दीपकम् अध्याय 14 पाठः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
एकस्मिन् विशाले ग्रामे कश्चन भिक्षुकः आसीत् … “आर्य ! अहं प्रभूतं धनम् इच्छामि” इति सः सविनयम् उक्तवान् । — अस्य गद्यांशस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु । (पृष्ठ 142)
उत्तर

कथा का पहला भाग भिक्षुक का परिचय देता है और धनिक से उसकी भेंट कराता है।

संस्कृतम्हिन्दी अनुवादः
एकस्मिन् विशाले ग्रामे कश्चन भिक्षुकः आसीत् ।एक बड़े गाँव में कोई भिखारी था।
यद्यपि सः उन्नतः दृढकायः च युवकः आसीत् तथापि सः भिक्षाटनं करोति स्म ।यद्यपि वह लम्बा और मज़बूत शरीर वाला युवक था, फिर भी वह भीख माँगता फिरता था।
मार्गे यः कोऽपि मिलति तं सः कथयति — “कृपया भिक्षां यच्छतु । दरिद्राय दानं करोतु । पुण्यं प्राप्नोतु ।” इति ।रास्ते में जो कोई मिलता, उससे वह कहता — “कृपया भिक्षा दीजिए। दरिद्र को दान कीजिए। पुण्य प्राप्त कीजिए।”
केचन जनाः तस्मै धनं यच्छन्ति । केचन च तर्जयन्ति ।कुछ लोग उसे पैसे देते थे और कुछ डाँट देते थे।
एकदा तेन मार्गेण कश्चित् धनिकः आगच्छति । सः भिक्षुकः मनसि एवं चिन्तयति — “अहो मम भाग्यम् । अद्य अहं प्रभूतं धनं प्राप्नोमि” इति ।एक बार उसी रास्ते से कोई धनी व्यक्ति आता है। वह भिखारी मन में ऐसा सोचता है — “अहा, मेरा भाग्य! आज मुझे ढेर सारा धन मिलेगा।”
भिक्षुकः धनिकं वदति — “आर्य ! अहम् अतीव दरिद्रः अस्मि । कृपया दानं करोतु” इति ।भिखारी धनी से कहता है — “आर्य! मैं बहुत ही गरीब हूँ। कृपया दान कीजिए।”
धनिकः तं पृष्टवान् — “त्वं किम् इच्छसि ?”धनी ने उससे पूछा — “तुम क्या चाहते हो?”
“आर्य ! अहं प्रभूतं धनम् इच्छामि” इति सः सविनयम् उक्तवान् ।“आर्य! मैं ढेर सारा धन चाहता हूँ” — ऐसा उसने विनम्रता से कहा।
कथा की चोट यहीं तैयार हो जाती है: लेखक ने जान-बूझकर ‘उन्नतः दृढकायः च युवकः’ लिखा है। वह बूढ़ा नहीं, रोगी नहीं, अपंग नहीं — पूरा स्वस्थ जवान है। फिर भी माँगता है। इसीलिए आगे धनिक का प्रश्न इतना तीखा लगता है — ‘किमर्थं त्वम् आत्मानं दुर्बलं मन्यसे?’
Tip — द्वितीया विभक्ति यहीं से आरम्भ: इस अंश के कर्म-पद देखिए — भिक्षाटनं करोति, भिक्षां यच्छतु, पुण्यं प्राप्नोतु, धनं यच्छन्ति, धनिकं वदति, धनम् इच्छामि। सब द्वितीया विभक्ति, एकवचन में हैं। ‘करोति स्म’ में स्म लगने से वर्तमान क्रिया भूतकाल का अर्थ देती है — ‘करता था’।
प्र2.
तदा धनिकः वदति — “अहं तुभ्यं सहस्रं रूप्यकाणि यच्छामि …” … तस्माद् दिनात् भिक्षुकः भिक्षाटनं त्यक्त्वा परिश्रमेण धनार्जनं कृत्वा सगौरवं जीवनयापनम् आरब्धवान् । — अस्य गद्यांशस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु । (पृष्ठ 143)
उत्तर

यह कथा का निर्णायक भाग है — यहीं धनिक भिक्षुक को उसकी अपनी सम्पत्ति दिखा देता है।

संस्कृतम्हिन्दी अनुवादः
तदा धनिकः वदति — “अहं तुभ्यं सहस्रं रूप्यकाणि यच्छामि । त्वं मह्यं तव पादौ यच्छ ।”तब धनी कहता है — “मैं तुम्हें एक हज़ार रुपये देता हूँ। तुम मुझे अपने दोनों पैर दे दो।”
भिक्षुकः वदति — “अहं मम पादौ तुभ्यं कथं ददामि ? विना पादौ कथं वा चलामि ?”भिखारी कहता है — “मैं अपने पैर तुम्हें कैसे दे दूँ? पैरों के बिना चलूँगा कैसे?”
धनिकः वदति — “अस्तु, त्वं पञ्चसहस्रं रूप्यकाणि स्वीकुरु । मह्यं तव हस्तौ यच्छ ।”धनी कहता है — “ठीक है, तुम पाँच हज़ार रुपये ले लो। मुझे अपने दोनों हाथ दे दो।”
भिक्षुकः वदति — “हस्ताभ्यां विना अहं कथं भिक्षां स्वीकरोमि ?”भिखारी कहता है — “हाथों के बिना मैं भिक्षा कैसे लूँगा?”
एवमेव धनिकः सहस्राधिकैः रूप्यकैः तस्य अनेकानि शरीराङ्गानि क्रेतुम् इष्टवान् । किन्तु भिक्षुकः निराकृतवान् ।इसी प्रकार धनी ने हज़ारों रुपयों से उसके अनेक अङ्ग खरीदने चाहे। किन्तु भिखारी ने मना कर दिया।
तदा धनिकः उक्तवान् — “पश्य मित्र ! तव समीपे एव सहस्राधिकमूल्यकानि वस्तूनि सन्ति । तथापि किमर्थं त्वम् आत्मानं दुर्बलं मन्यसे ?तब धनी ने कहा — “देखो मित्र! तुम्हारे पास ही हज़ारों से अधिक मूल्य की वस्तुएँ हैं। फिर भी तुम स्वयं को दुर्बल क्यों मानते हो?
सौभाग्येन एव वयं मानवजन्म प्राप्तवन्तः । अस्य सफलतार्थं प्रयत्नं कुरु । इतः गच्छ, शुभं भवतु” इति ।सौभाग्य से ही हमें मनुष्य-जन्म मिला है। इसे सफल बनाने के लिए प्रयत्न करो। यहाँ से जाओ, तुम्हारा कल्याण हो।”
तस्माद् दिनात् भिक्षुकः भिक्षाटनं त्यक्त्वा परिश्रमेण धनार्जनं कृत्वा सगौरवं जीवनयापनम् आरब्धवान् । अतः एव सज्जनाः वदन्ति —उस दिन से भिखारी ने भीख माँगना छोड़कर, परिश्रम से धन कमाकर सम्मानपूर्वक जीवन बिताना आरम्भ कर दिया। इसीलिए सज्जन कहते हैं —
धनिक ने पैसा नहीं, दृष्टि दी: उसने भिक्षुक को दान देकर एक दिन का पेट भरने के बजाय यह दिखा दिया कि उसके हाथ और पैर ही हज़ारों रुपयों से बड़ी सम्पत्ति हैं — जिन्हें वह किसी भी दाम पर बेचने को तैयार नहीं। जब भिक्षुक ने स्वयं कहा ‘पैरों के बिना चलूँगा कैसे, हाथों के बिना लूँगा कैसे’, तभी उसने अपने मुँह से मान लिया कि वह दरिद्र नहीं है। सबसे सुन्दर पंक्ति यही है — ‘तव समीपे एव सहस्राधिकमूल्यकानि वस्तूनि सन्ति।
Tip — तीन व्याकरण-बिन्दु:
पादौ, हस्तौ — द्वितीया विभक्ति, द्विवचन (पैर और हाथ दो-दो होते हैं, इसलिए द्विवचन)।
तुभ्यं, मह्यं — चतुर्थी विभक्ति, एकवचन (‘तुम्हें’, ‘मुझे’) — देने के अर्थ में चतुर्थी आती है (‘सम्प्रदाने चतुर्थी’)।
त्यक्त्वा, कृत्वा — क्त्वा-प्रत्ययान्त अव्यय (‘छोड़कर’, ‘करके’)। ये अव्यय हैं, इसलिए इनका रूप कभी नहीं बदलता।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ