दीपकम् अध्याय 15 मधुराष्टकं पठन्तु स्मरन्तु च

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् । हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥१॥ … गोपा मधुरा गावो मधुरा यष्टिर्मधुरा सृष्टिर्मधुरा । दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥८॥ — मधुराष्टकस्य अन्वयं, हिन्दी-अर्थं भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

यह श्रीवल्लभाचार्य का रचा हुआ प्रसिद्ध स्तोत्र है। आठों श्लोकों का ढाँचा एक ही है — हर पंक्ति में कुछ वस्तुएँ गिनाकर हर बार ‘मधुरम्’ कहा जाता है, और हर श्लोक इसी टेक पर समाप्त होता है — ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्’।

सर्वप्रथम टेक का पदच्छेद —

मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्
= मधुराधिपतेः + अखिलम् + मधुरम्
= मधुरा (मथुरा नगरी) + अधिपतेः (के स्वामी का) + अखिलम् (सब कुछ) + मधुरम् (मीठा है)
अर्थ — मधुरा (मथुरा) के अधिपति श्रीकृष्ण का सब कुछ मीठा है।

अब आठों श्लोकों का अर्थ —

श्लोकःयत्र-यत्र माधुर्यम्हिन्दी अर्थः
अधरम्, वदनम्, नयनम्, हसितम्, हृदयम्, गमनम्उनका होंठ मीठा है, मुख मीठा है, नेत्र मीठे हैं, हँसी मीठी है, हृदय मीठा है, चाल मीठी है — मथुरापति का सब कुछ मीठा है।
वचनम्, चरितम्, वसनम्, वलितम्, चलितम्, भ्रमितम्उनकी वाणी मीठी, चरित्र मीठा, वस्त्र मीठा, बल खाकर मुड़ना मीठा, चलना मीठा, घूमना मीठा — मथुरापति का सब कुछ मीठा है।
वेणुः, रेणुः, पाणिः, पादौ, नृत्यम्, सख्यम्उनकी बाँसुरी मीठी, (उनके चरणों की) धूल मीठी, हाथ मीठा, दोनों पैर मीठे, नाच मीठा, मित्रता मीठी — मथुरापति का सब कुछ मीठा है।
गीतम्, पीतम्, भुक्तम्, सुप्तम्, रूपम्, तिलकम्उनका गाना मीठा, पीना मीठा, खाना मीठा, सोना मीठा, रूप मीठा, तिलक मीठा — मथुरापति का सब कुछ मीठा है।
करणम्, तरणम्, हरणम्, रमणम्, वमितम्, शमितम्उनका करना मीठा, तैरना मीठा, हरण करना मीठा, क्रीड़ा करना मीठा, उगलना मीठा, शान्त करना मीठा — मथुरापति का सब कुछ मीठा है।
गुञ्जा, माला, यमुना, वीची, सलिलम्, कमलम्उनकी गुंजा-माला मीठी, (वैजयन्ती) माला मीठी, यमुना मीठी, (उसकी) लहर मीठी, जल मीठा, कमल मीठा — मथुरापति का सब कुछ मीठा है।
गोपी, लीला, युक्तम्, मुक्तम्, दृष्टम्, सृष्टम्उनकी गोपी मीठी, लीला मीठी, मिलना मीठा, छोड़ना मीठा, देखना मीठा, रचना मीठी — मथुरापति का सब कुछ मीठा है।
गोपाः, गावः, यष्टिः, सृष्टिः, दलितम्, फलितम्उनके ग्वाले मीठे, गायें मीठी, लाठी मीठी, सृष्टि मीठी, मसलना मीठा, फलना मीठा — मथुरापति का सब कुछ मीठा है।

अन्वयः (प्रथमश्लोकस्य) —

अधरं मधुरम् (अस्ति), वदनं मधुरम् (अस्ति), नयनं मधुरम् (अस्ति), हसितं मधुरम् (अस्ति),
हृदयं मधुरम् (अस्ति), गमनं मधुरम् (अस्ति), मधुराधिपतेः अखिलं मधुरम् (अस्ति)

शेष सातों श्लोकों का अन्वय भी ठीक इसी साँचे पर है — केवल गिनाई गई वस्तुएँ बदलती हैं, वाक्य-रचना वही रहती है, इसलिए इसे याद करना बहुत सरल है।

भावः — यह स्तोत्र मधुर भक्ति का सबसे सुन्दर उदाहरण है। कवि यह नहीं कहता कि श्रीकृष्ण का कोई एक गुण अच्छा है; वह कहता है कि जो भी उनसे जुड़ा है — उनकी बाँसुरी, उनके पैरों की धूल, यमुना का जल, ग्वालों की लाठी, यहाँ तक कि उनकी सृष्टि भी — सब कुछ मधुर है। भाव यह है कि जब हृदय में प्रेम भर जाता है तब प्रिय से जुड़ी हर छोटी-से-छोटी वस्तु भी मीठी लगने लगती है। सौन्दर्य वस्तु में नहीं, देखने वाली दृष्टि में होता है।
Tip — यह स्तोत्र इसी पाठ में क्यों दिया गया? ध्यान से देखिए कि श्लोकों में गिनाए गए शब्द अधिकतर शरीर के अङ्ग ही हैं — अधरम् (होंठ), वदनम् (मुख), नयनम् (आँख), हृदयम्, पाणिः (हाथ), पादौ (दोनों पैर)। पाठ ‘माधवस्य प्रियम् अङ्गम्’ भी अङ्गों की ही बात करता है — वहाँ अङ्ग आपस में झगड़ते हैं, यहाँ सब मिलकर मधुर हो जाते हैं। यही पाठ और स्तोत्र का जोड़ है।
Check it yourself — दो सन्धियाँ पहचानिए:
मधुराधिपतेरखिलम् = मधुराधिपतेः + अखिलम् → विसर्ग-सन्धि (‘ः’ के बाद स्वर आने पर ‘र्’ हो गया)।
वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः = वेणुः + मधुरः + रेणुः + मधुरः → यहाँ भी विसर्ग-सन्धि है (‘मधुरः + रेणुः’ = ‘मधुरो रेणुः’) ।
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