दीपकम् अध्याय 11 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
प्रकृष्टा हेलिका – प्रहेलिका । हेला इत्यस्य क्रीडा इत्यर्थः अस्ति । प्रहिलति अभिप्रायं सूचयति इति प्रहेलिका । विनोदकलासु प्रहेलिका अन्तर्गता भवति । — ‘प्रहेलिका’ इति शब्दस्य निर्वचनं स्पष्टीकुर्वन्तु ।
उत्तर

‘प्रहेलिका’ शब्द कैसे बना, पुस्तक तीन तरीक़ों से बताती है।

प्र (प्रकृष्ट = श्रेष्ठ) + हेलिकाप्रहेलिका
हेला = क्रीडा (खेल) → प्रहेलिका = ‘श्रेष्ठ खेल’
प्रहिलति = अभिप्रायं सूचयति (संकेत से अर्थ बताती है)
संस्कृतम्हिन्दी अनुवादः
प्रकृष्टा हेलिका – प्रहेलिका ।श्रेष्ठ ‘हेलिका’ ही ‘प्रहेलिका’ है।
हेला इत्यस्य क्रीडा इत्यर्थः अस्ति ।‘हेला’ शब्द का अर्थ खेल है।
प्रहिलति अभिप्रायं सूचयति इति प्रहेलिका ।जो संकेत से अपना अभिप्राय सुझा दे, वह प्रहेलिका है।
विनोदकलासु प्रहेलिका अन्तर्गता भवति ।मनोरंजन की कलाओं में प्रहेलिका भी सम्मिलित है।
इसका मतलब क्या निकला: प्रहेलिका केवल हँसी-मज़ाक़ नहीं है — वह खेल भी है और संकेत की कला भी। उत्तर सीधे नहीं बताया जाता, केवल इशारा किया जाता है; उस इशारे को पकड़ना ही बुद्धि का व्यायाम है। इसीलिए इसे ‘विनोदकला’ की श्रेणी में रखा गया है।
प्र2.
षष्ठीविभक्तेः परिचयं प्राप्नुवन्तु — यत्र सम्बन्धः भवति तत्र षष्ठी विभक्तिः भवति । यथा – ‘बालकस्य पुस्तकम्’ अत्र पुस्तकस्य सम्बन्धः बालकेन सह अस्ति अतः ‘बालक’ इति शब्दे षष्ठी विभक्तिः अस्ति । — नियमं स्पष्टीकृत्य पञ्च उदाहरणानि लिखन्तु ।
उत्तर

पूरे पाठ का व्याकरण-नियम यही एक वाक्य है — यत्र सम्बन्धः भवति तत्र षष्ठी विभक्तिः भवति

बालकस्य पुस्तकम् = बालक का पुस्तक
पुस्तक का सम्बन्ध बालक से है → ‘बालक’ में षष्ठी
हिन्दी-चिह्न : का · के · की · रा · रे · री
उदाहरणम्षष्ठ्यन्तं पदम्हिन्दी
रामस्य पिता दशरथः ।रामस्यराम के पिता दशरथ हैं।
सीतायाः माता सुनयना ।सीतायाःसीता की माता सुनयना हैं।
कुलालस्य गृहे कुम्भः अस्ति ।कुलालस्यकुम्हार के घर में घड़ा है।
छात्राणां पुस्तकानि सन्ति ।छात्राणाम्छात्रों की पुस्तकें हैं।
मम मातुः नाम सुनीता ।मम, मातुःमेरी माता का नाम सुनीता है।
सावधानी — हर ‘का/के/की’ षष्ठी नहीं: ‘वृक्षस्य उपरि’ में भी षष्ठी है, पर वहाँ अर्थ ‘का’ नहीं, ‘के ऊपर’ है — उपरि, अधः, समीपे, पुरतः, पृष्ठतः जैसे अव्ययों के साथ भी षष्ठी आती है। षष्ठी का मूल काम एक ही है — दो पदों को जोड़ना
Tip — पहचान का सरल तरीक़ा: वाक्य में उस पद को ढूँढ़िए जिसके बाद हिन्दी में ‘का/के/की’ आता है। संस्कृत में उसी पद पर -स्य / -आयाः / -याः / -योः / -आनाम् लगेगा।
प्र3.
अधोलिखितं गीतं सस्वरं गायन्तु स्मरन्तु च — हस्तकुटुम्बकम् : एषः स्नेहालुः तातः – अङ्गुष्ठः ॥ निकटे निवसति ननु माता – तर्जनी ॥ ज्येष्ठा पुत्री दीर्घतमा – मध्यमा ॥ तस्याः भगिनी मनोरमा – अनामिका ॥ कनिष्ठबाला अन्ते च – कनिष्ठिका ॥ हस्तकुटुम्बं मम पश्य । हस्तद्वयेन प्रणमामि । आशीर्वादं विन्दामि ॥
उत्तर

यह एक प्यारा-सा गीत है जिसमें हाथ की पाँच अँगुलियाँ एक कुटुम्ब बन जाती हैं — इसी बहाने कुटुम्ब-शब्द और अँगुलियों के संस्कृत नाम दोनों याद हो जाते हैं।

गीतपङ्क्तिःअङ्गुलिःहिन्दी अर्थः
एषः स्नेहालुः तातःअङ्गुष्ठःयह स्नेह करने वाले पिता हैं — अँगूठा।
निकटे निवसति ननु मातातर्जनीपास में ही तो माता रहती हैं — तर्जनी (पहली अँगुली)।
ज्येष्ठा पुत्री दीर्घतमामध्यमासबसे लम्बी बड़ी बेटी — मध्यमा (बीच की अँगुली)।
तस्याः भगिनी मनोरमाअनामिकाउसकी सुन्दर बहन — अनामिका।
कनिष्ठबाला अन्ते चकनिष्ठिकाऔर अन्त में सबसे छोटी बच्ची — कनिष्ठिका।
हस्तकुटुम्बं मम पश्य ।मेरे हाथ के इस कुटुम्ब को देखो।
हस्तद्वयेन प्रणमामि ।दोनों हाथों से प्रणाम करता हूँ।
आशीर्वादं विन्दामि ॥और आशीर्वाद पाता हूँ।
गीत की सुन्दरता: अँगुलियाँ आकार के क्रम से ही कुटुम्ब में बाँटी गई हैं — मोटा और अलग खड़ा अँगूठा ‘तात’, उससे लगी हुई तर्जनी ‘माता’, सबसे लम्बी मध्यमा ‘ज्येष्ठा पुत्री’ (दीर्घतमा = सबसे लम्बी), और अन्त में सबसे छोटी कनिष्ठिका ‘कनिष्ठबाला’। अन्त की तीन पंक्तियाँ बताती हैं कि यही पाँचों मिलकर प्रणाम की मुद्रा बनाती हैं और आशीर्वाद पाती हैं — कुटुम्ब का असली अर्थ ‘साथ रहना’ ही है।
Try this: गाते समय हर पंक्ति पर वही अँगुली उठाइए। पाँच पंक्तियों में पाँचों नाम याद हो जाएँगे — अङ्गुष्ठः, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठिका
प्र4.
अधोलिखितान् श्लोकान् पठन्तु अवगच्छन्तु स्मरन्तु च — (१) अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् । अधनस्य कुतो मित्रम् अमित्रस्य कुतः सुखम् ॥ (२) हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् । श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम् ॥
उत्तर

दोनों सुभाषित इसी पाठ के व्याकरण से जुड़े हैं — हर चरण में एक षष्ठ्यन्त पद है।

श्लोकः १ — अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् । अधनस्य कुतो मित्रम् अमित्रस्य कुतः सुखम् ॥

अन्वयः — अलसस्य विद्या कुतः ? अविद्यस्य धनं कुतः ? अधनस्य मित्रं कुतः ? अमित्रस्य सुखं कुतः ?

हिन्दी अर्थ — आलसी को विद्या कहाँ से मिले? जिसके पास विद्या नहीं, उसे धन कहाँ से मिले? जिसके पास धन नहीं, उसे मित्र कहाँ से मिले? और जिसका कोई मित्र नहीं, उसे सुख कहाँ से मिले?

भावः — यह एक श्रृंखला है — आलस्य → अविद्या → निर्धनता → मित्रहीनता → दुःख। कवि सीधे ‘आलस्य मत करो’ नहीं कहता; वह दिखा देता है कि एक ही दोष से कैसे चार हानियाँ जन्म लेती हैं। सुख की जड़ में परिश्रम है — यही सन्देश है।

श्लोकः २ — हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् । श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम् ॥

अन्वयः — हस्तस्य भूषणं दानम् (अस्ति), सत्यं कण्ठस्य भूषणम् (अस्ति), शास्त्रं श्रोत्रस्य भूषणम् (अस्ति); (अन्यैः) भूषणैः किं प्रयोजनम् ?

हिन्दी अर्थ — हाथ का गहना दान है, कण्ठ (गले) का गहना सत्य वचन है, और कान का गहना शास्त्र-श्रवण है। फिर (सोने-चाँदी के) गहनों से क्या प्रयोजन?

भावः — कवि शरीर के तीन अङ्गों के ‘असली गहने’ गिनाता है — हाथ शोभा पाता है देने से, कण्ठ सच बोलने से, कान अच्छी बातें सुनने से। अन्तिम चरण प्रश्न बनकर पूरे श्लोक को धार दे देता है — जब गुण ही सबसे बड़ा आभूषण है, तो बाहरी गहनों की क्या आवश्यकता?
व्याकरण-सङ्केत: दोनों श्लोकों के हर चरण में षष्ठी एकवचन के रूप हैं — अलसस्य, अविद्यस्य, अधनस्य, अमित्रस्य, हस्तस्य, कण्ठस्य, श्रोत्रस्य (सब अकारान्त → -स्य)। दूसरे श्लोक के अन्त में ‘भूषणैः’ तृतीया बहुवचन है — ‘गहनों से’।
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