प्र1.
स्थलरूप तीन प्रकार के होते हैं — पर्वत, पठार और मैदान। उनकी भौतिक विशेषताएँ और पर्यावरण बहुत अलग-अलग प्रकार के होते हैं।
उत्तर
इस सारांश का विस्तार:
| पर्वत | पठार | मैदान | |
|---|---|---|---|
| आकृति | चौड़ा आधार, खड़ी ढलान, सँकरा शिखर | उठा हुआ, ऊपर से प्राय: चपटा, प्राय: एक ओर सीधी ढलान | विस्तृत, सपाट या हल्का तरंगित; ऊँची पहाड़ियाँ या गहरी घाटियाँ नहीं |
| ऊँचाई | आस-पास से बहुत अधिक; 8000 मीटर से भी ऊपर हो सकती है | कुछ सौ मीटर से कई हजार मीटर तक | समुद्र तल से सामान्यत: 300 मीटर से अधिक नहीं |
| मिट्टी | पतली, पथरीली | प्राय: चट्टानी और कम उपजाऊ — लावा पठार अपवाद हैं, जहाँ समृद्ध काली मिट्टी है | नदियों की तलछट से बनी गहरी और अत्यंत उपजाऊ |
| वनस्पति | पर्वतीय वन — चीड़, फर, स्प्रूस, देवदार; और ऊपर घास, मॉस और लाइकेन | विश्व-भर में बहुत विविध; प्राय: झाड़ियाँ और शुष्क वन | फसलें और घास के मैदान; विविध वनस्पति एवं जीव-जंतु |
| भारतीय उदाहरण | हिमालय; अरावली श्रृंखला; पश्चिमी घाट | दक्कन का पठार; छोटा नागपुर का पठार | गंगा का मैदान |
इस वर्गीकरण में अध्याय दो बातें और जोड़ता है —
- आयु भी आकृति जितनी ही महत्वपूर्ण है। हिमालय जैसे नवीन पर्वतों की चोटियाँ ऊँची और नुकीली हैं और वे आज भी बढ़ रहे हैं; अरावली जैसे प्राचीन पर्वत अपरदन से गोल हो चुके हैं। पठार भी नवीन या प्राचीन हो सकते हैं — दक्कन विश्व के सबसे पुराने पठारों में से एक है।
- तीन ही पूरी सूची नहीं है। पृथ्वी का स्वरूप जटिल है और विशेषज्ञ कुछ और स्थलरूप भी बताते हैं — जैसे मरुस्थल, जो थार और सहारा की तरह गर्म या गोबी की तरह ठंडा हो सकता है।