दीपकम् अध्याय 13 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अधोलिखितानां प्रश्नानाम् एकवाक्येन उत्तराणि लिखन्तु — (क) पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि कानि सन्ति ? (ख) उदारचरितानां भावः कः भवति ? (ग) मृगाः स्वयमेव कस्य मुखे न प्रविशन्ति ? (घ) अभिवादनशीलस्य नित्यं कानि वर्धन्ते ? (ङ) मनुष्यः धनात् किम् आप्नोति ? (च) उत्पन्नेषु कार्येषु कीदृशं धनम् उपयोगाय न भवति ?
उत्तर

‘एकवाक्येन’ का अर्थ है — पूरा एक वाक्य, जिसमें कर्ता और क्रिया दोनों हों। सबसे सरल तरीका यह है कि प्रश्न के शब्दों को ही उत्तर में दोहरा दें और प्रश्नवाचक पद की जगह उत्तर रख दें।

क्र.उत्तरम् (संस्कृतम्)हिन्दी अर्थः
(क)पृथिव्यां जलम् अन्नं सुभाषितं च — एतानि त्रीणि रत्नानि सन्ति ।पृथ्वी पर जल, अन्न और सुभाषित — ये तीन रत्न हैं।
(ख)उदारचरितानां भावः ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ इति भवति ।उदार चरित्र वालों का भाव ‘सारी पृथ्वी ही परिवार है’ — ऐसा होता है।
(ग)मृगाः स्वयमेव सुप्तस्य सिंहस्य मुखे न प्रविशन्ति ।हिरण स्वयं ही सोए हुए सिंह के मुँह में प्रवेश नहीं करते।
(घ)अभिवादनशीलस्य नित्यम् आयुः विद्या यशः बलं च — एतानि चत्वारि वर्धन्ते ।अभिवादन करने वाले की आयु, विद्या, यश और बल — ये चार सदा बढ़ते हैं।
(ङ)मनुष्यः धनात् धर्मम् आप्नोति ।मनुष्य धन से धर्म प्राप्त करता है।
(च)उत्पन्नेषु कार्येषु परहस्तगतं धनम् उपयोगाय न भवति ।काम आ पड़ने पर दूसरे के हाथ में गया हुआ धन उपयोग में नहीं आता।
वचन का मिलान सबसे ज़रूरी है: (क) और (घ) में उत्तर बहुवचन में है, इसलिए क्रिया भी ‘सन्ति’ / ‘वर्धन्ते’ (बहुवचन) आई। (ग) में कर्ता ‘मृगाः’ बहुवचन है, इसलिए ‘प्रविशन्ति’। (ङ) में कर्ता ‘मनुष्यः’ एकवचन है, इसलिए ‘आप्नोति’। संस्कृत में कर्ता और क्रिया का वचन सदा एक रहता है।
Tip: (ङ) का पूरा उत्तर चाहें तो श्लोक की लय में भी दे सकते हैं — ‘मनुष्यः धनात् धर्मं ततः सुखम् आप्नोति।’ पर प्रश्न ‘धनात् किम्’ का सीधा उत्तर धर्मम् ही है, इसलिए वही मुख्य रखिए।
प्र2.
चित्रं दृष्ट्वा वाक्यानि रचयन्तु — उदाहरणम् — वृक्षः फलानि यच्छति । त्वं फलानि स्वीकरोषि । अहं फलानि स्वीकरोमि । (क) … (ख) … (ग) … (घ) … (ङ) …
उत्तर

पृष्ठ 136 के चित्र में बीच में एक बड़ा वृक्ष है और उसके चारों ओर वे चीज़ें हैं जो वृक्ष हमें देता है — सेब (फल), गुलाब (पुष्प), पत्ते, लकड़ी का लट्ठा, छाया और कागज़। उदाहरण में ‘फलानि’ ले लिया गया है, इसलिए शेष पाँच से पाँच पंक्तियाँ बनेंगी। हर पंक्ति में तीन वाक्य हैं — प्रथमपुरुष, मध्यमपुरुष, उत्तमपुरुष।

क्र.वृक्षः … यच्छतित्वं … स्वीकरोषिअहं … स्वीकरोमि
उदा.वृक्षः फलानि यच्छति ।त्वं फलानि स्वीकरोषि ।अहं फलानि स्वीकरोमि ।
(क)वृक्षः पुष्पाणि यच्छति ।त्वं पुष्पाणि स्वीकरोषि ।अहं पुष्पाणि स्वीकरोमि ।
(ख)वृक्षः पत्राणि यच्छति ।त्वं पत्राणि स्वीकरोषि ।अहं पत्राणि स्वीकरोमि ।
(ग)वृक्षः काष्ठं यच्छति ।त्वं काष्ठं स्वीकरोषि ।अहं काष्ठं स्वीकरोमि ।
(घ)वृक्षः छायां यच्छति ।त्वं छायां स्वीकरोषि ।अहं छायां स्वीकरोमि ।
(ङ)वृक्षः कागदपत्राणि यच्छति ।त्वं कागदपत्राणि स्वीकरोषि ।अहं कागदपत्राणि स्वीकरोमि ।
क्रिया-रूप कैसे बदले, यही इस प्रश्न का असली पाठ है:
यच्छति — ‘दा’ धातु, लट्लकार, प्रथमपुरुषः, एकवचनम् (वृक्षः = वह)।
स्वीकरोषि — ‘स्वी + कृ’, मध्यमपुरुषः, एकवचनम् (त्वम् = तुम)।
स्वीकरोमि — ‘स्वी + कृ’, उत्तमपुरुषः, एकवचनम् (अहम् = मैं)।
कर्म (फलानि, पुष्पाणि, काष्ठम्, छायाम्) सदा द्वितीया विभक्ति में है — पुल्लिङ्ग/नपुंसक बहुवचन में रूप प्रथमा जैसा ही दिखता है, पर स्त्रीलिङ्ग में स्पष्ट बदल जाता है: छाया → छायाम्
Try This: इन्हीं वाक्यों को बहुवचन में बनाकर देखिए — ‘वृक्षाः पुष्पाणि यच्छन्ति। यूयं पुष्पाणि स्वीकुरुथ। वयं पुष्पाणि स्वीकुर्मः।’ और सोचिए — वृक्ष हमें इतना कुछ देता है, हम उसे क्या देते हैं? यही इस चित्र का सन्देश है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ