अन्वेषण अध्याय 8 आइए पता लगाएँ

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
क्या आप ऊपर दिए गए चित्रों से यह पहचान सकते हैं कि साड़ी का उपयोग कितने प्रकार से किया गया है?
उत्तर

चित्र 8.4 (पृष्ठ 130–131, सभी चित्र दक्षिण भारत से) के छह चित्रों में साड़ी हर बार ऐसा काम कर रही है जिसका पहनावे से कोई संबंध नहीं।

क्र.चित्र में क्या दिख रहा हैसाड़ी का उपयोग
1बगीचे में पेड़ की नीची शाखा से बँधी लाल साड़ी, गहरे झूले की तरह लटकी हुई, जिसमें एक शिशु सो रहा हैपालना या झूला — माँ पास ही काम करती रहती है और बच्चा छाँव में सोता है
2एक स्त्री तालाब में कमर तक पानी में खड़ी होकर फैली हुई नारंगी साड़ी को पानी में खींच रही हैमछली पकड़ने का जाल — महीन बुनाई में छोटी मछलियाँ और झींगे फँस जाते हैं
3एक स्त्री सिर पर भारी पीतल का घड़ा लिए खेत पार कर रही है; घड़ा कपड़े के मोटे कुंडल पर टिका हैइंडुरी (सिर की गद्दी) — कपड़े को गोल लपेटकर बनाया गया छल्ला, जो घड़े को सँभालता है और भार सहता है
4ऊपर से लिया गया चित्र — दो लोग नपने से अनाज उँड़ेल रहे हैं और उसे फैली हुई लाल साड़ी में झेला जा रहा हैपात्र और छननी — अनाज इसी फैले कपड़े में झेला, ढोया और साफ किया जाता है
5वर्षा में एक स्त्री दोनों हाथों से अपनी साड़ी का नारंगी पल्लू सिर के ऊपर तान रही हैछाता — वर्षा से और दूसरे दिनों में धूप से बचाव
6खेत की घास पर एक स्त्री लेटी है, सिर के नीचे बिछा चारखाने का कपड़ा है, पीछे मवेशी चर रहे हैंचटाई या चादर — खुले में लेटकर विश्राम करने के लिए साफ जगह
एक ही परिधान यह सब कैसे कर लेता है: क्योंकि साड़ी बिना सिली होती है। सिले हुए वस्त्र का एक आकार और एक ही काम होता है। छह मीटर खुला कपड़ा बाँधा, ताना, लपेटा, फैलाया या बिछाया जा सकता है — इसलिए वह वही बन जाता है जिसकी उस क्षण जरूरत हो। अध्याय की बड़ी बात भी यही है — जितने कम नियम बँधे हों, उतने अधिक रूप संभव हैं।
प्र2.
क्या आप साड़ी के अन्य उपयोगों से परिचित हैं अथवा क्या आप उसके अन्य उपयोगों की कल्पना कर सकते हैं?
उत्तर

हाँ — भारतीय घरों में पुरानी साड़ी लगभग कभी फेंकी नहीं जाती। कुछ और उपयोग, जिनमें से कई आपने स्वयं देखे होंगे :

उपयोगकैसे
कपड़े का झूला (झूला, तोट्टिल, ऊयाला)छत के दो कुंडों या दो पेड़ों के बीच बाँधकर, घर के भीतर भी और बाहर भी
परदा या कमरे का विभाजनद्वार या खिड़की पर तानकर — एकांत भी मिलता है और धूप भी कटती है
दही जमाना, छानना, पानी छाननासाफ सूती साड़ी घर की सबसे पुरानी छननी है
गठरीचारों कोने बाँध दीजिए और सब्जी, अनाज या लकड़ी ढोने का थैला तैयार
आँगन पर छाँव या अस्थायी तंबू की दीवारगाँव के आयोजनों और विवाह में खंभों के बीच तानकर
रजाई-गुदड़ी (कांथा, गोधड़ी)कई पुरानी साड़ियाँ परत-दर-परत रखकर चलती सिलाई से जोड़ना — बंगाल और महाराष्ट्र का प्रसिद्ध शिल्प
रस्सी, पट्टी या गोफनपट्टियों में फाड़कर; कुएँ में बाल्टी उतारने के लिए भी
झाड़न, पोंछा, खाट का बिछौना, गुड़िया के कपड़ेकपड़े का अंतिम चरण, जिसके बाद धागे चिथड़ों की दरी में भी लग जाते हैं
सोचिए: यहाँ गिनाया गया लगभग हर उपयोग पुन: उपयोग है। जो वस्त्र कभी किसी निश्चित नाप में काटा ही नहीं गया, उसे आगे दिया जा सकता है, नए ढंग से बाँधा जा सकता है, परतों में लगाया या फाड़ा जा सकता है — और वह बेकार नहीं होता। इसीलिए साड़ी केवल बहुउपयोगी नहीं, सचमुच मितव्ययी और पर्यावरण-हितैषी भी है। घर में किसी बड़े से पूछिए कि घर की सबसे पुरानी साड़ी आजकल किस काम आ रही है — उत्तर प्राय: चौंकाने वाला होता है।
प्र3.
जिस प्रकार आपने साड़ी के विभिन्न रूपों और उपयोगों को देखा, उसी प्रकार एक अन्य परिधान धोती के कपड़े (फैब्रिक) तथा उपयोगों को ध्यान में रखते हुए उसके विभिन्न रूपों की एक सूची तैयार कीजिए। इस गतिविधि से आपको क्या समझ में आया?
उत्तर

धोती भी वही विचार है जो साड़ी है — एक सादा बिना सिला कपड़ा, जो भारत के अधिकांश भागों में पुरुष पहनते हैं और जिसे लगभग हर जगह अलग नाम से पुकारा जाता है।

भाग 1 — रूप, नाम और कपड़ा।

नाम और क्षेत्रप्राय: किस कपड़े कापहनने का ढंग
धोती — उत्तर भारतसफेद या क्रीम सूती; विवाह और अनुष्ठान में रेशमीकमर पर लपेटकर, आगे चुन्नट, एक छोर पैरों के बीच से पीछे खोंसा हुआ
धुति — पश्चिम बंगालमहीन सूती, प्राय: पतली रंगीन किनारीआगे चौड़ी चुन्नटें, कुर्ते या पंजाबी के साथ
धोतर — महाराष्ट्रसूती, नौ गज लंबाकाछा ढंग, पीछे खोंसकर, जिससे चलना-फिरना सहज रहता है
वेष्टि — तमिलनाडुसूती, सुनहरी या रंगीन किनारी (जरी कर) के साथपूरा लंबा, या काम के समय घुटनों तक मोड़कर
मुंडु — केरलमहीन सफेद सूती, प्राय: कसवु सुनहरी किनारीकमर पर एक बार लपेटा; काम के समय इसी तरह मोड़ लिया जाता है
पंचे / कच्चे — कर्नाटकसूती, कभी रेशमीखुला या कच्चे ढंग से खोंसकर
पंचा — आंध्र प्रदेश, तेलंगानासूती, प्राय: किनारी वालालपेटकर खोंसा हुआ; कंधे पर उत्तरीयम्
धोतियु / चोरणो — गुजरात, राजस्थानसूती, कभी बंधेज काकेडियु और पगड़ी के साथ
लाचा / तहमद — पंजाबसूती, प्राय: चारखानाबीच में खोंसे बिना लपेटा; भांगड़ा और खेत के काम के लिए
पहलवान और कबड्डी खिलाड़ी की धोतीमजबूत सूती, छोटीकसकर और ऊँची खोंसी हुई, जिससे पैर पूरी तरह स्वतंत्र रहें

भाग 2 — परिधान के अतिरिक्त उपयोग। साड़ी की तरह धोती भी दूसरे काम आती है : पल्ले से मुँह-हाथ पोंछने का अंगोछा, पानी की छननी, कोने बाँधकर अनाज या चारा ढोने का थैला, गर्मी में पंखा, बैठने-सोने की चादर, आपात स्थिति में पट्टी या गोफन, और फाड़ने पर रस्सी। घुटनों तक मोड़ लीजिए तो वही धोती काम के कपड़े हैं; टखनों तक छोड़ दीजिए तो मंदिर और विवाह का औपचारिक परिधान।

इस गतिविधि से क्या समझ में आया।

एक बिना सिला कपड़ा
+ अलग-अलग कपड़े, किनारियाँ, लंबाइयाँ और बाँधने के ढंग
+ अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम
= वही ‘विविधता में एकता’ जो साड़ी में थी, पर एक बिल्कुल दूसरे परिधान में
निष्कर्ष : यह भारतीय जीवन का एक ढर्रा है, कोई इक्का-दुक्का संयोग नहीं।
वही ढर्रा दो बार क्यों दिखाई देता है: दोनों परिधान सबसे सरल रचना से आरंभ होते हैं — बिना काटा हुआ कपड़ा। चूँकि सिलाई कुछ भी तय नहीं करती, इसलिए हर क्षेत्र अपना कपड़ा, अपनी किनारी, अपनी लंबाई और अपना ढंग चुनने के लिए स्वतंत्र है और फिर भी साझा रूप से बाहर नहीं जाता। विविधता एकता के विरुद्ध नहीं, उसी में से निकलती है — अध्याय यही सिद्ध कर रहा है।
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