प्र1.
इस प्रकार के परस्पर संपर्क इतने लंबे समय से तथा इतनी सहजता से कैसे होते रहे हैं?
उत्तर
अध्याय अगले ही वाक्य में उत्तर दे देता है: “ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि लोक, जनजातियों और हिंदू विश्वास में अनेक समान प्रकार की संकल्पनाएँ थीं।” जहाँ दो परंपराएँ पहले से एक जैसा सोचती हों, वहाँ लेन-देन लेन-देन जैसा लगता ही नहीं।
| समान संकल्पना | तीनों में यह कैसे मिलती है |
|---|---|
| प्रकृति पवित्र है | पर्वत, नदियाँ, पेड़, पौधे, जंतु “तथा कुछ पत्थरों को भी पवित्र माना गया, क्योंकि इन सबमें चेतना है”। यह कारण लोक, जनजातीय और हिंदू — तीनों में एक ही है |
| अनेक देवता | जनजातियों द्वारा “उन प्राकृतिक तत्वों से संबंधित कई देवताओं की पूजा की जाती है”। नीलगिरि की टोडा जनजाति के अनुसार 30 से अधिक शिखर देवी-देवताओं के निवास हैं — इतने पवित्र कि टोडा लोग अंगुली से उनकी ओर संकेत तक नहीं करते |
| और उनके ऊपर एक परमात्मा | “देवताओं में इतनी बहुलता के पश्चात, हिंदू धर्म के समान अनेक जनजातियों में भी उच्चतर देवत्व या परमात्मा की संकल्पना है”: अरुणाचल प्रदेश में डोनीपोलो (सूर्य और चंद्रमा का मिला-जुला रूप), मध्य भारत में खंडोबा, मुंडा और संथाल में सिंगबोंगा, “जिन्होंने यह संपूर्ण विश्व बनाया” |
वास्तव में क्या-क्या दोनों ओर गया:
- जनजातीय → व्यापक परंपरा: पुरी के जगन्नाथ, जो परंपरा के अनुसार मूल रूप से जनजाति देवता थे; तथा भारत भर में पूजी जाने वाली देवी माताओं के विभिन्न रूप।
- व्यापक परंपरा → जनजातीय: कुछ जनजातियों में “हिंदू देवों को काफी समय पहले ही अपना लिया गया था और महाभारत तथा रामायण के उनके अपने रूप हैं” — पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर तमिलनाडु तक।
- निरंतर, दोनों ओर: “देवताओं, संकल्पनाओं, दंतकथाओं और रीतियों का आपस में दोनों ही दिशाओं में आदान-प्रदान होता रहा है।”
और यह सहजता से — अर्थात बिना किसी के आयोजन के — इसलिए हुआ क्योंकि यह तय करने वाली कोई सत्ता नहीं थी कि कौन-सा देवता किसका है, कुछ अपनाने से पहले कुछ छोड़ना अनिवार्य नहीं था, और आरंभ में कोई सीमा-रेखा खींची ही नहीं गई थी — प्राचीन भारत में तो 'जनजाति' के लिए कोई अलग शब्द तक नहीं था। लोग बस साथ-साथ रहे और आदान-प्रदान अपने आप चलता रहा।
परिणाम, अध्याय के अपने शब्द में — समृद्धि: “स्पष्ट रूप से, इस लंबे समय के परस्पर संपर्क का परिणाम आपसी समृद्धि रही है।” दोनों पक्ष जितने से आरंभ हुए थे, उससे अधिक लेकर लौटे। इसीलिए लोक और जनजातीय मान्यताएँ तथा प्रथाएँ “भारत की सांस्कृतिक जड़ों में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं” — जड़, कोई उधार नहीं।
क्या आप जानते हैं? इसी पृष्ठ पर दो चित्र भी हैं जिन्हें देखना चाहिए — गहरे लाल रंग पर सफेद रेखाओं से बना एक जनजातीय चित्र, जिसकी पूरी किनारी छोटी-छोटी ज्यामितीय आकृतियों की पंक्तियों से बनी है; और नीलगिरि के एक टोडा व्यक्ति का छायाचित्र, जिसकी सफेद चादर पर लाल-काली कढ़ाई है। जनजातीय कला पर विस्तार से चर्चा अध्याय 8 में है।