प्र1.
उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः । न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ।। — अस्य सुभाषितस्य अन्वयं हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर
परिश्रम का सबसे सीधा और सबसे सुन्दर उदाहरण इसी श्लोक में है — सोया हुआ शेर।
पदच्छेदः — उद्यमेन । हि । सिद्ध्यन्ति । कार्याणि । न । मनोरथैः । न । हि । सुप्तस्य । सिंहस्य । प्रविशन्ति । मुखे । मृगाः ।
अन्वयः — कार्याणि उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति, मनोरथैः न (सिद्ध्यन्ति) । (यथा) मृगाः (स्वयं) सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न प्रविशन्ति ।
अन्वयः — कार्याणि उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति, मनोरथैः न (सिद्ध्यन्ति) । (यथा) मृगाः (स्वयं) सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न प्रविशन्ति ।
हिन्दी अर्थ: काम परिश्रम से ही सिद्ध होते हैं, केवल मन के मनसूबों (इच्छाओं) से नहीं। सोए हुए शेर के मुँह में हिरण स्वयं तो नहीं घुस जाते।
भाव: इच्छा करना सरल है, करना कठिन। कवि कहता है — शेर जंगल का राजा है, बलवान है, फिर भी भोजन के लिए उसे उठना, दौड़ना और शिकार करना ही पड़ता है। यदि इतने शक्तिशाली प्राणी को भी परिश्रम से छूट नहीं, तो हमें कैसे मिलेगी? पुस्तक का भावार्थ भी यही कहता है — ‘कार्यस्य सिद्ध्यर्थं परिश्रमः तु आवश्यकः एव।’
Did you know? पृष्ठ 132 के दो चित्र इसी बात के दो पहलू हैं — ऊपर खेत में हल चलाते और बीज बोते किसान (उद्यम), नीचे सोया हुआ सिंह जिसके पास हिरण आराम से बैठा है (मनोरथ)। उद्यमेन तृतीया विभक्ति, एकवचन है = ‘परिश्रम के द्वारा’, और मनोरथैः तृतीया विभक्ति, बहुवचन = ‘मनोरथों से’।