प्र1.
अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते । जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।। — अस्य सुभाषितस्य अन्वयं हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर
यह श्रीराम का वचन है — लङ्का जीतने के बाद, सोने की नगरी को छोड़कर अयोध्या लौटते समय।
पदच्छेदः — अपि । स्वर्णमयी । लङ्का । न । मे । लक्ष्मण । रोचते । जननी । जन्मभूमिः । च । स्वर्गात् । अपि । गरीयसी ।
अन्वयः — हे लक्ष्मण ! स्वर्णमयी अपि लङ्का मे (मह्यं) न रोचते । यतो हि जननी जन्मभूमिः च स्वर्गात् अपि गरीयसी (भवति) ।
अन्वयः — हे लक्ष्मण ! स्वर्णमयी अपि लङ्का मे (मह्यं) न रोचते । यतो हि जननी जन्मभूमिः च स्वर्गात् अपि गरीयसी (भवति) ।
हिन्दी अर्थ: हे लक्ष्मण! सोने की बनी हुई लङ्का भी मुझे अच्छी नहीं लगती। माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर हैं।
भाव: धन-वैभव कितना ही हो, अपनी माँ और अपनी जन्मभूमि की जगह नहीं ले सकता। श्रीराम के सामने पूरी स्वर्णनगरी थी, फिर भी उन्होंने अयोध्या को चुना — क्योंकि जो अपनापन जन्मभूमि में है, वह सोने में नहीं। यही देशभक्ति का सबसे सरल पाठ है, और पृष्ठ 134 का चित्र भी यही कहता है — भारतमाता, तिरंगा और भारत का मानचित्र।
Tip: गरीयसी ‘गुरु’ शब्द का तरतमरूप है — गुरु (भारी/बड़ा) → गरीयस् (अधिक बड़ा) → स्त्रीलिङ्ग में गरीयसी। इसीलिए तालिका में इसका अर्थ ‘श्रेष्ठा — महान — Great’ दिया है। स्वर्गात् पञ्चमी विभक्ति, एकवचन है — तुलना में ‘से’ का अर्थ पञ्चमी ही देती है। जन्मभूमिश्च = जन्मभूमिः + च (विसर्गसन्धि)।