समीर यह प्रश्न पृष्ठ 179 पर पूछता है, और अनीता अगली ही पंक्तियों में उत्तर देती है। उसका उत्तर, पुस्तक के अपने शब्दों में — “नगर व्यस्त और भीड़-भाड़ वाला होता है जहाँ हर जगह ऊँचे भवन मिलते हैं। बहुत सारे लोग हर समय इधर-उधर आते-जाते रहते हैं। वह यहाँ के शांत वातावरण की तुलना में कोलाहल से भरे होते हैं। इसके साथ ही वहाँ लोग अधिक आत्मनिर्भर होते हैं। वे प्रायः अपने पड़ोसियों के बारे में भी नहीं जानते।”
किंतु वह तुरंत यह धारणा भी सुधार देती है कि नगर में सामुदायिक भावना नहीं होती — “वैसे, नगर में भी कुछ सामुदायिक भावना है। हाल ही में भारी वर्षा के कारण दो गली के बाद एक मकान ढह गया था। इसके बाद आस-पास से दर्जनों लोग मलबे को हटाने में सहायता के लिए एकजुट हो गए और सुनिश्चित किया कि कोई मलबे के अंदर फँसा न रह जाए।”
संवाद के दोनों पक्षों को साथ रखिए तो अध्याय की पूरी तुलना छोटे रूप में सामने आ जाती है —
| नगर, जैसा अनीता बताती है | गाँव, जैसा समीर बताता है | |
|---|---|---|
| कैसा लगता है | व्यस्त, भीड़-भाड़, कोलाहल, ऊँचे भवन, हर समय भागते लोग | शांत; हर व्यक्ति दूसरे को जानता है |
| पड़ोसी | “लोग अधिक आत्मनिर्भर होते हैं… प्रायः अपने पड़ोसियों के बारे में भी नहीं जानते” | हर व्यक्ति “सहायता के लिए तत्पर रहता है” |
| मिल-जुलकर काम | संकट में प्रकट होता है — ढहे मकान का मलबा हटाने दर्जनों लोग जुट गए | प्रतिदिन — “हम मिल-जुल कर खेतों में काम करते हैं, साथ में त्योहार मनाते हैं और सामूहिक निर्णय भी लेते हैं” |
| स्थानीय सरकार | “स्थानीय निकाय और निर्वाचित प्रतिनिधि… जो हमारा और हमारे हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं” | ग्राम पंचायत और ग्राम सभा — समीर के शब्दों में नगर की व्यवस्था “बस केवल उससे बड़ी है” |
| बात सुनी जाना | कठिन — नगर बड़ा है, इसलिए वार्ड और पार्षदों के माध्यम से | सरल — “कभी-कभी हम बच्चों की बात भी सुनी जाती है” |