प्र1.
पुस्तकात् लोट्लकारस्य क्रियापदानि चित्वा लिखन्तु ।
उत्तर
यह संग्रह-कार्य है — पूरी पुस्तक दीपकम् पलटकर उन क्रियापदों पर निशान लगाइए जिनका अन्त -तु, -ताम्, -न्तु, -तम्, -त, -आनि, -आव, -आम हो, या जो केवल धातु-रूप में हों (गच्छ, पठ, वद)।
ढूँढ़ने की विधि: तीन जगहें सबसे अधिक फल देती हैं — (1) संवाद-पाठ, क्योंकि बातचीत में आज्ञा और प्रार्थना बार-बार आती है; (2) अभ्यास के निर्देश-वाक्य, जो प्रायः ‘…न्तु’ में समाप्त होते हैं; (3) श्लोक और सुभाषित, जो प्रार्थना के होते हैं।
नमूना उत्तर (केवल द्वादश पाठात् सङ्गृहीतानि) —
| स्थानम् | लोट्लकारस्य क्रियापदानि |
|---|---|
| पाठे (पृष्ठ 121–122) | आगच्छ, करवाणि, गच्छ, आनय, ददातु, स्वीकुरु, नय, स्वीकरवाणि, जानातु, पश्यतु, गच्छतु, यच्छानि, योजयतु, स्वीकरोतु, आगच्छतु |
| पठन्तु अवगच्छन्तु (पृष्ठ 123) | पिबतु, उत्तिष्ठत, खादन्तु, पृच्छानि, पठ, गच्छाम |
| अभ्यासस्य निर्देशवाक्येषु | पश्यन्तु, पूरयन्तु, लिखन्तु, योजयन्तु, कुर्वन्तु, गायत, अवलोकयत, कण्ठस्थीकुरुत |
| सुभाषितेषु (पृष्ठ 125–126) | वर्षतु, सन्तु, भवन्तु, पश्यन्तु, निन्दन्तु, स्तुवन्तु, समाविशतु, गच्छतु, अस्तु |
| गीते (पृष्ठ 129) | कुरु, भव, मानय, भज, मोदय, पाठय, शिक्षय, वारय, अपनय, त्यज, वद, चल, पिब, नय, पाहि, पालय, लालय |
Tip: हर पद के आगे उसका पुरुष और वचन भी लिख दीजिए — तब यह केवल सूची नहीं, अभ्यास बन जाएगा। जैसे — ‘गच्छतु — प्रथमपुरुषः, एकवचनम्’, ‘गायत — मध्यमपुरुषः, बहुवचनम्’। पुस्तक के अन्य पाठों से भी कम-से-कम दस पद जोड़िए, तभी परियोजना पूरी मानी जाएगी।