प्र1.
अम्बा — राकेश ! कुत्र असि ? अत्र आगच्छ । राकेशः — आम् अम्ब ! कथय किं कार्यं करवाणि ? … अम्बा — अस्तु । मार्गे यानानां गतिं पश्यतु । अनन्तरं सावधानं पारं गच्छतु । राकेशः — आम् । अहं गच्छामि । — अस्य सम्पूर्णस्य संवादस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर
पाठ का पहला दृश्य घर का है। माँ राकेश को सूची, थैला और पैसे देकर बाज़ार भेज रही है — और साथ में सड़क पार करने की सीख भी दे रही है।
| संस्कृतम् (मूल संवादः) | हिन्दी अनुवादः |
|---|---|
| अम्बा — राकेश ! कुत्र असि ? अत्र आगच्छ । | माँ — राकेश! कहाँ हो? यहाँ आओ। |
| राकेशः — आम् अम्ब ! कथय किं कार्यं करवाणि ? | राकेश — हाँ माँ! बताइए, मैं क्या काम करूँ? |
| अम्बा — अद्य तव तातः कार्यालयात् विलम्बेन आगमिष्यति । त्वम् आपणं गच्छ । वस्तूनि आनय । वस्तूनां नामावली अपि अत्र अस्ति । | माँ — आज तुम्हारे पिताजी कार्यालय से देर से आएँगे। तुम बाज़ार जाओ। सामान ले आओ। सामान की सूची भी यहीं है। |
| राकेशः — अस्तु । स्यूतं ददातु । वस्तूनां नामावलीम् अहं स्वीकरोमि । | राकेश — ठीक है। थैला दीजिए। सामान की सूची मैं ले लेता हूँ। |
| अम्बा — स्वीकुरु । धनम् अपि नय । | माँ — ले लो। पैसे भी ले जाओ। |
| राकेशः — अम्ब ! इतोऽपि एकं वस्तु स्वीकरवाणि ? | राकेश — माँ! इसके अलावा एक चीज़ और ले लूँ? |
| अम्बा — चाकलेहम् इच्छति खलु वत्स ! जानातु, अधिकं चाकलेह-खादनं स्वास्थ्याय हानिकरं भवति । | माँ — चॉकलेट चाहिए न, बेटा! (यह भी) जान लो — ज़्यादा चॉकलेट खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। |
| राकेशः — केवलम् अद्य एव स्वीकरोमि । | राकेश — केवल आज ही लूँगा। |
| अम्बा — अस्तु । मार्गे यानानां गतिं पश्यतु । अनन्तरं सावधानं पारं गच्छतु । | माँ — ठीक है। रास्ते में गाड़ियों की चाल (आवाजाही) देख लेना। उसके बाद सावधानी से (सड़क के) उस पार जाना। |
| राकेशः — आम् । अहं गच्छामि । | राकेश — हाँ। मैं जा रहा हूँ। |
| (चित्रस्य अधः) राकेशः विपणिं गच्छति । | (चित्र के नीचे) राकेश बाज़ार जा रहा है। |
दो शब्दों का अन्तर समझ लीजिए: आपणम् = दुकान/वस्तु-विक्रय-केन्द्र, और विपणिम् = बाज़ार की पूरी गली (आपण-वीथिम्)। इसीलिए माँ कहती है ‘आपणं गच्छ’ (दुकान जाओ) और चित्र के नीचे लिखा है ‘विपणिं गच्छति’ (बाज़ार जा रहा है)। दोनों ही द्वितीया विभक्ति, एकवचन में हैं, क्योंकि ‘गम्’ धातु का कर्म द्वितीया में आता है।
Did you know? माँ पहले ‘गच्छ, आनय, स्वीकुरु, नय’ (मध्यमपुरुष — ‘तुम जाओ’) कहती है, पर अन्त में ‘जानातु, पश्यतु, गच्छतु’ (प्रथमपुरुष — ‘जान लें, देखें, जाएँ’) कहती है। यह पुस्तक ने जान-बूझकर किया है, ताकि एक ही संवाद में लोट्लकार के दोनों प्रकार के रूप विद्यार्थी को दिख जाएँ। संस्कृत में प्रथमपुरुष का रूप आदर तथा स्नेह दोनों के लिए चलता है।