ग्रंथ से दर्शन तक की रेखा को देखिए — अध्याय इसे तीन चरणों में खींचता है।
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उपनिषद् — वैदिक संकल्पनाओं पर आधारित ग्रंथ, जिनमें नई संकल्पनाएँ जुड़ीं: पुनर्जन्म, कर्म
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दर्शन — वेदांत (सब कुछ एक ही दैवी तत्व ब्रह्म है) और योग (चेतना में ब्रह्म का आत्म-बोध प्राप्त करने की विधियाँ)
| वेदांत | योग | |
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| केंद्रीय बात या लक्ष्य | सब कुछ — मानव जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड — एक ही दैवी तत्व ब्रह्म है, कभी-कभी केवल तत् | व्यक्ति की अपनी चेतना में ब्रह्म का आत्म-बोध प्राप्त करना |
| विशिष्ट वाक्य | अहम् ब्रह्मास्मि — “मैं ब्रह्म हूँ”; तत् त्वम् असि — “वह ब्रह्म आप ही हैं” | कोई वाक्य नहीं, बल्कि विधि — योग किया जाता है |
| इससे क्या निकलता है | प्रत्येक जीव का आत्मन् ब्रह्म का ही स्वरूप है, अत: सब कुछ जुड़ा और परस्पर निर्भर है — इसी से सर्वे भवन्तु सुखिन:, “सभी जीव सुखी रहें” | समझ लेना पर्याप्त नहीं; उसे अपने अनुभव में उतारना होता है |
“इन सभी दर्शनों से मिलकर कुछ आधारभूत विचार बने, जिन्हें हम आज 'हिंदू दर्शन' कहते हैं” — अर्थात इस अध्याय के अनुसार हिंदू दर्शन किसी एक संस्थापक की शिक्षा नहीं, बल्कि कई पुरानी धाराओं का मिलन है।