दीपकम् अध्याय 14 चतुर्दशः पाठः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
मातः ! अद्य तु अवकाशदिनम् अस्ति । अद्य अहं सम्पूर्णदिने विश्रामं करिष्यामि । … यदि ज्ञातुम् इच्छसि, तर्हि एतां कथां पठ । — अस्य सम्पूर्णस्य चित्रसंवादस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर

पाठ का पहला पृष्ठ तीन चित्रों का एक छोटा-सा संवाद है। छुट्टी का दिन है, पुत्र बिस्तर पर लेटा है और माँ उसे उठा रही है। इसी बातचीत से पाठ का विषय — आलस्य बनाम परिश्रम — खुल जाता है।

संस्कृतम् (मूलः संवादः)हिन्दी अनुवादः
पुत्रः — मातः ! अद्य तु अवकाशदिनम् अस्ति । अद्य अहं सम्पूर्णदिने विश्रामं करिष्यामि ।पुत्र — माँ! आज तो छुट्टी का दिन है। आज मैं पूरे दिन आराम करूँगा।
माता — अवकाशः विद्यालयस्य अस्ति न तु स्वाध्यायस्य । बहु आलस्यं करोषि । उत्तिष्ठ, परिश्रमं कुरु ।माँ — छुट्टी विद्यालय की है, स्वाध्याय (अपनी पढ़ाई) की नहीं। तुम बहुत आलस्य करते हो। उठो, परिश्रम करो।
पुत्रः — अहम् उत्तीर्णः भविष्यामि । किम् अधिकेन परिश्रमेण ?पुत्र — मैं (परीक्षा में) उत्तीर्ण तो हो ही जाऊँगा। अधिक परिश्रम से क्या लाभ?
माता — यः परिश्रमं करोति, सः एव जीवने सफलतां प्राप्नोति । परिश्रमः एव मनुष्यस्य मित्रम् अस्ति । आलस्यं तु शत्रुः इव अस्ति ।माँ — जो परिश्रम करता है, वही जीवन में सफलता पाता है। परिश्रम ही मनुष्य का मित्र है। आलस्य तो शत्रु के समान है।
पुत्रः — तत् कथं मातः ?पुत्र — वह कैसे, माँ?
माता — यदि ज्ञातुम् इच्छसि, तर्हि एतां कथां पठ ।माँ — यदि जानना चाहते हो, तो यह कहानी पढ़ो।
माँ का उत्तर ही पाठ की कुंजी है:अवकाशः विद्यालयस्य अस्ति न तु स्वाध्यायस्य’ — छुट्टी विद्यालय जाने से मिली है, पढ़ने से नहीं। यही बात आगे की कथा में एक कदम और आगे बढ़ती है — परिश्रम केवल पढ़ाई का नहीं, पूरे जीवन का साधन है। ध्यान दीजिए कि माँ ने ‘परिश्रम’ को मित्र और ‘आलस्य’ को शत्रु कहा — और पाठ का श्लोक भी यही दो शब्द (बन्धुः, रिपुः) लेकर आता है।
Tip — संवाद के चार पद ध्यान से देखिए:
मातः ! — यह सम्बोधन है (मातृ → हे मातः = ‘हे माँ’)।
करिष्यामि — लृट् लकार (भविष्यत् काल), उत्तमपुरुष, एकवचन = ‘मैं करूँगा’।
उत्तिष्ठ, कुरु, पठ — तीनों लोट् लकार (आज्ञा) के मध्यमपुरुष एकवचन रूप हैं।
अधिकेन परिश्रमेण — तृतीया विभक्ति, एकवचन = ‘अधिक परिश्रम से’।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ