दीपकम् अध्याय 1 परियोजनाकार्यम्

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
चित्राणि ध्यानेन पश्यन्तु । शिक्षकस्य साहाय्येन एतेषां चित्राणां वैशिष्ट्यम् अवगच्छन्तु लिखन्तु च । (क) कुक्कुटः विरौति — उ (एक-मात्रः, ह्रस्वः) → उ (एक-मात्रः, ह्रस्वः) → ऊ (द्वि-मात्रः, दीर्घः) → उ३ (त्रि-मात्रः, प्लुतः)
उत्तर

चित्रस्य वैशिष्ट्यम्: कुक्कुटः (मुर्गा) यदा विरौति, तदा तस्य ध्वनौ त्रयः अपि मात्रा-भेदाः श्रूयन्ते — ह्रस्वः, दीर्घः, प्लुतः च।

(हिन्दी: मुर्गा जब बाँग देता है — “उ-उ-ऊ-उ३” — तो उसी एक बाँग में स्वर की तीनों लम्बाइयाँ सुनाई देती हैं। यही इस चित्र की विशेषता है।)

ध्वनिःमात्रानामकितना समय
एक-मात्रःह्रस्वःसबसे छोटा — 1 मात्रा
एक-मात्रःह्रस्वःफिर उतना ही — 1 मात्रा
द्वि-मात्रःदीर्घःदुगुना — 2 मात्रा
उ३त्रि-मात्रःप्लुतःतिगुना — 3 मात्रा
‘मात्रा’ क्या है: आँख की एक पलक झपकने में जितना समय लगता है, उतना समय एक मात्रा कहलाता है। ह्रस्व स्वर (अ इ उ ऋ ऌ) = 1 मात्रा, दीर्घ स्वर (आ ई ऊ ॠ ए ऐ ओ औ) = 2 मात्रा, प्लुत = 3 मात्रा और अकेला व्यञ्जन = आधी मात्रा
‘उ३’ में ३ क्यों: संस्कृत में प्लुत स्वर के आगे अङ्क लिखने की परम्परा है — जैसे दूर से किसी को पुकारते समय “हे राम३!”। यह चिह्न बताता है कि यहाँ स्वर तीन मात्रा तक खींचना है।
प्र2.
(ख) चाषस्तु वदते मात्रां द्विमात्रं त्वेव वायसः । शिखी रौति त्रिमात्रं तु नकुलस्त्वर्धमात्रकम् ॥ १. चाषः (नीलकण्ठः) पक्षी — एक-मात्रं ध्वनिं करोति । (ह्रस्व-स्वरः इव) २. वायसः (काकः) पक्षी — द्वि-मात्रं ध्वनिं करोति । (दीर्घ-स्वरः इव) ३. शिखी (मयूरः) पक्षी — त्रि-मात्रं ध्वनिं करोति । (प्लुत-स्वरः इव) ४. नकुलः पशुः — अर्ध-मात्रं ध्वनिं करोति । (व्यञ्जनम् इव)
उत्तर

अन्वयः — चाषः तु मात्रां वदते। वायसः तु एव द्विमात्रं (वदते)। शिखी त्रिमात्रं रौति। नकुलः तु अर्धमात्रकम् (रौति)॥

सन्धि-विच्छेदः: चाषस्तु = चाषः + तु · त्वेव = तु + एव · नकुलस्त्वर्धमात्रकम् = नकुलः + तु + अर्धमात्रकम्। (‘ः’ के बाद ‘त’ आने पर विसर्ग ‘स्’ बन जाता है — यह विसर्ग-सन्धि है।)

हिन्दी अर्थ: नीलकण्ठ पक्षी एक मात्रा जितनी लम्बी आवाज़ निकालता है, कौआ दो मात्रा जितनी, मोर तीन मात्रा जितनी और नेवला आधी मात्रा जितनी।

प्राणीसंस्कृत नामध्वनि की लम्बाईव्याकरण में उसका जोड़ा
नीलकण्ठ (पक्षी)चाषःएक-मात्रम्ह्रस्व-स्वरः — अ, इ, उ, ऋ, ऌ
कौआवायसः (काकः)द्वि-मात्रम्दीर्घ-स्वरः — आ, ई, ऊ, ॠ, ए, ऐ, ओ, औ
मोरशिखी (मयूरः)त्रि-मात्रम्प्लुत-स्वरः — उ३, राम३
नेवलानकुलःअर्ध-मात्रम्व्यञ्जनम् — क्, ख्, ग्…

भावः: यह श्लोक पाणिनीय शिक्षा का है और उसमें एक सुन्दर शिक्षण-युक्ति छिपी है — मात्रा नापने के लिए कोई घड़ी नहीं चाहिए, प्रकृति ही हमारी घड़ी है। जो बालक ‘मात्रा’ शब्द नहीं समझता, वह भी कौए और मोर की आवाज़ की लम्बाई का अन्तर तुरन्त पहचान लेता है। आचार्यों ने इसी अनुभव को व्याकरण का माप बना दिया। यही कारण है कि संस्कृत का उच्चारण इतना नपा-तुला और सुनिश्चित है।

करके देखिए: कक्षा में चारों आवाज़ें बारी-बारी निकालिए — चाष जैसी छोटी ‘कीऽ’, कौए की ‘काऽऽ’, मोर की ‘केऽऽऽका’ और नेवले की बहुत छोटी ‘क्’। फिर इन्हीं के सहारे अ / आ / आ३ बोलकर दिखाइए।
प्र3.
(ग) नामान्त्याक्षरी क्रीडा — शिक्षिका / शिक्षकः छात्रान् समूहद्वयेन विभज्य प्रथमगणस्य छात्रां / छात्रं स्व-नामधेयं वक्तुं निर्दिशति । छात्रा / छात्रः स्व-नामधेयं वदति । तदनन्तरं द्वितीयगणस्य छात्रा / छात्रः उत्तिष्ठति । उक्तस्य नामधेयस्य अन्तिमं व्यञ्जनवर्णं (विसर्गातिरिक्तम्) स्वीकृत्य तेन वर्णेन आरभ्यमाणं किञ्चिद् नाम वदति ।
उत्तर

यह कक्षा में खेला जाने वाला खेल है — ‘अन्त्याक्षरी’ का ही संस्कृत रूप, पर गीतों की जगह नामों से।

खेल के नियम (पुस्तक के अनुसार):

  1. शिक्षक कक्षा को दो गणों (टोलियों) में बाँटते हैं।
  2. पहले गण का एक विद्यार्थी खड़ा होकर अपना नाम बोलता है।
  3. दूसरे गण का विद्यार्थी उठकर उस नाम के अन्तिम व्यञ्जन-वर्ण से — विसर्ग को छोड़कर — शुरू होने वाला कोई नाम बोलता है।
  4. फिर पहला गण उस नए नाम के अन्तिम व्यञ्जन से नया नाम बोलता है। इसी क्रम से खेल चलता रहता है।
‘विसर्गातिरिक्तम्’ का अर्थ समझिए: ‘रमेशः’ का अन्तिम चिह्न विसर्ग (ः) है, पर उसे छोड़ना है। उससे पहले का व्यञ्जन है श्। इसलिए अगला नाम ‘श’ से शुरू होगा — जैसे शारदा। यही इस खेल की असली सीख है — नाम के अन्त में कौन-सा व्यञ्जन है, यह पहचानना।
नमूना क्रीडा:
क्रमःगणःनामधेयम्अन्तिमः व्यञ्जनवर्णः
1प्रथमगणःरमेशःश्
2द्वितीयगणःशारदाद् (शारदा का अन्तिम व्यञ्जन ‘द्’)
3प्रथमगणःदीपकःक्
4द्वितीयगणःकमलाल्
5प्रथमगणःलक्ष्मणःण्
6द्वितीयगणःनकुलःल् (‘ण’ से नाम न मिले तो शिक्षक की अनुमति से ‘न’ लीजिए)
सुझाव: जिस गण को 10 सेकंड में नाम न सूझे, उसका एक अङ्क कट जाए। नाम केवल व्यक्तियों के ही नहीं, नगरों और नदियों के भी लिए जा सकते हैं — गङ्गा, यमुना, अयोध्या, नासिक — इससे खेल और रोचक हो जाता है।
प्र4.
(घ) उच्चारण-स्थानानां पाणिनीय-शिक्षा-सूत्राणि — सूत्राणि तेषाम् अर्थं च लिखन्तु ।
उत्तर

पाणिनीय-शिक्षा के ये सूत्र संस्कृत उच्चारण की सबसे पुरानी और सबसे संक्षिप्त तालिका हैं। हर सूत्र में पहले वर्ण गिनाए जाते हैं, फिर उनका स्थान बता दिया जाता है।

सूत्रम्कौन-से वर्णउच्चारण-स्थानम्
अकुहविसर्जनीयाः कण्ठ्याः‘अ आ’, ‘क ख ग घ ङ’, ‘ह’, विसर्गः ‘अः’कण्ठ-स्थाने
इचुयशास् तालव्याः‘इ ई’, ‘च छ ज झ ञ’, ‘य’, ‘श’तालु-स्थाने
ऋटुरषा मूर्धन्याः‘ऋ ॠ’, ‘ट ठ ड ढ ण’, ‘र’, ‘ष’मूर्ध-स्थाने
ऌतुलसा दन्त्याः‘ऌ’, ‘त थ द ध न’, ‘ल’, ‘स’दन्त-स्थाने
उपूपध्मानीया ओष्ठ्याः‘उ ऊ’, ‘प फ ब भ म’, [उपध्मानीयः*]ओष्ठ-स्थाने
ङञणनमाः स्वस्थान-नासिकास्थानाः‘ङ’, ‘ञ’, ‘ण’, ‘न’, ‘म’अपने-अपने स्थान और नासिका — दोनों जगह
ए ऐ कण्ठतालव्यौ‘ए’, ‘ऐ’कण्ठ + तालु
ओ औ कण्ठोष्ठ्यौ‘ओ’, ‘औ’कण्ठ + ओष्ठ
वकारो दन्त्योष्ठ्यः‘व’दन्त + ओष्ठ
अनुस्वारयमा नासिक्याःअनुस्वारः ‘अं’, [यमाः* च]नासिका-स्थाने

* पुस्तक की टिप्पणी — ‘उपध्मानीयः’ और ‘यमाः’ विशिष्ट अतिरिक्त अयोगवाह-वर्ण हैं; सामान्य संस्कृत भाषा में इनका प्रयोग प्रायः नहीं दिखता।

सूत्र का ढाँचा कैसे पढ़ें: सूत्र का नाम ही वर्णों की सूची है। जैसे अ-कु-ह-विसर्जनीयाः = ‘अ’ (अ आ) + ‘कु’ (कवर्ग — क ख ग घ ङ) + ‘ह’ + ‘विसर्जनीय’ (विसर्ग) — और अन्त में ‘कण्ठ्याः’ यानी ये सब गले से बोले जाते हैं। इसी तरह इ-चु-य-शाः = इ + चवर्ग + य + श। ‘कु’, ‘चु’, ‘टु’, ‘तु’, ‘पु’ — इन छोटे रूपों से पूरे वर्ग का बोध होता है; यह पाणिनि की संक्षेप-कला है।
करने योग्य परियोजना: एक चार्ट-पेपर पर सिर का चित्र बनाइए, उसमें छह स्थान (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका) दिखाइए और हर स्थान के पास उससे बोले जाने वाले वर्ण तथा उसका पाणिनीय सूत्र लिख दीजिए। कक्षा की दीवार पर लगाने के लिए यह सबसे अच्छा परियोजना-कार्य है।
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