पहले सीधा उत्तर — हर सुभाषित के लोट्-क्रियापद — फिर हर श्लोक का अन्वय, अर्थ और भाव।
(क) काले वर्षतु पर्जन्यः …
अन्वयः — पर्जन्यः काले वर्षतु । पृथिवी सस्यशालिनी (भवतु) । अयं देशः क्षोभरहितः (भवतु) । सज्जनाः निर्भयाः सन्तु ।
अर्थः — बादल समय पर बरसें। पृथ्वी अन्न से भरपूर हो। यह देश उपद्रव से रहित हो। सज्जन लोग निर्भय रहें।
भावः — यह सामूहिक मङ्गल की प्रार्थना है — प्रकृति ठीक चले, देश शान्त रहे और अच्छे लोग बिना डर के जिएँ। तीनों बातें एक-दूसरे से जुड़ी हैं।
पुस्तक का संस्कृत-भावार्थ: मेघाः उचिते समये वर्षन्तु । तेन भूमिः सस्यैः समृद्धा पूर्णा च भवतु । एषः देशः शान्तः भवतु । सर्वे सज्जनाः भयं विना जीवनं यापयन्तु । (एवं परमेश्वरं प्रति प्रार्थना अस्ति ।)
(ख) सर्वे भवन्तु सुखिनः …
अन्वयः — सर्वे सुखिनः भवन्तु । सर्वे निरामयाः सन्तु । सर्वे भद्राणि पश्यन्तु । कश्चिद् दुःखभाग् मा भवेत् ।
अर्थः — सब सुखी हों। सब नीरोग हों। सब कल्याणकारी बातें ही देखें। कोई भी दुःख का भागी न बने।
भावः — यह भारत का सबसे प्रसिद्ध शान्ति-मन्त्र है। इसमें ‘मेरा’ या ‘हमारा’ शब्द एक बार भी नहीं आता — केवल सर्वे (सब)। यही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना है।
पुस्तक का संस्कृत-भावार्थ: सर्वे जनाः सुखेन तिष्ठन्तु । सर्वे नीरोगाः भवन्तु । सर्वे शुभम् एव पश्यन्तु । कस्यापि कृते दुःखस्य अनुभवः न भवतु ।
सावधान — ‘भवेत्’ लोट् नहीं है: अन्तिम चरण का ‘दुःखभाग्भवेत्’ विधिलिङ् लकार का रूप है (‘होना चाहिए / हो’), लोट्लकार का नहीं। इसलिए उसे उत्तर में मत लिखिए। पहचान — विधिलिङ् में ‘एत्, एताम्, एयुः’ जैसे प्रत्यय आते हैं, लोट् में ‘तु, ताम्, अन्तु’।
(ग) इमा आपः शिवाः सन्तु …
अन्वयः — इमाः आपः शिवाः शुभाः स्वच्छाः निर्मलाः च सन्तु । (ताः आपः) सूर्यस्य रश्मिभिः पूताः पावनाः शीतलाः सन्तु ।
अर्थः — ये जल कल्याणकारी, शुभ, स्वच्छ और निर्मल हों। सूर्य की किरणों से पवित्र होकर ये जल पावन और शीतल हों।
भावः — यह वेद की जल-प्रार्थना है। आज की भाषा में यही जल-संरक्षण का सन्देश है — जल को गन्दा मत कीजिए, वही जीवन है।
पुस्तक का संस्कृत-भावार्थ: जलं सर्वेषां कृते मङ्गलमयं मालिन्यरहितं शुद्धं च भवतु । जलं पवित्रं शीतलं च भवतु । जलं सूर्यस्य प्रकाशस्य स्पर्शेन पवित्रं भवतु ।
Did you know? ‘आपः’ शब्द संस्कृत में सदा स्त्रीलिङ्ग तथा नित्य-बहुवचन है — इसीलिए उसके विशेषण भी बहुवचन में हैं (शिवाः, शुभाः, स्वच्छाः, निर्मलाः) और क्रिया भी बहुवचन में (सन्तु)। ‘आपः’ का एकवचन होता ही नहीं।
(घ) निन्दन्तु नीतिनिपुणा …
अन्वयः — नीतिनिपुणाः निन्दन्तु यदि वा स्तुवन्तु । लक्ष्मीः यथेष्टं समाविशतु वा गच्छतु । अद्य एव वा युगान्तरे वा मरणम् अस्तु । (तथापि) धीराः न्याय्यात् पथः पदं न प्रविचलन्ति ।
अर्थः — नीति के जानकार निन्दा करें अथवा प्रशंसा करें; लक्ष्मी (धन) अपनी इच्छा से आए अथवा चली जाए; मृत्यु आज ही हो जाए अथवा युगों के बाद हो — धीर (साहसी) पुरुष न्याय के मार्ग से एक कदम भी नहीं हटते।
भावः — यह भर्तृहरि के नीतिशतक का प्रसिद्ध श्लोक है। इसका सन्देश है — निन्दा, धन और मृत्यु, तीनों में से कोई भी डर सच्चे व्यक्ति को सही रास्ते से नहीं हटा सकता।
पुस्तक का संस्कृत-भावार्थ: नीतिकाराः प्रशंसन्तु अथवा निन्दां कुर्वन्तु । धनस्य लाभः भवतु अथवा धनहानिः भवतु । मरणं झटिति भवतु अथवा विलम्बेन भवतु । न्याय्यात् मार्गात् धीराः न विचलन्ति तत्रैव ते स्थिररूपेण तिष्ठन्ति ।
‘मरणमस्तु’ में सन्धि खोलिए: मरणम् + अस्तु = मरणमस्तु। यहाँ लोट्-पद ‘अस्तु’ (अस् धातु, प्रथमपुरुष एकवचन) छिपा है — जल्दी में विद्यार्थी इसे छोड़ देते हैं। इसी प्रकार ‘देशोऽयं’ = देशः + अयम्, ‘अद्यैव’ = अद्य + एव, ‘स्वच्छाश्च’ = स्वच्छाः + च।
Check it yourself: कुल मिलाकर चारों सुभाषितों में १२ लोट्-क्रियापद हैं (२ + ३ + २ + ५)। इनमें ‘सन्तु’ तीन बार आया है — (क) में एक बार और (ग) में दो बार।