दीपकम् अध्याय 13 सुभाषितानि (७ – ८)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते । जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।। — अस्य सुभाषितस्य अन्वयं हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

यह श्रीराम का वचन है — लङ्का जीतने के बाद, सोने की नगरी को छोड़कर अयोध्या लौटते समय।

पदच्छेदः — अपि । स्वर्णमयी । लङ्का । न । मे । लक्ष्मण । रोचते । जननी । जन्मभूमिः । च । स्वर्गात् । अपि । गरीयसी ।
अन्वयः — हे लक्ष्मण ! स्वर्णमयी अपि लङ्का मे (मह्यं) न रोचते । यतो हि जननी जन्मभूमिः च स्वर्गात् अपि गरीयसी (भवति) ।

हिन्दी अर्थ: हे लक्ष्मण! सोने की बनी हुई लङ्का भी मुझे अच्छी नहीं लगती। माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।

भाव: धन-वैभव कितना ही हो, अपनी माँ और अपनी जन्मभूमि की जगह नहीं ले सकता। श्रीराम के सामने पूरी स्वर्णनगरी थी, फिर भी उन्होंने अयोध्या को चुना — क्योंकि जो अपनापन जन्मभूमि में है, वह सोने में नहीं। यही देशभक्ति का सबसे सरल पाठ है, और पृष्ठ 134 का चित्र भी यही कहता है — भारतमाता, तिरंगा और भारत का मानचित्र।
Tip: गरीयसी ‘गुरु’ शब्द का तरतमरूप है — गुरु (भारी/बड़ा) → गरीयस् (अधिक बड़ा) → स्त्रीलिङ्ग में गरीयसी। इसीलिए तालिका में इसका अर्थ ‘श्रेष्ठा — महान — Great’ दिया है। स्वर्गात् पञ्चमी विभक्ति, एकवचन है — तुलना में ‘से’ का अर्थ पञ्चमी ही देती है। जन्मभूमिश्च = जन्मभूमिः + च (विसर्गसन्धि)।
प्र2.
पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम् । कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम् ।। — अस्य सुभाषितस्य अन्वयं हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

यह सुभाषित हर विद्यार्थी के लिए है — केवल किताब रख लेना पढ़ाई नहीं है।

पदच्छेदः — पुस्तकस्था । तु । या । विद्या । परहस्तगतम् । धनम् । कार्यकाले । समुत्पन्ने । न । सा । विद्या । न । तद् । धनम् ।
अन्वयः — पुस्तकस्था तु या विद्या (अस्ति), परहस्तगतं (च यद्) धनम् (अस्ति), (तद् उभयम् अपि) कार्यकाले समुत्पन्ने (सति) — न सा विद्या, न (च) तद् धनम् (स्वस्य उपयोगाय भवति) ।

हिन्दी अर्थ: जो विद्या केवल पुस्तक में रखी है और जो धन दूसरे के हाथ में चला गया है — काम पड़ने पर न वह विद्या काम आती है, न वह धन

भाव: विद्या का स्थान पुस्तक नहीं, बुद्धि है। जो पढ़कर याद कर लिया और समझ लिया, वही परीक्षा में या जीवन में काम आता है — अलमारी में सजी किताबें नहीं। ठीक वैसे ही जो पैसा किसी और के पास चला गया है, ज़रूरत के समय वह अपना नहीं रहता। पुस्तक का भावार्थ भी यही कहता है — ‘अपितु बुद्धिस्था विद्या एव कार्यं साधयति’।
Check it yourself: दो जोड़े शब्द याद रखिए — पुस्तकस्था विद्या × बुद्धिस्था विद्या, और परहस्तगतं धनम् × स्वहस्तगतं धनम्। ‘तद्धनम्’ = तद् + धनम्। चित्र में कोषपाल (बैंक/खज़ाने वाला) को पैसे देते हुए व्यक्ति दिखाया गया है — यही ‘परहस्तगतं धनम्’ का सङ्केत है।
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