दीपकम् अध्याय 11 एकादशः पाठः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
संस्कृत-साहित्ये प्रहेलिकानां विशिष्टं स्थानम् अस्ति । प्रहेलिकाः आबालवृद्धं मानसिकम् उल्लासं जनयन्ति । बुद्धेः तार्किकशक्तिं वर्धयन्ति । चिन्तनक्षमतां विकासयन्ति । पूर्वजानां कवीनां बुद्धिमत्तां कल्पनाशक्तिं च दर्शयन्ति । — अस्य पाठ-प्रवेशस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर

पाठ आरम्भ होने से पहले पुस्तक बता देती है कि प्रहेलिका क्या है और उसे पढ़ने से क्या लाभ है।

संस्कृतम्हिन्दी अनुवादः
संस्कृत-साहित्ये प्रहेलिकानां विशिष्टं स्थानम् अस्ति ।संस्कृत-साहित्य में पहेलियों का एक विशेष स्थान है।
प्रहेलिकाः आबालवृद्धं मानसिकम् उल्लासं जनयन्ति ।पहेलियाँ बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सबके मन में उल्लास (आनन्द) उत्पन्न करती हैं।
बुद्धेः तार्किकशक्तिं वर्धयन्ति ।वे बुद्धि की तर्क करने की शक्ति को बढ़ाती हैं।
चिन्तनक्षमतां विकासयन्ति ।वे सोचने की क्षमता का विकास करती हैं।
पूर्वजानां कवीनां बुद्धिमत्तां कल्पनाशक्तिं च दर्शयन्ति ।और वे हमारे पूर्वज कवियों की बुद्धिमत्ता तथा कल्पनाशक्ति को दिखाती हैं।
‘आबालवृद्धम्’ का अर्थ खोलिए: आ + बाल + वृद्धम् = बालक से लेकर वृद्ध तक। यह अव्ययीभाव समास है, इसलिए रूप कभी नहीं बदलता। इसी तरह ‘आजन्म’ = जन्म से लेकर, ‘आसमुद्रम्’ = समुद्र तक।
Tip — पाठ के शीर्षक का अर्थ: यः जानाति सः पण्डितः = ‘जो जानता है, वही पण्डित है’। यह पंक्ति तीसरी और पाँचवीं प्रहेलिका के अन्तिम चरण से ली गई है — यानी शीर्षक स्वयं पाठ के भीतर से आया है।
प्र2.
भोजनान्ते च किं पेयं जयन्तः कस्य वै सुतः । कथं विष्णुपदं प्रोक्तं तक्रं शक्रस्य दुर्लभम् ॥ १ ॥ — विवरणम् – भोजनस्य अन्ते किं पानीयम् ? (......) । जयन्तः कस्य पुत्रः ? (......) । विष्णोः सान्निध्यं कथम् उक्तम् ? (......) ।
उत्तर

तीनों प्रश्नों के उत्तर श्लोक के चौथे चरण में ही रख दिए गए हैं — यही इस प्रहेलिका की चतुराई है।

भोजन के अन्त में पेय — तक्रम्
जयन्त का पिता — शक्रः (इन्द्रः) → शक्रस्य
विष्णुपद कैसा कहा गया — दुर्लभम्
अन्तिम चरण = तक्रं शक्रस्य दुर्लभम्
विवरणम् (प्रश्नः)उत्तरम्हिन्दी
भोजनस्य अन्ते किं पानीयम् ?तक्रम्भोजन के अन्त में छाछ पीनी चाहिए।
जयन्तः कस्य पुत्रः ?शक्रस्यजयन्त इन्द्र का पुत्र है।
विष्णोः सान्निध्यं कथम् उक्तम् ?दुर्लभम्विष्णु का सान्निध्य (विष्णुपद) दुर्लभ कहा गया है।
अन्वयः तथा अर्थः: अन्वय — भोजनान्ते च किं पेयम् ? जयन्तः वै कस्य सुतः ? विष्णुपदं कथं प्रोक्तम् ? (उत्तरम् —) तक्रं, शक्रस्य, दुर्लभम् ।
अर्थ — भोजन के अन्त में क्या पीना चाहिए? जयन्त किसका पुत्र है? विष्णुपद को कैसा कहा गया है? — उत्तर क्रमशः छाछ, इन्द्र का, और दुर्लभ।
भाव — तीन अलग-अलग विषयों (आहार, पुराण, अध्यात्म) के प्रश्न एक ही पंक्ति में उत्तर पा जाते हैं। कवि पढ़ने वाले से कहता है — ‘देखो, उत्तर तुम्हारे सामने ही लिखा है, पहचानो तो!’
शब्द-सङ्केत: शक्रः इन्द्र का पर्याय है (शक् = समर्थ होना → शक्तिशाली)। तक्रम् = मथा हुआ दही, छाछ; आयुर्वेद भी भोजन के बाद तक्र-पान को पाचक मानता है। विष्णुपदम् के दो अर्थ हैं — आकाश, तथा विष्णु का परम पद (मोक्ष) — दोनों ही ‘दुर्लभ’ हैं।
प्र3.
न तस्यादिर्न तस्यान्तो मध्ये यस्तस्य तिष्ठति । तवाप्यस्ति ममाप्यस्ति यदि जानासि तद्वद ॥ २ ॥ — विवरणम् – तस्य आदिः ‘न’ अस्ति, तस्य अन्तः अपि ‘न’ अस्ति, तस्य मध्ये ‘य’ तिष्ठति । तत् तव अपि अस्ति । मम अपि अस्ति । यदि जानासि तत् वद – (......) ।
उत्तर

उत्तर है — नयनम् (आँख)।

न  +  य  +  न  =  नयनम्
आदि अक्षर = · मध्य अक्षर = · अन्त्य अक्षर =
यह तुम्हारे पास भी है, मेरे पास भी — आँख
अन्वयः तथा अर्थः: अन्वय — तस्य आदिः न (कारः), तस्य अन्तः (अपि) न (कारः), तस्य मध्ये यः (कारः) तिष्ठति; तव अपि अस्ति, मम अपि अस्ति — यदि जानासि तत् वद ।
अर्थ — उसका पहला अक्षर ‘न’ है, अन्तिम अक्षर भी ‘न’ है, और बीच में ‘य’ रहता है। वह तुम्हारे पास भी है और मेरे पास भी। यदि जानते हो तो बताओ।
भाव — यह अक्षर-प्रहेलिका है — उत्तर वस्तु में नहीं, शब्द की बनावट में छिपा है। कवि पहले शब्द का ढाँचा देता है, फिर संकेत देता है कि वह वस्तु सबके पास है — दोनों संकेत मिलाने पर ही ‘नयनम्’ निकलता है।
ध्यान दें — श्लोक में सन्धि खुली कीजिए: ‘तस्यादिः’ = तस्य + आदिः (दीर्घ सन्धि)। ‘तस्यान्तः’ = तस्य + अन्तः। ‘तवाप्यस्ति’ = तव + अपि + अस्ति। ‘ममाप्यस्ति’ = मम + अपि + अस्ति। ‘तद्वद’ = तत् + वद। सन्धि खोलते ही श्लोक विवरणम् जैसा सरल हो जाता है।
प्र4.
वृक्षस्याग्रे फलं दृष्टं फलाग्रे वृक्ष एव च । अकारादिं सकारान्तं यो जानाति स पण्डितः ॥ ३ ॥ — विवरणम् – वृक्षस्य अग्रे फलं दृष्टं, फलस्य अग्रे वृक्षः एव च । अकारः यस्य आदिः, तथैव सकारः यस्य अन्ते अस्ति, तत् पदं यः जानाति सः पण्डितः – (......) ।
उत्तर

उत्तर है — अनानसः (अनन्नास, pineapple)।

नानसः → आदि में , अन्त में
पौधे के ऊपर फल, और फल के ऊपर फिर पत्तों का मुकुट = ‘वृक्ष’
उत्तरम् — अनानसः
अन्वयः तथा अर्थः: अन्वय — वृक्षस्य अग्रे फलं दृष्टम्, फलस्य अग्रे च वृक्षः एव (दृष्टः); अकारादिं सकारान्तं (तत् पदं) यः जानाति सः पण्डितः ।
अर्थ — पेड़ के ऊपर फल दिखाई देता है, और फल के ऊपर फिर पेड़ ही दिखाई देता है। जिस शब्द का आरम्भ ‘अ’ से और अन्त ‘स’ से होता है, उसे जो जान ले वही पण्डित है।
भाव — यह प्रहेलिका देखने की आदत पर चोट करती है। साधारणतः फल पेड़ के ऊपर होता है — पर अनन्नास में फल के ऊपर भी हरे पत्तों का गुच्छा (मुकुट) होता है, जो छोटे पौधे जैसा दिखता है। कवि इसी उलटी-सी बात को पहेली बना देता है और साथ में अक्षर-संकेत (अ…स) भी जोड़ देता है, ताकि उत्तर एक ही निकले।
Try this: इसी ढाँचे पर अपनी पहेली बनाइए — ‘क’ से आरम्भ, ‘म’ से अन्त, जो पीला होता है और गुच्छे में लगता है (उत्तरम् — कदलीफलम्)। फिर एक नई पहेली स्वयं रचकर कक्षा में पूछिए।
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