प्र1.
एतानि सर्वाणि सुभाषितानि उच्चैः पठन्तु स्मरन्तु लिखन्तु च ।
उत्तर
यह करने का काम है, लिखने का नहीं — पर करने का तरीका ठीक होना चाहिए। तीन चरण हैं: उच्चैः पठनम् (ऊँचे स्वर में पढ़ना), स्मरणम् (कण्ठस्थ करना) और लेखनम् (लिखकर देखना)।
| क्र. | सुभाषितम् (प्रथमः चरणः) | एकपदे भावः |
|---|---|---|
| १ | पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् | सच्चे रत्न |
| २ | अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् | वसुधैव कुटुम्बकम् |
| ३ | उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः | परिश्रम |
| ४ | अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः | बड़ों का आदर |
| ५ | उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः | सफलता के छह गुण |
| ६ | विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम् | विद्या की सीढ़ी |
| ७ | अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते | जन्मभूमि |
| ८ | पुस्तकस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम् | पढ़ी हुई विद्या ही काम की |
श्लोक कण्ठस्थ करने का सरल क्रम: (1) पहले पूरा श्लोक एक बार धीरे पढ़िए; (2) फिर पदच्छेद देखकर हर शब्द अलग-अलग बोलिए; (3) अन्वय पढ़कर अर्थ मन में बैठाइए; (4) अब बिना देखे तीन बार ऊँचे स्वर में बोलिए; (5) अन्त में बिना देखे लिखकर मिलान कीजिए — यहीं मात्राओं और विसर्गों की भूलें पकड़ में आती हैं।
Tip: श्लोक बोलते समय यति (ठहराव) का ध्यान रखिए। अनुष्टुप् छन्द में हर चरण आठ अक्षरों का होता है — ‘पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि’ (८) / ‘जलमन्नं सुभाषितम्’ (८)। इसी लय से बोलेंगे तो श्लोक अपने-आप याद हो जाएगा।