चित्र 8.4 (पृष्ठ 130–131, सभी चित्र दक्षिण भारत से) के छह चित्रों में साड़ी हर बार ऐसा काम कर रही है जिसका पहनावे से कोई संबंध नहीं।
| क्र. | चित्र में क्या दिख रहा है | साड़ी का उपयोग |
|---|---|---|
| 1 | बगीचे में पेड़ की नीची शाखा से बँधी लाल साड़ी, गहरे झूले की तरह लटकी हुई, जिसमें एक शिशु सो रहा है | पालना या झूला — माँ पास ही काम करती रहती है और बच्चा छाँव में सोता है |
| 2 | एक स्त्री तालाब में कमर तक पानी में खड़ी होकर फैली हुई नारंगी साड़ी को पानी में खींच रही है | मछली पकड़ने का जाल — महीन बुनाई में छोटी मछलियाँ और झींगे फँस जाते हैं |
| 3 | एक स्त्री सिर पर भारी पीतल का घड़ा लिए खेत पार कर रही है; घड़ा कपड़े के मोटे कुंडल पर टिका है | इंडुरी (सिर की गद्दी) — कपड़े को गोल लपेटकर बनाया गया छल्ला, जो घड़े को सँभालता है और भार सहता है |
| 4 | ऊपर से लिया गया चित्र — दो लोग नपने से अनाज उँड़ेल रहे हैं और उसे फैली हुई लाल साड़ी में झेला जा रहा है | पात्र और छननी — अनाज इसी फैले कपड़े में झेला, ढोया और साफ किया जाता है |
| 5 | वर्षा में एक स्त्री दोनों हाथों से अपनी साड़ी का नारंगी पल्लू सिर के ऊपर तान रही है | छाता — वर्षा से और दूसरे दिनों में धूप से बचाव |
| 6 | खेत की घास पर एक स्त्री लेटी है, सिर के नीचे बिछा चारखाने का कपड़ा है, पीछे मवेशी चर रहे हैं | चटाई या चादर — खुले में लेटकर विश्राम करने के लिए साफ जगह |