दीपकम् अध्याय 14 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
उदाहरणानुसारम् अधोलिखितानां पदानां द्वितीयाविभक्तेः रूपाणि लिखन्तु अवगच्छन्तु च — यथा : युवकः – युवकम् । भिक्षा – भिक्षाम् । नदी – नदीम् । धनम् – धनम् । (आसन्दः, पूजा, लेखनी, नगरम्, धनिकौ, कविते, जननी, पुष्पे, पादाः, नासिका, कर्तरी, पुष्पाणि, गोलदीपौ, पत्रिकाः, अङ्कन्यौ, पुस्तकानि, हस्तः, पेटिका, सम्मार्जन्यः, वनानि, अहम्, यूयम्, द्रोणी, त्वम्, युवाम्, आवाम्, भगिनी, सः)
उत्तर

तालिका के चारों स्तम्भ चार अलग-अलग वर्ग के हैं — पहला अकारान्त पुंलिङ्ग तथा सर्वनाम, दूसरा आकारान्त स्त्रीलिङ्ग, तीसरा ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग और चौथा अकारान्त नपुंसकलिङ्ग। सबके 28 उत्तर नीचे हैं।

पदम्द्वितीयारूपम्वचनम् तथा वर्गःहिन्दी
आसन्दःआसन्दम्एकवचनम् — अकारान्त पुं.कुर्सी को
धनिकौधनिकौद्विवचनम् — अकारान्त पुं.दो धनिकों को
पादाःपादान्बहुवचनम् — अकारान्त पुं.पैरों को
गोलदीपौगोलदीपौद्विवचनम् — अकारान्त पुं.दो गोल दीपों को
हस्तःहस्तम्एकवचनम् — अकारान्त पुं.हाथ को
अहम्माम्एकवचनम् — सर्वनाम (अस्मद्)मुझको
युवाम्युवाम्द्विवचनम् — सर्वनाम (युष्मद्)तुम दोनों को
पूजापूजाम्एकवचनम् — आकारान्त स्त्री.पूजा को
कवितेकवितेद्विवचनम् — आकारान्त स्त्री.दो कविताओं को
नासिकानासिकाम्एकवचनम् — आकारान्त स्त्री.नाक को
पत्रिकाःपत्रिकाःबहुवचनम् — आकारान्त स्त्री.पत्रिकाओं को
पेटिकापेटिकाम्एकवचनम् — आकारान्त स्त्री.पेटी को
यूयम्युष्मान्बहुवचनम् — सर्वनाम (युष्मद्)तुम सबको
आवाम्आवाम्द्विवचनम् — सर्वनाम (अस्मद्)हम दोनों को
लेखनीलेखनीम्एकवचनम् — ईकारान्त स्त्री.कलम को
जननीजननीम्एकवचनम् — ईकारान्त स्त्री.माता को
कर्तरीकर्तरीम्एकवचनम् — ईकारान्त स्त्री.कैंची को
अङ्कन्यौअङ्कन्यौद्विवचनम् — ईकारान्त स्त्री.दो पेंसिलों को
सम्मार्जन्यःसम्मार्जनीःबहुवचनम् — ईकारान्त स्त्री.झाड़ुओं को
द्रोणीद्रोणीम्एकवचनम् — ईकारान्त स्त्री.नाव / कठौती को
भगिनीभगिनीम्एकवचनम् — ईकारान्त स्त्री.बहन को
नगरम्नगरम्एकवचनम् — अकारान्त नपुं.नगर को
पुष्पेपुष्पेद्विवचनम् — अकारान्त नपुं.दो फूलों को
पुष्पाणिपुष्पाणिबहुवचनम् — अकारान्त नपुं.फूलों को
पुस्तकानिपुस्तकानिबहुवचनम् — अकारान्त नपुं.पुस्तकों को
वनानिवनानिबहुवचनम् — अकारान्त नपुं.वनों को
त्वम्त्वाम्एकवचनम् — सर्वनाम (युष्मद्)तुझको
सःतम्एकवचनम् — सर्वनाम (तद्, पुं.)उसको
चार पदों के रूप बदले ही नहीं — क्यों? धनिकौ, गोलदीपौ, कविते, अङ्कन्यौ, पुष्पे, पत्रिकाः, पुष्पाणि, पुस्तकानि, वनानि, नगरम्, युवाम्, आवाम् — इनमें प्रथमा और द्वितीया के रूप एक-जैसे हैं। इसके दो कारण हैं: (1) नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा और द्वितीया सदा समान होती हैं; (2) द्विवचन तथा आकारान्त स्त्रीलिङ्ग के बहुवचन में भी दोनों विभक्तियों के रूप समान रहते हैं। इसलिए इन्हें ‘नहीं बदला’ मत समझिए — ये सही द्वितीया-रूप ही हैं।
Check it yourself — दो कठिन पद:
सम्मार्जन्यः पहले से बहुवचन (प्रथमा) है; इसका द्वितीया-बहुवचन सम्मार्जनीः होगा (नदी → नदीः के अनुसार)।
पादाः भी बहुवचन है; अकारान्त पुंलिङ्ग होने से द्वितीया-बहुवचन पादान् बनेगा (बालकाः → बालकान्)।
अहम् → माम् तथा यूयम् → युष्मान् — सर्वनामों के रूप मूल शब्द से बिलकुल अलग दिखते हैं, इन्हें रटना ही पड़ता है।
प्र2.
अधोलिखितान् श्लोकान् पठन्तु, अवगच्छन्तु स्मरन्तु च — (१) विना वेदं विना गीतां विना रामायणीं कथाम् । विना कविं कालिदासं भारतं भारतं न हि ॥ (२) रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम् । शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति ॥
उत्तर

दोनों श्लोक जान-बूझकर यहाँ रखे गए हैं — इनका लगभग हर पद द्वितीया विभक्ति में है, इसलिए ये इस पाठ के व्याकरण का सुन्दर अभ्यास बन जाते हैं।

श्लोकः १ — विना वेदं विना गीताम् …

अन्वयः — वेदं विना, गीतां विना, रामायणीं कथां विना, कविं कालिदासं विना च भारतं भारतं न हि (भवति) ।

हिन्दी अर्थ: वेद के बिना, गीता के बिना, रामायण की कथा के बिना और कवि कालिदास के बिना भारत ‘भारत’ ही नहीं रह जाता

भाव: देश केवल भूमि का नाम नहीं होता; उसकी पहचान उसकी विचार-सम्पदा से बनती है। पुस्तक का भावार्थ यही कहता है — ‘भारतस्य वास्तविकं स्वरूपं वेदे, गीतायां, रामायणे, कालिदासस्य काव्येषु च द्रष्टुं शक्यते।’ वेद ज्ञान देते हैं, गीता कर्तव्य सिखाती है, रामायण मर्यादा दिखाती है और कालिदास का काव्य सौन्दर्य-दृष्टि देता है। इन्हें भुला दें तो नक्शा तो रहेगा, भारत नहीं।

श्लोकः २ — रामं स्कन्दं हनूमन्तम् …

अन्वयः — यः शयने नित्यं रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरं (च) स्मरेत्, तस्य दुःस्वप्नः नश्यति ।

हिन्दी अर्थ: जो सोते समय प्रतिदिन राम, स्कन्द (कार्तिकेय), हनुमान, वैनतेय (गरुड) और वृकोदर (भीम) का स्मरण करता है, उसका दुःस्वप्न नष्ट हो जाता है।

भाव: पाँचों नाम निर्भयता के प्रतीक हैं — राम धैर्य के, स्कन्द वीरता के, हनुमान बल और भक्ति के, गरुड गति के, भीम शक्ति के। सोने से पहले जिन विचारों को मन में रखते हैं, नींद उन्हीं का रूप ले लेती है; इसलिए साहस के प्रतीकों का स्मरण करने से डरावने सपने नहीं आते। यह श्लोक वस्तुतः यही सिखाता है कि मन को अच्छी बात पर टिकाकर सोना चाहिए
Tip — दोनों श्लोकों की व्याकरण-कुंजी:
• पहले श्लोक में ‘विना’ अव्यय है और उसके योग में शब्द द्वितीया विभक्ति में आते हैं — वेदम्, गीताम्, कथाम्, कविम्, कालिदासम्। (‘विना’ के साथ तृतीया तथा पञ्चमी भी हो सकती है, पर यहाँ द्वितीया है।)
• दूसरे श्लोक में ‘स्मरेत्’ (स्मृ धातु) का कर्म द्वितीया में है — रामम्, स्कन्दम्, हनूमन्तम्, वैनतेयम्, वृकोदरम्
स्मरेन्नित्यं = स्मरेत् + नित्यम्; दुःस्वप्नस्तस्य = दुःस्वप्नः + तस्य। ‘स्मरेत्’ विधिलिङ् लकार का रूप है — ‘स्मरण करना चाहिए’।
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