दीपकम् अध्याय 14 आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थः महान् रिपुः के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-05
इस अध्याय के बारे में
पाठ का आरम्भ चित्रसंवाद से (पृष्ठ 141)। अवकाश का दिन है। पुत्र कहता है — ‘अद्य अहं सम्पूर्णदिने विश्रामं करिष्यामि।’ माँ उत्तर देती है — ‘ अवकाशः विद्यालयस्य अस्ति न तु स्वाध्यायस्य। बहु आलस्यं करोषि। उत्तिष्ठ, परिश्रमं कुरु।’ और समझाती है कि परिश्रमः एव मनुष्यस्य मित्रम् अस्ति, आलस्यं तु शत्रुः इव अस्ति । कथा — भिक्षुकः तथा धनिकः (पृष्ठ 142–143)। एक गाँव में हट्टा-कट्टा जवान भिक्षुक भीख माँगता था। एक धनिक उससे कहता है — हज़ार रुपये लो, बदले में अपने पैर दे दो; फिर पाँच हज़ार लो, अपने हाथ दे दो। भिक्षुक हर बार मना कर देता है। तब धनिक कहता है — ‘ तव समीपे एव सहस्राधिकमूल्यकानि वस्तूनि सन्ति। फिर स्वयं को दुर्बल क्यों मानते हो?’ उसी दिन से भिक्षुक ने भीख छोड़कर परिश्रम से जीविका आरम्भ कर दी। पाठ का श्लोक (पृष्ठ 143–144)। ‘आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः। नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्
अभ्यास
- चतुर्दशः पाठः
- पाठः
- पाठस्य श्लोकः
- वयं शब्दार्थान् जानीमः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- वयम् अभ्यासं कुर्मः
- योग्यताविस्तरः
- योग्यताविस्तरः
- कार्यकलापः तथा परियोजनाकार्यम्