प्र1.
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् । हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥१॥ … गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा । दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥८॥ — मधुराष्टकस्य अन्वयं, हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर
यह श्रीवल्लभाचार्य का रचा हुआ प्रसिद्ध स्तोत्र है। आठों श्लोकों का ढाँचा एक ही है — हर पंक्ति में कुछ वस्तुएँ गिनाकर हर बार ‘मधुरम्’ कहा जाता है, और हर श्लोक इसी टेक पर समाप्त होता है — ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्’।
सर्वप्रथम टेक का पदच्छेद —
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्
= मधुराधिपतेः + अखिलम् + मधुरम्
= मधुरा (मथुरा नगरी) + अधिपतेः (के स्वामी का) + अखिलम् (सब कुछ) + मधुरम् (मीठा है)
अर्थ — मधुरा (मथुरा) के अधिपति श्रीकृष्ण का सब कुछ मीठा है।
= मधुराधिपतेः + अखिलम् + मधुरम्
= मधुरा (मथुरा नगरी) + अधिपतेः (के स्वामी का) + अखिलम् (सब कुछ) + मधुरम् (मीठा है)
अर्थ — मधुरा (मथुरा) के अधिपति श्रीकृष्ण का सब कुछ मीठा है।
अब आठों श्लोकों का अर्थ —
| श्लोकः | यत्र-यत्र माधुर्यम् | हिन्दी अर्थः |
|---|---|---|
| १ | अधरम्, वदनम्, नयनम्, हसितम्, हृदयम्, गमनम् | उनका होंठ मीठा है, मुख मीठा है, नेत्र मीठे हैं, हँसी मीठी है, हृदय मीठा है, चाल मीठी है — मथुरापति का सब कुछ मीठा है। |
| २ | वचनम्, चरितम्, वसनम्, वलितम्, चलितम्, भ्रमितम् | उनकी वाणी मीठी, चरित्र मीठा, वस्त्र मीठा, बल खाकर मुड़ना मीठा, चलना मीठा, घूमना मीठा — मथुरापति का सब कुछ मीठा है। |
| ३ | वेणुः, रेणुः, पाणिः, पादौ, नृत्यम्, सख्यम् | उनकी बाँसुरी मीठी, (उनके चरणों की) धूल मीठी, हाथ मीठा, दोनों पैर मीठे, नाच मीठा, मित्रता मीठी — मथुरापति का सब कुछ मीठा है। |
| ४ | गीतम्, पीतम्, भुक्तम्, सुप्तम्, रूपम्, तिलकम् | उनका गाना मीठा, पीना मीठा, खाना मीठा, सोना मीठा, रूप मीठा, तिलक मीठा — मथुरापति का सब कुछ मीठा है। |
| ५ | करणम्, तरणम्, हरणम्, रमणम्, वमितम्, शमितम् | उनका करना मीठा, तैरना मीठा, हरण करना मीठा, क्रीड़ा करना मीठा, उगलना मीठा, शान्त करना मीठा — मथुरापति का सब कुछ मीठा है। |
| ६ | गुञ्जा, माला, यमुना, वीची, सलिलम्, कमलम् | उनकी गुंजा-माला मीठी, (वैजयन्ती) माला मीठी, यमुना मीठी, (उसकी) लहर मीठी, जल मीठा, कमल मीठा — मथुरापति का सब कुछ मीठा है। |
| ७ | गोपी, लीला, युक्तम्, मुक्तम्, दृष्टम्, सृष्टम् | उनकी गोपी मीठी, लीला मीठी, मिलना मीठा, छोड़ना मीठा, देखना मीठा, रचना मीठी — मथुरापति का सब कुछ मीठा है। |
| ८ | गोपाः, गावः, यष्टिः, सृष्टिः, दलितम्, फलितम् | उनके ग्वाले मीठे, गायें मीठी, लाठी मीठी, सृष्टि मीठी, मसलना मीठा, फलना मीठा — मथुरापति का सब कुछ मीठा है। |
अन्वयः (प्रथमश्लोकस्य) —
अधरं मधुरम् (अस्ति), वदनं मधुरम् (अस्ति), नयनं मधुरम् (अस्ति), हसितं मधुरम् (अस्ति),
हृदयं मधुरम् (अस्ति), गमनं मधुरम् (अस्ति), मधुराधिपतेः अखिलं मधुरम् (अस्ति) ।
हृदयं मधुरम् (अस्ति), गमनं मधुरम् (अस्ति), मधुराधिपतेः अखिलं मधुरम् (अस्ति) ।
शेष सातों श्लोकों का अन्वय भी ठीक इसी साँचे पर है — केवल गिनाई गई वस्तुएँ बदलती हैं, वाक्य-रचना वही रहती है, इसलिए इसे याद करना बहुत सरल है।
भावः — यह स्तोत्र मधुर भक्ति का सबसे सुन्दर उदाहरण है। कवि यह नहीं कहता कि श्रीकृष्ण का कोई एक गुण अच्छा है; वह कहता है कि जो भी उनसे जुड़ा है — उनकी बाँसुरी, उनके पैरों की धूल, यमुना का जल, ग्वालों की लाठी, यहाँ तक कि उनकी सृष्टि भी — सब कुछ मधुर है। भाव यह है कि जब हृदय में प्रेम भर जाता है तब प्रिय से जुड़ी हर छोटी-से-छोटी वस्तु भी मीठी लगने लगती है। सौन्दर्य वस्तु में नहीं, देखने वाली दृष्टि में होता है।
Tip — यह स्तोत्र इसी पाठ में क्यों दिया गया? ध्यान से देखिए कि श्लोकों में गिनाए गए शब्द अधिकतर शरीर के अङ्ग ही हैं — अधरम् (होंठ), वदनम् (मुख), नयनम् (आँख), हृदयम्, पाणिः (हाथ), पादौ (दोनों पैर)। पाठ ‘माधवस्य प्रियम् अङ्गम्’ भी अङ्गों की ही बात करता है — वहाँ अङ्ग आपस में झगड़ते हैं, यहाँ सब मिलकर मधुर हो जाते हैं। यही पाठ और स्तोत्र का जोड़ है।
Check it yourself — दो सन्धियाँ पहचानिए:
• मधुराधिपतेरखिलम् = मधुराधिपतेः + अखिलम् → विसर्ग-सन्धि (‘ः’ के बाद स्वर आने पर ‘र्’ हो गया)।
• वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः = वेणुः + मधुरः + रेणुः + मधुरः → यहाँ भी विसर्ग-सन्धि है (‘मधुरः + रेणुः’ = ‘मधुरो रेणुः’) ।
• मधुराधिपतेरखिलम् = मधुराधिपतेः + अखिलम् → विसर्ग-सन्धि (‘ः’ के बाद स्वर आने पर ‘र्’ हो गया)।
• वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः = वेणुः + मधुरः + रेणुः + मधुरः → यहाँ भी विसर्ग-सन्धि है (‘मधुरः + रेणुः’ = ‘मधुरो रेणुः’) ।