प्र1.
अंतिम दो व्याख्याओं के बारे में कक्षा में चर्चा कीजिए। क्या आप कोई अन्य व्याख्या सोच सकते हैं? ध्यान दीजिए कि इस विषय में हमारे पास इतिहास के अन्य स्रोत नहीं हैं, जैसे न कोई शिलालेख, न कोई ग्रंथ और न ही किसी यात्री का विवरण।
उत्तर
शेष दो व्याख्याएँ हैं — केवल राजसी परिवार के लिए स्नानागार और धार्मिक कार्यों के लिए कुंड। दोनों पक्ष प्रमाणों से क्या-क्या कह सकते हैं, यह नीचे दिया है, और साथ में तीन और संभावनाएँ भी।
| पक्ष क — राजसी/अभिजात स्नानागार | पक्ष ख — धार्मिक कुंड | |
|---|---|---|
| स्थिति | ऊपरी नगर में, जहाँ संभवत: अभिजात वर्ग रहता था — कुछ लोगों की निजी सुविधा | ऊपरी नगर में, जहाँ अनेक प्राचीन नगरों में सार्वजनिक और पवित्र भवन भी होते हैं |
| आकार | 12 × 7 मीटर एक परिवार के दैनिक स्नान के लिए बहुत बड़ा है — पर चुनिंदा समूह के लिए उपयुक्त | सामूहिक अनुष्ठान के लिए पर्याप्त बड़ा, पर इतना छोटा कि केवल चुने हुए लोग भाग लें |
| जल-रोधक परत और नाली | महत्वपूर्ण लोगों के लिए आराम और स्वच्छता | पवित्रता। बार-बार खाली करके स्वच्छ जल से भरने का परिश्रम ठीक वही है जो अनुष्ठानिक स्नान माँगता है |
| चारों ओर के छोटे कमरे | वस्त्र बदलने के कमरे या सेवकों के कक्ष | स्नान से पहले तैयारी के कक्ष, या पुरोहितों के कक्ष |
| कमजोरी | इस पूरी सभ्यता में कोई राजमहल और कोई राजसी समाधि नहीं मिली — इसलिए यह भी सिद्ध नहीं कि कोई ‘राजसी परिवार’ था | हमारे पास कोई पढ़ा जा सकने वाला ग्रंथ या शिलालेख नहीं; ‘धार्मिक’ कहना बाद की भारतीय परंपरा पर आधारित अनुमान है, हड़प्पाई प्रमाण पर नहीं |
तीन और व्याख्याएँ जो आप सुझा सकते हैं :
- नागरिक जल-भंडार — शुष्क ऋतु के लिए ऊपरी नगर हेतु स्वच्छ जल का सुरक्षित संचय। कुएँ और नाली की उपस्थिति इससे अच्छी तरह समझ में आती है।
- उपचार या औषधीय स्नान का स्थान — रोगियों के लिए स्वच्छ जल में, संभवत: जड़ी-बूटियों के साथ, स्नान।
- समय के साथ एक से अधिक उपयोग। नगर सदियों तक चलते हैं; कोई भवन 700 वर्ष तक एक ही उद्देश्य शायद ही निभाता है।
बॉक्स का अंतिम वाक्य सबसे महत्वपूर्ण है : “इस विषय में हमारे पास इतिहास के अन्य स्रोत नहीं हैं — न कोई शिलालेख, न कोई ग्रंथ और न ही किसी यात्री का विवरण।” अशोक के लिए हमारे पास उनके अपने शब्द पत्थर पर उत्कीर्ण हैं; हड़प्पावासियों के लिए केवल वस्तु स्वयं है। इसीलिए तर्क आकार, स्थिति, सामग्री और जल-व्यवस्था से गढ़ना पड़ता है — और इसीलिए वह पूरा नहीं हो पाता। अच्छा वक्ता कहेगा “प्रमाण इसका समर्थन करते हैं”, कभी नहीं “ऐसा ही हुआ था”।
चर्चा निष्पक्ष कैसे रखें : दोनों पक्षों को दस मिनट दीजिए कि वे केवल भौतिक प्रमाण गिनाएँ — “मुझे लगता है” नहीं। फिर हर पक्ष से पूछिए कि कौन-सी खोज उसका मत बदल देगी। पक्ष क कहेगा “पास में एक राजमहल”; पक्ष ख कहेगा “दीवार पर पढ़ा जा सकने वाला अभिलेख”। अपनी बात को गलत सिद्ध करने वाली शर्त बता देना ही इतिहास की विधि का मूल है।