प्र1.
एतानि सुभाषितानि विविधग्रन्थेभ्यः स्वीकृतानि सन्ति । तेषां ग्रन्थानां परिचयः अत्र वर्णितः अस्ति, यथा — (क) चाणक्यनीतिः (ख) मनुस्मृतिः (ग) पञ्चतन्त्रम् (घ) हितोपदेशः (ङ) रामायणम् (च) सुभाषितरत्नभाण्डागारः । — एषां ग्रन्थानां परिचयस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर
पुस्तक कहती है — ये सुभाषित अलग-अलग ग्रन्थों से लिए गए हैं। छहों ग्रन्थों का परिचय यहाँ संस्कृत और हिन्दी दोनों में है।
| ग्रन्थः | रचनाकारः | परिचयः (हिन्दी) |
|---|---|---|
| (क) चाणक्यनीतिः | चाणक्यः | यह एक नीतिग्रन्थ है। इस ग्रन्थ में सूत्ररूप में धर्म, संस्कृति, न्यायव्यवस्था, शान्ति, सुशिक्षा आदि विषयों का सुन्दर विवरण है। |
| (ख) मनुस्मृतिः | महर्षिः मनुः | मनुस्मृति एक प्रसिद्ध नीतिग्रन्थ और धर्मग्रन्थ है। इसमें बारह अध्याय हैं। इस ग्रन्थ में संसार की उत्पत्ति, धर्म, संस्कृति तथा मनुष्य के कर्तव्यों आदि का वर्णन है। |
| (ग) पञ्चतन्त्रम् | पण्डितः विष्णुशर्मा | पञ्चतन्त्र एक कथाग्रन्थ है। इसमें पाँच तन्त्र हैं — मित्रभेदः, मित्रलाभः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः और अपरीक्षितकारकम्। |
| (घ) हितोपदेशः | नारायणपण्डितः | हितोपदेश के रचनाकार नारायण पण्डित हैं। इसमें पशु-पक्षियों की कहानियों के द्वारा बच्चों के लिए नीति की शिक्षा प्रस्तुत की गई है। |
| (ङ) रामायणम् | महर्षिः वाल्मीकिः | यह ग्रन्थ भारतीय संस्कृति का आदर्श स्वरूप दिखाता है। इसमें भगवान् श्रीराम का चरित वर्णित है। यह ग्रन्थ ‘आदिकाव्य’ नाम से प्रसिद्ध है। |
| (च) सुभाषितरत्नभाण्डागारः | सङ्कलनग्रन्थः | इस ग्रन्थ में सुभाषितों का संग्रह है। विविध संस्कृत-ग्रन्थों से सुभाषित चुनकर इस ग्रन्थ में उनका सङ्कलन किया गया है। |
ग्रन्थों के तीन प्रकार समझ लीजिए: नीतिग्रन्थ सीधे उपदेश देता है (चाणक्यनीति, मनुस्मृति); कथाग्रन्थ कहानी के बहाने सीख देता है (पञ्चतन्त्र, हितोपदेश); और सङ्कलनग्रन्थ दूसरों के अच्छे वचन एक जगह इकट्ठे कर देता है (सुभाषितरत्नभाण्डागार)। रामायण महाकाव्य है — इसे ‘आदिकाव्य’ इसलिए कहते हैं कि यह संस्कृत का सबसे पहला काव्य माना जाता है, और वाल्मीकि ‘आदिकवि’।
Did you know? ‘भाण्डागार’ का अर्थ है भण्डार / खज़ाना। तो ‘सुभाषितरत्नभाण्डागारः’ का अर्थ हुआ — ‘सुभाषितरूपी रत्नों का खज़ाना’। पाठ के पहले श्लोक से जोड़कर देखिए — जब सुभाषित ही रत्न है, तो सुभाषितों का संग्रह सचमुच रत्नों का भण्डार ही हुआ!