प्र1.
कुरु उपकारं, कुरु उद्धारम् — मा कुरु दर्पं, मा कुरु गर्वं मा भव मानी, मानय सर्वम् । मा भज दैन्यं, मा भज शोकं मुदितमना भव, मोदय लोकम् ॥ … मा नय क्षणमपि व्यर्थं समयं कुरु सकलं निजकार्यं सभयम् ॥ — वासुदेवद्विवेदी शास्त्री । (एतत् गीतं कण्ठस्थीकुरुत, समूहरूपेण गायत लोट्लकाररूपाणि च अवलोकयत ।) — गीतस्य हिन्दी-अर्थं लिखन्तु, लोट्लकारस्य रूपाणि च चिनुत ।
उत्तर
यह पूरा गीत ही लोट्लकार की पाठशाला है — हर पंक्ति में या तो आज्ञा है (‘कुरु’, ‘भव’, ‘पाहि’) या निषेध (‘मा कुरु’, ‘मा वद’)।
| गीतस्य पङ्क्तिः | हिन्दी अर्थः |
|---|---|
| मा कुरु दर्पं, मा कुरु गर्वं मा भव मानी, मानय सर्वम् । | घमंड मत करो, अभिमान मत करो, अकड़ने वाले मत बनो — सबका सम्मान करो। |
| मा भज दैन्यं, मा भज शोकं मुदितमना भव, मोदय लोकम् ॥ | दीनता मत अपनाओ, शोक मत करो — प्रसन्न मन वाले बनो और संसार को भी आनन्दित करो। |
| तनयं पाठय, तनयां पाठय शिक्षय सुगुणं, दुर्गुणं वारय । | बेटे को पढ़ाओ और बेटी को भी पढ़ाओ; अच्छे गुण सिखाओ और बुरे गुणों को रोको। |
| कुरु उपकारं, कुरु उद्धारम् अपनय भारं, त्यज अपकारम् ॥ | उपकार करो, (दूसरों का) उद्धार करो; (उनका) बोझ हटाओ, बुराई करना छोड़ दो। |
| मा वद मिथ्या, मा वद व्यर्थं न चल कुमार्गे, न कुरु अनर्थम् । | झूठ मत बोलो, व्यर्थ मत बोलो; बुरे रास्ते पर मत चलो, अनर्थ मत करो। |
| पाहि अनाथं, पालय दीनं लालय जननी-जनक-विहीनम् ॥ | अनाथ की रक्षा करो, दीन का पालन करो; जिसके माता-पिता नहीं हैं, उसे स्नेह से पालो। |
| मा पिब मादकवस्तु अपेयम् मा भज दुर्व्यसनं परिहेयम् । | न पीने योग्य नशीली वस्तु मत पिओ; छोड़ने योग्य बुरी लत मत अपनाओ। |
| मा नय क्षणमपि व्यर्थं समयं कुरु सकलं निजकार्यं सभयम् ॥ | समय का एक क्षण भी व्यर्थ मत जाने दो; अपना सारा काम (समय बीत जाने के) भय के साथ, अर्थात् पूरी सतर्कता से करो। |
| प्रकारः | गीते प्रयुक्तानि लोट्लकारस्य रूपाणि |
|---|---|
| विधि (आज्ञा) | कुरु, मानय, भव, मोदय, पाठय, शिक्षय, वारय, अपनय, त्यज, पाहि, पालय, लालय |
| निषेध (मा / न सह) | मा कुरु, मा भव, मा भज, मा वद, मा पिब, मा नय, न चल, न कुरु |
सब रूप एक ही खाने के हैं: गीत के सारे क्रियापद लोट्लकार, मध्यमपुरुष, एकवचन के हैं — क्योंकि कवि सीधे ‘तुम’ से बात कर रहा है। ‘पाहि’ (पा धातु = रक्षा करना) और ‘कुरु’ (कृ धातु) दो विशेष रूप हैं, जो साधारण साँचे से नहीं बनते — इन्हें याद कर लीजिए।
Did you know? ‘तनयं पाठय, तनयां पाठय’ — कवि ने बेटे और बेटी दोनों के लिए ठीक एक ही शब्द ‘पाठय’ दोहराया है। एक ही पंक्ति में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का सन्देश आ गया। ‘तनयः’ = पुत्र, ‘तनया’ = पुत्री; द्वितीया एकवचन में तनयम् / तनयाम्।