्याय में है —
ये अध्याय के आरंभिक प्रश्न का उत्तर हैं। लक्ष्मणपुर की समस्याएँ हैं — टूटी सड़क, खेतों का पानी, प्राथमिक विद्यालय। “क्या ऐसी प्रत्येक समस्याओं के लिए गाँव के लोग राज्य या राष्ट्र की राजधानी जा सकते हैं?” नहीं — इसलिए सरकार यहीं, गाँव में होनी चाहिए।
यह ऊपर से चलाया गया प्रशासन नहीं, स्व-शासन है। ग्रामवासी स्वयं परिषद चुनते हैं और ग्राम सभा में उससे प्रश्न पूछ सकते हैं। पंचायत “स्थानीय समस्याओं को हल करने, विकास कार्यों को आगे बढ़ाने और सरकारी योजनाओं के लाभ को जनसाधारण तक पहुँचाने में” महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यहाँ लोकतंत्र के दोनों रूप एक साथ चलते हैं। पुस्तक स्वयं कहती है — “पंचायती राज व्यवस्था में लोकतंत्र जनता द्वारा प्रत्यक्ष भागीदारी और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों, दोनों द्वारा कार्य करता है।” ग्राम सभा प्रत्यक्ष लोकतंत्र है; ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद प्रतिनिधि लोकतंत्र।
ये उन लोगों को सामने लाती हैं जिनकी बात प्राय: नहीं सुनी जाती। “सभी तीनों स्तरों पर विशेष नियम बनाए गए हैं ताकि… वंचित वर्ग के लोगों की… समस्याएँ सुनी जा सकें”, और “एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित रखने का भी प्रावधान है”। पृष्ठ 166 के तीनों सरपंच इसी का प्रमाण हैं — तरंगफल के किन्नर दयानेश्वर कांबले; भील समुदाय की वंदना बहादुर मैदा, खानखांडवी की पहली महिला सरपंच; और हिवरे बाजार को हरा-भरा बनाने वाले पोपटराव बागुजी पवार। बाल सभाओं और बाल पंचायतों से बच्चों की बात भी सुनी जाती है।
ये लोकतंत्र की पाठशाला हैं। बजट पर चर्चा कैसे होती है, योजना का पक्ष कैसे रखा जाता है, नेता से जवाब कैसे माँगा जाता है — यह सब व्यक्ति उसी कमरे में सीखता है जहाँ वह पैदल जा सकता है। ‘आधारभूत लोकतंत्र’ का यही अर्थ है।
अध्याय गाँधी जी की पंक्ति से क्यों आरंभ होता है: “असली भारत, गाँवों में बसता है।” भारत की 1.4 अरब जनसंख्या का लगभग दो-तिहाई भाग लगभग 6,00,000 गाँवों में रहता है। जो लोकतंत्र केवल दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में चले, वह अधिकांश भारतीयों को वर्ष भर बाहर छोड़ देगा। पंचायती राज ही वह मार्ग है जिससे लोकतंत्र प्रतिदिन उन तक पहुँचता है, केवल चुनाव के समय नहीं।
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