दीपकम् अध्याय 13 सुभाषितानि (३ – ४)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः । न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ।। — अस्य सुभाषितस्य अन्वयं हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

परिश्रम का सबसे सीधा और सबसे सुन्दर उदाहरण इसी श्लोक में है — सोया हुआ शेर।

पदच्छेदः — उद्यमेन । हि । सिद्ध्यन्ति । कार्याणि । न । मनोरथैः । न । हि । सुप्तस्य । सिंहस्य । प्रविशन्ति । मुखे । मृगाः ।
अन्वयः — कार्याणि उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति, मनोरथैः न (सिद्ध्यन्ति) । (यथा) मृगाः (स्वयं) सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न प्रविशन्ति ।

हिन्दी अर्थ: काम परिश्रम से ही सिद्ध होते हैं, केवल मन के मनसूबों (इच्छाओं) से नहीं। सोए हुए शेर के मुँह में हिरण स्वयं तो नहीं घुस जाते।

भाव: इच्छा करना सरल है, करना कठिन। कवि कहता है — शेर जंगल का राजा है, बलवान है, फिर भी भोजन के लिए उसे उठना, दौड़ना और शिकार करना ही पड़ता है। यदि इतने शक्तिशाली प्राणी को भी परिश्रम से छूट नहीं, तो हमें कैसे मिलेगी? पुस्तक का भावार्थ भी यही कहता है — ‘कार्यस्य सिद्ध्यर्थं परिश्रमः तु आवश्यकः एव।
Did you know? पृष्ठ 132 के दो चित्र इसी बात के दो पहलू हैं — ऊपर खेत में हल चलाते और बीज बोते किसान (उद्यम), नीचे सोया हुआ सिंह जिसके पास हिरण आराम से बैठा है (मनोरथ)। उद्यमेन तृतीया विभक्ति, एकवचन है = ‘परिश्रम के द्वारा’, और मनोरथैः तृतीया विभक्ति, बहुवचन = ‘मनोरथों से’।
प्र2.
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः । चत्वारि तस्य वर्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम् ।। — अस्य सुभाषितस्य अन्वयं हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

यह श्लोक बताता है कि बड़ों को प्रणाम करना केवल शिष्टाचार नहीं, लाभ का सौदा है।

पदच्छेदः — अभिवादनशीलस्य । नित्यम् । वृद्धोपसेविनः । चत्वारि । तस्य । वर्धन्ते । आयुः । विद्या । यशः । बलम् ।
अन्वयः — तस्य नित्यम् अभिवादनशीलस्य वृद्धोपसेविनः आयुः विद्या यशः बलम् (च इति) चत्वारि वर्धन्ते ।

हिन्दी अर्थ: जो सदा अभिवादन (प्रणाम) करने के स्वभाव वाला है और बड़े-बुजुर्गों की सेवा करता है, उसकी चार वस्तुएँ बढ़ती हैं — आयु, विद्या, यश और बल

भाव: चारों बातों का बढ़ना अपने-आप नहीं होता, विनम्रता से होता है। जो झुकना जानता है वही सीख पाता है — इसलिए विद्या बढ़ती है; बड़ों की सेवा में संयम और अनुशासन आता है — इसलिए आयु और बल बढ़ते हैं; और विनम्र व्यक्ति को सब सराहते हैं — इसलिए यश बढ़ता है। पुस्तक का भावार्थ इसी को कहता है — ‘यः तान् सविनयं प्रणमति, तस्य जनस्य आयुः विद्या यशः बलं च वर्धन्ते।’
Tip — शब्द तोड़कर देखिए:
अभिवादनशीलः = अभिवादन + शील (प्रणाम करने के स्वभाव वाला)।
वृद्धोपसेवी = वृद्ध + उपसेवी (बड़ों की सेवा करने वाला); श्लोक में यह षष्ठी विभक्ति, एकवचन — ‘वृद्धोपसेविनः’ है।
आयुर्विद्या यशो बलम् = आयुः + विद्या + यशः + बलम् — यहाँ विसर्गसन्धि हुई है (आयुः + वि = आयुर्वि, यशः + ब = यशो ब)।
चित्र में भी गुरु का हाथ आशीर्वाद में उठा है और चार गोलों में आयुः, विद्या, यशः, बलम् लिखे हैं।
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