दीपकम् अध्याय 13 सुभाषितानि (१ – २)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् । मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ।। — अस्य सुभाषितस्य अन्वयं हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

पाठ का पहला ही सुभाषित पूरे अध्याय का नाम बन गया है। यह बताता है कि असली रत्न क्या हैं।

पदच्छेदः — पृथिव्याम् । त्रीणि । रत्नानि । जलम् । अन्नम् । सुभाषितम् । मूढैः । पाषाण-खण्डेषु । रत्न-संज्ञा । विधीयते ।
अन्वयः — पृथिव्यां जलम् अन्नं सुभाषितम् (इति) त्रीणि रत्नानि (सन्ति) । मूढैः पाषाणखण्डेषु रत्नसंज्ञा विधीयते ।

हिन्दी अर्थ: पृथ्वी पर तीन ही रत्न हैं — जल, अन्न और सुभाषित। मूर्ख लोगों के द्वारा तो पत्थर के टुकड़ों को ‘रत्न’ नाम दे दिया जाता है।

भाव: रत्न वही है जिसके बिना जीवन नहीं चलता। जल के बिना कोई प्राणी जी नहीं सकता, अन्न के बिना शरीर नहीं टिकता, और सुभाषित के बिना बुद्धि तथा चरित्र नहीं बनते। हीरे-मोती तो चमकीले पत्थर भर हैं — प्यास लगने पर हीरा काम नहीं आता, पानी आता है। इसीलिए कवि कहता है कि पत्थरों को रत्न कहना मूर्खों का काम है। पुस्तक का भावार्थ भी यही है — ‘किन्तु मूर्खजनाः तु पाषाणखण्डान् रत्नानि इति वदन्ति।’
व्याकरण की तीन बातें:
पृथिव्याम् — सप्तमी विभक्ति, एकवचन, स्त्रीलिङ्ग (पृथिवी → पृथिव्याम्) = ‘पृथ्वी पर’।
जलमन्नं = जलम् + अन्नम् — यहाँ सन्धि हुई है (म् + अ = मन्)।
मूढैः — तृतीया विभक्ति, बहुवचन = ‘मूर्खों के द्वारा’। ‘विधीयते’ कर्मवाच्य क्रिया है, इसलिए कर्ता तृतीया में आया।
प्र2.
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् । उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् ।। — अस्य सुभाषितस्य अन्वयं हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

यह भारत का सबसे प्रसिद्ध सुभाषित है — ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ आज भी हमारे संविधान-भवन तथा अनेक राष्ट्रीय आयोजनों का वाक्य है।

पदच्छेदः — अयम् । निजः । परः । वा । इति । गणना । लघुचेतसाम् । उदारचरितानाम् । तु । वसुधा । एव । कुटुम्बकम् ।
अन्वयः — अयं निजः परः वा इति गणना लघुचेतसां (जनानां भवति) । उदारचरितानां (जनानां) तु वसुधा एव कुटुम्बकम् (भवति) ।

हिन्दी अर्थ: ‘यह अपना है, यह पराया है’ — ऐसी गिनती छोटे (संकुचित) हृदय वालों की होती है। उदार स्वभाव वालों के लिए तो सारी पृथ्वी ही एक कुटुम्ब है।

भाव: मन की सबसे बड़ी सीमा ‘अपना-पराया’ का भेद है। जो व्यक्ति दूसरों को अपने से अलग गिनता रहता है, उसका संसार उतना ही छोटा हो जाता है जितना उसका मन। इसके विरुद्ध जिसका हृदय उदार है, वह सबको अपने परिवार का सदस्य मानता है — पुस्तक के शब्दों में, ‘सर्वे जनाः मम परिवारस्य सदस्याः सन्ति इति ते चिन्तयन्ति।
सन्धि खोलकर देखिए:
परो वेति = परः + वा + इति (‘वा + इति’ = ‘वेति’ — गुणसन्धि)।
वसुधैव = वसुधा + एव (वृद्धिसन्धि — आ + ए = ऐ)।
लघुचेतसाम् तथा उदारचरितानाम् दोनों षष्ठी विभक्ति, बहुवचन में हैं — ‘छोटे मन वालों का’, ‘उदार चरित्र वालों का’।
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