इसका अर्थ है कि भारत की विशाल विविधता — भाषा, परिधान, भोजन, त्योहार, रीति-रिवाज और भूदृश्य की — असंबद्ध टुकड़ों का ढेर नहीं है। इन भिन्नताओं के नीचे कुछ साझा है, इसलिए अनेक वस्तुत: एक के ही अलग-अलग रूप हैं। श्री अरविंद ने इसे ‘एक में अनेक’ कहा और यही अध्याय का शीर्षक भी बना।
अध्याय यह प्रश्न ब्रिटिश इतिहासकार विंसेंट स्मिथ के शब्दों में रखता है —
“इस अचंभित करने वाली विविधता में भारत का इतिहास किस प्रकार लिखा जा सकता है? ...इस प्रश्न का उत्तर इस तथ्य में निहित है कि भारत ‘विविधता में एकता’ प्रदर्शित करता है।”
इसके बाद अध्याय जीवन के चार बिल्कुल अलग क्षेत्रों में यही बात सिद्ध करता है।
| जीवन का क्षेत्र | ‘अनेक’ — जो भिन्न है | ‘एक’ — जो साझा है |
|---|---|---|
| भोजन | लाखों न सही, हजारों प्रकार के व्यंजन और पकवान | वही मुख्य अनाज — चावल, जौ, गेहूँ, बाजरा, ज्वार, रागी, दालें — और वही मसाले, हल्दी, जीरा, इलायची, अदरक |
| परिधान | साड़ी के सैकड़ों प्रकार, पहनने के अनेक तरीके, हर क्षेत्र और समुदाय में भिन्न | एक ही परिधान — बिना सिला एक लंबा कपड़ा, साड़ी |
| त्योहार | चित्र 8.5 के मानचित्र पर लगभग एक दर्जन अलग-अलग नाम | वही तिथि (14 जनवरी के आस-पास) और वही अर्थ — फसलों की कटाई का आरंभ |
| साहित्य | हर भारतीय भाषा में अनुवाद, रूपांतरण तथा अनगिनत लोक और जनजातीय संस्करण | इन सबके पीछे दो संस्कृत महाकाव्य और पंचतंत्र |
अध्याय का अंतिम वाक्य पूरी बात कह देता है — “भारतीय संस्कृति विविधता को संपन्नता के रूप में प्रचारित करती है, किंतु साथ ही विविधता को पोषित करने वाली अंतर्निहित एकता को भी दृष्टि से ओझल नहीं होने देती।”