दीपकम् अध्याय 12 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कुरु उपकारं, कुरु उद्धारम् — मा कुरु दर्पं, मा कुरु गर्वं मा भव मानी, मानय सर्वम् । मा भज दैन्यं, मा भज शोकं मुदितमना भव, मोदय लोकम् ॥ … मा नय क्षणमपि व्यर्थं समयं कुरु सकलं निजकार्यं सभयम् ॥ — वासुदेवद्विवेदी शास्त्री । (एतत् गीतं कण्ठस्थीकुरुत, समूहरूपेण गायत लोट्लकाररूपाणि च अवलोकयत ।) — गीतस्य हिन्दी-अर्थं लिखन्तु, लोट्लकारस्य रूपाणि च चिनुत ।
उत्तर

यह पूरा गीत ही लोट्लकार की पाठशाला है — हर पंक्ति में या तो आज्ञा है (‘कुरु’, ‘भव’, ‘पाहि’) या निषेध (‘मा कुरु’, ‘मा वद’)।

गीतस्य पङ्क्तिःहिन्दी अर्थः
मा कुरु दर्पं, मा कुरु गर्वं मा भव मानी, मानय सर्वम् ।घमंड मत करो, अभिमान मत करो, अकड़ने वाले मत बनो — सबका सम्मान करो।
मा भज दैन्यं, मा भज शोकं मुदितमना भव, मोदय लोकम् ॥दीनता मत अपनाओ, शोक मत करो — प्रसन्न मन वाले बनो और संसार को भी आनन्दित करो।
तनयं पाठय, तनयां पाठय शिक्षय सुगुणं, दुर्गुणं वारय ।बेटे को पढ़ाओ और बेटी को भी पढ़ाओ; अच्छे गुण सिखाओ और बुरे गुणों को रोको।
कुरु उपकारं, कुरु उद्धारम् अपनय भारं, त्यज अपकारम् ॥उपकार करो, (दूसरों का) उद्धार करो; (उनका) बोझ हटाओ, बुराई करना छोड़ दो।
मा वद मिथ्या, मा वद व्यर्थं न चल कुमार्गे, न कुरु अनर्थम् ।झूठ मत बोलो, व्यर्थ मत बोलो; बुरे रास्ते पर मत चलो, अनर्थ मत करो।
पाहि अनाथं, पालय दीनं लालय जननी-जनक-विहीनम् ॥अनाथ की रक्षा करो, दीन का पालन करो; जिसके माता-पिता नहीं हैं, उसे स्नेह से पालो।
मा पिब मादकवस्तु अपेयम् मा भज दुर्व्यसनं परिहेयम् ।न पीने योग्य नशीली वस्तु मत पिओ; छोड़ने योग्य बुरी लत मत अपनाओ।
मा नय क्षणमपि व्यर्थं समयं कुरु सकलं निजकार्यं सभयम् ॥समय का एक क्षण भी व्यर्थ मत जाने दो; अपना सारा काम (समय बीत जाने के) भय के साथ, अर्थात् पूरी सतर्कता से करो।
प्रकारःगीते प्रयुक्तानि लोट्लकारस्य रूपाणि
विधि (आज्ञा)कुरु, मानय, भव, मोदय, पाठय, शिक्षय, वारय, अपनय, त्यज, पाहि, पालय, लालय
निषेध (मा / न सह)मा कुरु, मा भव, मा भज, मा वद, मा पिब, मा नय, न चल, न कुरु
सब रूप एक ही खाने के हैं: गीत के सारे क्रियापद लोट्लकार, मध्यमपुरुष, एकवचन के हैं — क्योंकि कवि सीधे ‘तुम’ से बात कर रहा है। ‘पाहि’ (पा धातु = रक्षा करना) और ‘कुरु’ (कृ धातु) दो विशेष रूप हैं, जो साधारण साँचे से नहीं बनते — इन्हें याद कर लीजिए।
Did you know?तनयं पाठय, तनयां पाठय’ — कवि ने बेटे और बेटी दोनों के लिए ठीक एक ही शब्द ‘पाठय’ दोहराया है। एक ही पंक्ति में ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का सन्देश आ गया। ‘तनयः’ = पुत्र, ‘तनया’ = पुत्री; द्वितीया एकवचन में तनयम् / तनयाम्।
प्र2.
लोट्लकारस्य क्रियापदे अधोलिखितानि चिह्नानि भवन्ति । — एकवचनम् / द्विवचनम् / बहुवचनम् : प्रथमपुरुषः — अतु, अताम्, अन्तु ; मध्यमपुरुषः — अ, अतम्, अत ; उत्तमपुरुषः — आनि, आव, आम ।
उत्तर

यही नौ प्रत्यय पूरे पाठ की कुंजी हैं। धातु का लट्लकार वाला अङ्ग लीजिए और उसमें ये जोड़ दीजिए।

लोट्लकारस्य चिह्नानिएकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
प्रथमपुरुषःअतुअताम्अन्तु
मध्यमपुरुषःअतम्अत
उत्तमपुरुषःआनिआवआम

अभ्यास के लिए ‘खाद्’ धातु के नौ रूप स्वयं बनाकर देखिए —

प्रथमपुरुषः : खाद् + अतु = खादतु | खाद् + अताम् = खादताम् | खाद् + अन्तु = खादन्तु
मध्यमपुरुषः : खाद् + अ = खाद | खाद् + अतम् = खादतम् | खाद् + अत = खादत
उत्तमपुरुषः : खाद् + आनि = खादानि | खाद् + आव = खादाव | खाद् + आम = खादाम
लट् और लोट् की तुलना से याद कीजिए: केवल तीन खाने वास्तव में नए हैं — प्रथमपुरुष का अतु/अन्तु (लट् में अति/अन्ति), मध्यमपुरुष एकवचन का शून्य प्रत्यय (लट् में असि), और उत्तमपुरुष का आनि/आव/आम (लट् में आमि/आवः/आमः)। बाकी खाने लट् जैसे ही सुनाई देते हैं।
Check it yourself: पृष्ठ 124 की ‘पठ्’ तालिका और यह चिह्न-तालिका साथ-साथ रखिए — पठ् + अतु = पठतु, पठ् + आनि = पठानि। दोनों तालिकाएँ ठीक मिल जाती हैं।
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