अन्वेषण अध्याय 3 आगे बढ़ने से पहले...

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
स्थलरूप तीन प्रकार के होते हैं — पर्वत, पठार और मैदान। उनकी भौतिक विशेषताएँ और पर्यावरण बहुत अलग-अलग प्रकार के होते हैं।
उत्तर

इस सारांश का विस्तार:

 पर्वतपठारमैदान
आकृतिचौड़ा आधार, खड़ी ढलान, सँकरा शिखरउठा हुआ, ऊपर से प्राय: चपटा, प्राय: एक ओर सीधी ढलानविस्तृत, सपाट या हल्का तरंगित; ऊँची पहाड़ियाँ या गहरी घाटियाँ नहीं
ऊँचाईआस-पास से बहुत अधिक; 8000 मीटर से भी ऊपर हो सकती हैकुछ सौ मीटर से कई हजार मीटर तकसमुद्र तल से सामान्यत: 300 मीटर से अधिक नहीं
मिट्टीपतली, पथरीलीप्राय: चट्टानी और कम उपजाऊ — लावा पठार अपवाद हैं, जहाँ समृद्ध काली मिट्टी हैनदियों की तलछट से बनी गहरी और अत्यंत उपजाऊ
वनस्पतिपर्वतीय वन — चीड़, फर, स्प्रूस, देवदार; और ऊपर घास, मॉस और लाइकेनविश्व-भर में बहुत विविध; प्राय: झाड़ियाँ और शुष्क वनफसलें और घास के मैदान; विविध वनस्पति एवं जीव-जंतु
भारतीय उदाहरणहिमालय; अरावली श्रृंखला; पश्चिमी घाटदक्कन का पठार; छोटा नागपुर का पठारगंगा का मैदान

इस वर्गीकरण में अध्याय दो बातें और जोड़ता है —

  • आयु भी आकृति जितनी ही महत्वपूर्ण है। हिमालय जैसे नवीन पर्वतों की चोटियाँ ऊँची और नुकीली हैं और वे आज भी बढ़ रहे हैं; अरावली जैसे प्राचीन पर्वत अपरदन से गोल हो चुके हैं। पठार भी नवीन या प्राचीन हो सकते हैं — दक्कन विश्व के सबसे पुराने पठारों में से एक है।
  • तीन ही पूरी सूची नहीं है। पृथ्वी का स्वरूप जटिल है और विशेषज्ञ कुछ और स्थलरूप भी बताते हैं — जैसे मरुस्थल, जो थार और सहारा की तरह गर्म या गोबी की तरह ठंडा हो सकता है।
प्र2.
ऐतिहासिक समय से लोगों द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलाप उस स्थलरूप से संबंधित होते हैं जिसमें वे निवास करते हैं। ये स्थलरूप विश्व की संस्कृति के अभिन्न भाग हैं; विशेष रूप से भारतीय संस्कृति विविध प्रकार से उन्हें मनाती रही है।
उत्तर

पहला भाग — स्थलरूप तय करते हैं कि लोग क्या करते हैं:

स्थलरूपअध्याय के अनुसार मुख्य व्यवसाय
पर्वतघाटियों में वेदिका कृषि, पशुपालन, पर्यटन, पर्वतारोहण और तीर्थयात्रा से जुड़ी सेवाएँ
पठारखनन — विश्व की अनेक सबसे बड़ी खानें पठारों पर ही हैं
मैदानकृषि और नदी में मत्स्य पालन; नदियों के सहारे व्यापार और आवागमन
मरुस्थलपशुपालन, मरु मार्गों पर व्यापार, तथा लोक गीतों और किंवदंतियों की सशक्त परंपरा

दूसरा भाग — स्थलरूप हर जगह संस्कृति का हिस्सा हैं। विश्व-भर के अनेक पारंपरिक समुदाय पर्वतों को पवित्र मानकर उनकी पूजा करते हैं। तिब्बती एवरेस्ट को 'चोमोलुंगमा' अर्थात 'जगत जननी' और नेपाली 'सागरमाथा' अर्थात 'आकाश की देवी' कहते हैं; तिब्बत के कैलाश पर्वत को हिंदू, बौद्ध, जैन और बॉन के अनुयायी पवित्र मानते हैं।

तीसरा भाग — भारतीय संस्कृति ने इन्हें किन-किन रूपों में मनाया है:

  • अध्याय के आरंभ में दिया अथर्ववेद का भूमि सूक्त "अनेक प्रकार की ऊँचाइयों, ढलानों तथा विशाल समतल भूमि" वाली पृथ्वी का अभिवादन करता है और उसे माता कहता है।
  • कालिदास का कुमारसंभव हिमालय की स्तुति से आरंभ होता है — पश्चिमी से पूर्वी समुद्र तक फैले पर्वतों के राजा की।
  • नदियों के स्रोत और संगम पवित्र माने जाते हैं और वहाँ अनेक त्योहार, समारोह तथा धार्मिक कृत्य होते हैं।
  • प्राचीन तमिल संगम काव्य की पाँच टिनै हर दृश्यभूमि को अपने देवताओं, भावों और व्यवसायों से जोड़ती हैं — कुरिंजी, मुल्लै, मरूदम, नेयदल और पालै। यह स्थलरूपों का बिल्कुल भिन्न वर्गीकरण है, जो भौतिक आकृति के बजाय मानवीय अनुभूति पर आधारित है।
  • थार मरुस्थल के समुदाय मरुस्थल से जन्मे लोक गीतों और किंवदंतियों की समृद्ध परंपरा सँजोए हुए हैं।
टिनै इस अध्याय में क्यों दी गई हैं: यह दिखाने के लिए कि स्थलरूप केवल चट्टान और मिट्टी नहीं है। तमिल कवियों ने पर्वत को अनुराग से और मरुस्थल को अलगाव से जोड़ा — अर्थात भूगोल के विद्यालयी विषय बनने से दो हजार वर्ष पहले ही लोग भूमि को मानव जीवन के दर्पण की तरह पढ़ रहे थे।
प्र3.
प्रत्येक स्थलरूप, विभिन्न प्रकार की चुनौतियों के साथ-साथ अवसरों को भी प्रस्तुत करता है।
उत्तर

यही वाक्य पूरे अध्याय को एक सूत्र में बाँधता है। एक-एक पंक्ति में —

स्थलरूपचुनौतीअवसर
पर्वतखड़ा, ऊबड़-खाबड़ भूभाग; भूस्खलन, हिमस्खलन, आकस्मिक बाढ़, बादल फटना, भारी हिमपात और ठंड; नाजुक पर्यावरणपर्यटन, साहसिक खेल, तीर्थयात्रा, वेदिका कृषि, पशुपालन, तथा नदियों को पोषित करने वाली पिघलती हिम
पठारचट्टानी मिट्टी, कम उपजाऊ और कृषि के लिए कम अनुकूल'खनिजों का भंडार-गृह', जल प्रपात, और लावा पठारों की समृद्ध काली मिट्टी
मैदानबढ़ती जनसंख्या, प्रदूषण, तथा अत्यधिक सिंचाई से भूमिगत जलस्तर में गिरावटसबसे उपजाऊ मिट्टी, सुगम नौका-संचालन और आवागमन, तथा बड़ी बस्तियों के लिए स्थान
मरुस्थलबहुत कम वर्षण और जीवन की कठिन परिस्थितियाँविलक्षण वनस्पति एवं प्राणि जगत, तथा समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएँ
अध्याय यहीं क्यों समाप्त होता है: क्योंकि एक ही तथ्य को दो तरह से पढ़ा जा सकता है। खड़ी ढलान हल को रोकती है — और पर्यटकों को खींचती है। तलछट से भरी नदियाँ बाढ़ लाती हैं — और वही मिट्टी बिछाती हैं जो 40 करोड़ लोगों का पेट भरती है। मानव ने जिस प्रकार सभी स्थलाकृतियों को अपना घर बनाया है, वह पुस्तक के अपने शब्दों में "हमारे अनुकूलन और लचीलेपन का साक्षी है"।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ