दीपकम् अध्याय 13 सुभाषितानि (५ – ६)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः । षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र देवः सहायकृत् ।। — अस्य सुभाषितस्य अन्वयं हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

यह श्लोक सफलता के छह औज़ार गिनाता है — और बताता है कि भगवान भी वहीं मदद करते हैं जहाँ ये छह हों।

पदच्छेदः — उद्यमः । साहसम् । धैर्यम् । बुद्धिः । शक्तिः । पराक्रमः । षड् । एते । यत्र । वर्तन्ते । तत्र । देवः । सहायकृत् ।
अन्वयः — यत्र उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः च एते षड् वर्तन्ते, तत्र देवः सहायकृत् (भवति) ।

हिन्दी अर्थ: परिश्रम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम — जहाँ ये छहों होते हैं, वहाँ ईश्वर भी सहायता करने वाले होते हैं।

भाव: ईश्वर बिना कुछ किए बैठे हुए को नहीं उठाते; वे उस हाथ को थामते हैं जो पहले से चल रहा है। छहों गुण एक साथ चाहिए — उद्यम काम शुरू कराता है, साहस डर हटाता है, धैर्य बीच में रुकने नहीं देता, बुद्धि सही रास्ता दिखाती है, शक्ति और पराक्रम काम पूरा कराते हैं। पृष्ठ 133 का चित्र इसी का है — तीन पर्वतारोही रस्सी बाँधकर चढ़ाई कर रहे हैं।
Tip: षडेते = षड् + एते (सन्धि)। ‘षष्’ (छह) का प्रथमा-रूप ‘षट्’ होता है, पर स्वर से पहले आने पर वह षड् बन जाता है। ‘सहायकृत्’ = सहायं करोति इति = सहायता करने वाला।
प्र2.
विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् । पात्रत्वाद्धनमाप्नोति धनाद्धर्मं ततः सुखम् ।। — अस्य सुभाषितस्य अन्वयं हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

यह श्लोक एक सीढ़ी है — विद्या से आरम्भ होकर सुख तक पहुँचती हुई। प्रश्न ७ का वलय भी इसी श्लोक का है।

पदच्छेदः — विद्या । ददाति । विनयम् । विनयात् । याति । पात्रताम् । पात्रत्वात् । धनम् । आप्नोति । धनात् । धर्मम् । ततः । सुखम् ।
अन्वयः — विद्या विनयं ददाति, (मनुष्यः) विनयात् पात्रतां याति, पात्रत्वात् धनम् आप्नोति, धनात् धर्मं ततः सुखम् (च आप्नोति) ।

हिन्दी अर्थ: विद्या विनय देती है, विनय से मनुष्य योग्यता पाता है, योग्यता से धन पाता है, धन से धर्म और धर्म से सुख पाता है।

चरणम्किससेक्या मिलता है
विद्याविनयः (नम्रता)
विनयःपात्रता (योग्यता)
पात्रत्वम्धनम्
धनम्धर्मः
धर्मःसुखम्
भाव: सच्ची पढ़ाई की पहली पहचान घमंड नहीं, विनम्रता है। विनम्र व्यक्ति पर लोग भरोसा करते हैं, इसलिए उसे अच्छा काम मिलता है (पात्रता); काम से धन आता है; धन का सही उपयोग धर्म है — दान, सेवा, कर्तव्य; और धर्म से मन को शान्ति मिलती है, जो असली सुख है। ध्यान दीजिए — कड़ी टूटते ही सीढ़ी टूट जाती है: विद्या से घमंड आ जाए तो आगे कुछ नहीं मिलता।
सन्धि खोलिए: विनयात् + याति = विनयाद्याति; पात्रत्वात् + धनम् = पात्रत्वाद्धनम्; धनात् + धर्मम् = धनाद्धर्मम्। तीनों में त् → द् हुआ है, क्योंकि आगे घोष वर्ण (य्, ध्) है।
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