प्र1.
पिछले सात वर्षों से लगातार मध्य प्रदेश के इंदौर को सरकारी ‘स्वच्छ सर्वेक्षण’ योजना के अंतर्गत भारत के सर्वाधिक स्वच्छ नगर का पुरस्कार प्रदान किया गया है। इस उपलब्धि में इंदौर के नागरिकों की क्या भूमिका रही होगी?
उत्तर
पुरस्कार नगर को मिला, किंतु कोई निगम अकेले पूरा नगर स्वच्छ नहीं कर सकता। इंदौर का यह रिकॉर्ड इसलिए बना क्योंकि लाखों घरों ने अपनी रोज़ की आदत बदल दी। यही पूरा उत्तर है, और व्यवहार में यह ऐसा दिखता है —
- उन्होंने घर पर ही कूड़ा अलग-अलग किया। गीला रसोई-कचरा एक पात्र में, सूखा कचरा दूसरे में — इंदौर में तो इससे भी अधिक भागों में। सारी व्यवस्था इसी एक आदत पर टिकी है, क्योंकि मिला-जुला कचरा न खाद बन सकता है, न पुनःचक्रित हो सकता है।
- उन्होंने कूड़ा वाहन को ही दिया, बाहर नहीं फेंका। जब हर गली में रोज़ वाहन आता है और हर परिवार उसकी प्रतीक्षा करता है, तो सड़क के कूड़ेदान ही समाप्त हो जाते हैं — और उनके साथ दुर्गंध, आवारा पशु तथा कूड़े के ढेर भी।
- उन्होंने सड़क को कूड़ेदान बनाना बंद किया। चलते वाहन से कुछ न फेंकना, खाली भूखंड में न डालना, न थूकना, आयोजन के बाद गंदगी न छोड़ना। यह तकनीक नहीं, आदत का परिवर्तन है।
- उन्होंने नियम और अर्थदंड स्वीकार किए तथा उपयोग-शुल्क चुकाया। स्वच्छता की व्यवस्था में धन भी लगता है और अनुशासन भी; नागरिकों ने दोनों का विरोध नहीं, समर्थन किया।
- उन्होंने भाग भी लिया और निगरानी भी रखी। निवासी समितियाँ, दुकानदार, विद्यार्थी, सफाई मित्र और स्वयं-सहायता समूह अभियानों में जुड़े, संदेश फैलाया और जो स्थान अब भी गंदे थे उनकी सूचना दी — ठीक उसी प्रकार जैसे पृष्ठ 178 के चित्र 12.4 में “सी.आर.एम. — शिकायतें” दिखाया गया है।
- उन्होंने इसे वर्षों तक निभाया। एक बार जीतना संयोग हो सकता है; “पिछले सात वर्षों से लगातार” जीतने का अर्थ है कि अभियान समाप्त होने के बाद भी आदत बनी रही। यह अधिकारियों से नहीं, नागरिकों से होता है।
यही अध्याय की मूल बात है: पृष्ठ 177 कहता है कि “इन निकायों को अपने कार्यों को कुशलतापूर्वक करने में सक्षम होने के लिए, नागरिकों को भी अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए… उदाहरण के लिए, यदि लोग कूड़े के पृथक्करण के बारे में निर्देशों का सावधानीपूर्वक पालन करें, तो कूड़े का एकत्रीकरण एवं निस्तारण अधिक आसान बन जाता है।” इंदौर इसका जीवंत प्रमाण है। नगर निगम ने वाहन, मार्ग, संयंत्र और कर्मचारी दिए; नागरिकों ने पृथक्करण, अनुशासन और गर्व दिया। इनमें से कोई एक हट जाए तो परिणाम ढह जाता है।
क्या आप जानते हैं? स्वच्छ सर्वेक्षण, स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) के अंतर्गत भारतीय नगरों का वार्षिक स्वच्छता सर्वेक्षण है। इसमें घर-घर कूड़ा संग्रहण, कचरे का प्रसंस्करण, सार्वजनिक शौचालयों की स्थिति और — विशेष रूप से — नागरिकों की प्रतिक्रिया पर अंक दिए जाते हैं। अर्थात नगर के निवासी अपने ही नगर के अंक तय करने में सहायता करते हैं।
आगे सोचिए: आपके अपने नगर या कस्बे को कितने अंक मिलेंगे? निवासियों का कौन-सा एक परिवर्तन उसे सबसे अधिक ऊपर ले जाएगा? उत्तर प्रायः सर्वत्र एक ही होता है — स्रोत पर ही कूड़ा अलग कीजिए और रोज़ सौंपिए।