प्र1.
संस्कृत-साहित्ये प्रहेलिकानां विशिष्टं स्थानम् अस्ति । प्रहेलिकाः आबालवृद्धं मानसिकम् उल्लासं जनयन्ति । बुद्धेः तार्किकशक्तिं वर्धयन्ति । चिन्तनक्षमतां विकासयन्ति । पूर्वजानां कवीनां बुद्धिमत्तां कल्पनाशक्तिं च दर्शयन्ति । — अस्य पाठ-प्रवेशस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर
पाठ आरम्भ होने से पहले पुस्तक बता देती है कि प्रहेलिका क्या है और उसे पढ़ने से क्या लाभ है।
| संस्कृतम् | हिन्दी अनुवादः |
|---|---|
| संस्कृत-साहित्ये प्रहेलिकानां विशिष्टं स्थानम् अस्ति । | संस्कृत-साहित्य में पहेलियों का एक विशेष स्थान है। |
| प्रहेलिकाः आबालवृद्धं मानसिकम् उल्लासं जनयन्ति । | पहेलियाँ बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबके मन में उल्लास (आनन्द) उत्पन्न करती हैं। |
| बुद्धेः तार्किकशक्तिं वर्धयन्ति । | वे बुद्धि की तर्क करने की शक्ति को बढ़ाती हैं। |
| चिन्तनक्षमतां विकासयन्ति । | वे सोचने की क्षमता का विकास करती हैं। |
| पूर्वजानां कवीनां बुद्धिमत्तां कल्पनाशक्तिं च दर्शयन्ति । | और वे हमारे पूर्वज कवियों की बुद्धिमत्ता तथा कल्पनाशक्ति को दिखाती हैं। |
‘आबालवृद्धम्’ का अर्थ खोलिए: आ + बाल + वृद्धम् = बालक से लेकर वृद्ध तक। यह अव्ययीभाव समास है, इसलिए रूप कभी नहीं बदलता। इसी तरह ‘आजन्म’ = जन्म से लेकर, ‘आसमुद्रम्’ = समुद्र तक।
Tip — पाठ के शीर्षक का अर्थ: यः जानाति सः पण्डितः = ‘जो जानता है, वही पण्डित है’। यह पंक्ति तीसरी और पाँचवीं प्रहेलिका के अन्तिम चरण से ली गई है — यानी शीर्षक स्वयं पाठ के भीतर से आया है।