दोनों सुभाषित इसी पाठ के व्याकरण से जुड़े हैं — हर चरण में एक षष्ठ्यन्त पद है।
श्लोकः १ — अलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् । अधनस्य कुतो मित्रम् अमित्रस्य कुतः सुखम् ॥
अन्वयः — अलसस्य विद्या कुतः ? अविद्यस्य धनं कुतः ? अधनस्य मित्रं कुतः ? अमित्रस्य सुखं कुतः ?
हिन्दी अर्थ — आलसी को विद्या कहाँ से मिले? जिसके पास विद्या नहीं, उसे धन कहाँ से मिले? जिसके पास धन नहीं, उसे मित्र कहाँ से मिले? और जिसका कोई मित्र नहीं, उसे सुख कहाँ से मिले?
भावः — यह एक श्रृंखला है — आलस्य → अविद्या → निर्धनता → मित्रहीनता → दुःख। कवि सीधे ‘आलस्य मत करो’ नहीं कहता; वह दिखा देता है कि एक ही दोष से कैसे चार हानियाँ जन्म लेती हैं। सुख की जड़ में परिश्रम है — यही सन्देश है।
श्लोकः २ — हस्तस्य भूषणं दानं सत्यं कण्ठस्य भूषणम् । श्रोत्रस्य भूषणं शास्त्रं भूषणैः किं प्रयोजनम् ॥
अन्वयः — हस्तस्य भूषणं दानम् (अस्ति), सत्यं कण्ठस्य भूषणम् (अस्ति), शास्त्रं श्रोत्रस्य भूषणम् (अस्ति); (अन्यैः) भूषणैः किं प्रयोजनम् ?
हिन्दी अर्थ — हाथ का गहना दान है, कण्ठ (गले) का गहना सत्य वचन है, और कान का गहना शास्त्र-श्रवण है। फिर (सोने-चाँदी के) गहनों से क्या प्रयोजन?
भावः — कवि शरीर के तीन अङ्गों के ‘असली गहने’ गिनाता है — हाथ शोभा पाता है देने से, कण्ठ सच बोलने से, कान अच्छी बातें सुनने से। अन्तिम चरण प्रश्न बनकर पूरे श्लोक को धार दे देता है — जब गुण ही सबसे बड़ा आभूषण है, तो बाहरी गहनों की क्या आवश्यकता?
व्याकरण-सङ्केत: दोनों श्लोकों के हर चरण में षष्ठी एकवचन के रूप हैं — अलसस्य, अविद्यस्य, अधनस्य, अमित्रस्य, हस्तस्य, कण्ठस्य, श्रोत्रस्य (सब अकारान्त → -स्य)। दूसरे श्लोक के अन्त में ‘भूषणैः’ तृतीया बहुवचन है — ‘गहनों से’।