दीपकम् अध्याय 1 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
वर्णानाम् उच्चारणं कथं भवति ? इति ज्ञास्यामः —
उत्तर

उत्तरम् (संस्कृतम्): वर्णानाम् उच्चारणे मुखस्य मुख्या भूमिका भवति। कदाचित् मुखेन सह नासिकायाः अपि उपयोगः भवति — यथा ‘अं’, ‘न्’, ‘म्’, ‘अँ’ इत्यादिषु नासिक्य-वर्णेषु। मुखं नासिका च — उभे अपि आस्ये भवतः।

(हिन्दी: किसी भी ध्वनि या वर्ण को बोलने में मुख की मुख्य भूमिका होती है। कभी-कभी मुख के साथ नाक का भी उपयोग होता है, जैसे ‘अं’, ‘न’, ‘म’, ‘अँ’ जैसे नासिक्य वर्णों में। मुख और नाक — दोनों ही सिर के भीतर हैं।)

स्वयं करके देखिए: उँगली नाक पर रखकर पहले ‘क’ बोलिए, फिर ‘ङ’ बोलिए। ‘ङ’ बोलते समय नाक में कँपकँपी महसूस होगी, ‘क’ में नहीं। यही अन्तर मुख-वर्ण और नासिक्य-वर्ण का है।
शब्दार्थ: आस्यम् = Head (सिर का भीतरी भाग), मुखम् = Mouth, नासिका = Nose, जिह्वा = Tongue, स्थानम् = Place of articulation।
प्र2.
आस्यस्य (Head) आभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्तिः कुत्र-कुत्र भवतीति पश्यामः — (आस्ये वर्णानां षट् उच्चारण-स्थानानि)
उत्तर

उत्तरम्: आस्ये सामान्यतः षट् स्थानानि भवन्ति — मुखे पञ्चसु स्थानेषु, नासिकायाम् एकस्मिन् स्थाने च।

(हिन्दी: सिर के भीतर सामान्यतः छह उच्चारण-स्थान होते हैं — पाँच मुख में और एक नाक में।)

क्रमःस्थानम्हिन्दीतत्र उत्पन्नाः वर्णाः (एकस्थानीयाः)
१.कण्ठःगलाअ आ · क ख ग घ · ह · अः
२.तालुतालूइ ई · च छ ज झ · य · श
३.मूर्धातालू का ऊपरी/पिछला भागऋ ॠ · ट ठ ड ढ · र · ष
४.दन्तःदाँतऌ · त थ द ध · ल · स
५.ओष्ठःहोंठउ ऊ · प फ ब भ
६.नासिकानाकअं (अनुस्वारः)
क्रम याद रखने की कुंजी: कण्ठ से ओष्ठ तक स्थान गले से होंठ की ओर बढ़ते हैं — गला → तालू → मूर्धा → दाँत → होंठ। इसीलिए वर्णमाला का क्रम भी यही है: क-वर्ग (कण्ठ) → च-वर्ग (तालु) → ट-वर्ग (मूर्धा) → त-वर्ग (दन्त) → प-वर्ग (ओष्ठ)। संस्कृत वर्णमाला बेतरतीब नहीं, वैज्ञानिक क्रम में है।
प्र3.
द्विस्थानीय-वर्णानाम् उच्चारण-स्थानानि — एकस्थानीयाः द्विस्थानीयाः च वर्णाः के ? (पृष्ठ 19, 20, 22)
उत्तर

कुछ वर्ण एक ही स्थान से बोले जाते हैं (एकस्थानीयाः), और कुछ दो स्थानों से (द्विस्थानीयाः)। पुस्तक के पृष्ठ 19 और 20 के चित्र यही बताते हैं।

वर्णःस्थानद्वयम्नामकैसे बनता है
कण्ठः + तालुकण्ठतालव्यःअ (कण्ठ्य) + इ (तालव्य) = ए
कण्ठः + तालुकण्ठतालव्यःअ + ए = ऐ
कण्ठः + ओष्ठःकण्ठोष्ठ्यःअ (कण्ठ्य) + उ (ओष्ठ्य) = ओ
कण्ठः + ओष्ठःकण्ठोष्ठ्यःअ + ओ = औ
दन्तः + ओष्ठःदन्त्योष्ठ्यःऊपर के दाँत नीचे के होंठ को छूते हैं
कण्ठः + नासिकाकण्ठ्यः नासिक्यःअपना स्थान + नाक
तालु + नासिकातालव्यः नासिक्यःअपना स्थान + नाक
मूर्धा + नासिकामूर्धन्यः नासिक्यःअपना स्थान + नाक
दन्तः + नासिकादन्त्यः नासिक्यःअपना स्थान + नाक
ओष्ठः + नासिकाओष्ठ्यः नासिक्यःअपना स्थान + नाक

इन्हें जोड़कर पृष्ठ 22 की “सर्वेषां वर्णानाम् उच्चारण-स्थानानि” वाली पूरी तालिका बनती है —

स्थानम्स्वराःस्पर्शाःअन्तःस्थाः / ऊष्माणः / अयोगवाहौ
१. कण्ठ्याःअ आ, ए ऐ, ओ औक ख ग घ ङह, अः
२. तालव्याःइ ई, ए ऐच छ ज झ ञय, श
३. मूर्धन्याःऋ ॠट ठ ड ढ णर, ष
४. दन्त्याःत थ द ध नल, व, स
५. ओष्ठ्याःउ ऊ, ओ औप फ ब भ म
६. नासिक्याःङ ञ ण न मअं
ध्यान दीजिए: ‘ए ऐ ओ औ’ और ‘व’ तथा ‘ङ ञ ण न म’ — ये वर्ण तालिका में दो-दो जगह आते हैं, क्योंकि इनका उच्चारण दो स्थानों से होता है। ‘ए’ अ और इ की सन्धि से बना है, इसलिए वह कण्ठ (अ का स्थान) और तालु (इ का स्थान) — दोनों का है। यही बात ‘ओ’ की — अ + उ, इसलिए कण्ठ और ओष्ठ दोनों।
प्रयोग करके देखिए: ‘व’ बोलिए — ऊपर के दाँत नीचे के होंठ को छूएँगे; इसीलिए वह दन्त्योष्ठ्य है। ‘ओ’ बोलिए — होंठ गोल हो जाएँगे और आवाज़ गले से आएगी; इसीलिए कण्ठोष्ठ्य
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