दीपकम् अध्याय 15 पाठ्य-प्रश्नाः (पाठे विद्यमानाः प्रश्नाः)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
‘मां विना माधवः किमपि द्रष्टुं शक्नोति किम् ?’ इति नयनं वदति । — अस्य प्रश्नस्य उत्तरं संस्कृतेन लिखन्तु । (पृष्ठ 152)
उत्तर

उत्तरम् — न, नयनाभ्यां विना माधवः किमपि द्रष्टुं न शक्नोति ।
(हिन्दी — नहीं, आँखों के बिना माधव कुछ भी नहीं देख सकता।)

पर उत्तर यहीं समाप्त नहीं होता: आँख का कहना सही है, पर अधूरा है। पाठ के अन्त में माधव यही तो समझाता है — ‘मम शरीरस्य सर्वाणि अङ्गानि मम कृते उपकारकाणि सन्ति’। इसलिए पूरा उत्तर यह होगा — नयनाभ्यां विना माधवः द्रष्टुं न शक्नोति, किन्तु केवलं नयनाभ्यां सर्वं कार्यम् अपि न भवति । (आँख के बिना देखना नहीं होता, पर केवल आँख से सारा काम भी नहीं होता।)
Tip — ‘विना’ के साथ कौन-सी विभक्ति? ‘विना’ के योग में द्वितीया विभक्ति आती है, इसलिए पाठ में ‘मां विना’ लिखा है (माम् = अस्मद् की द्वितीया एकवचन)। तृतीया भी शुद्ध मानी जाती है — ‘मया विना’। पर पुस्तक का प्रयोग द्वितीया वाला है।
प्र2.
‘वयं सर्वे माधवम् एव पृच्छाम, कः श्रेष्ठः ?’ इति उदरं सूचयति । — माधवस्य उत्तरं किम् आसीत् ? (पृष्ठ 153)
उत्तर

उत्तरम् — माधवः अवदत् — ‘भवन्तः सर्वेऽपि श्रेष्ठाः । भवन्तः सर्वेऽपि मम प्रियाः ।’
(हिन्दी — माधव ने कहा — ‘आप सब-के-सब श्रेष्ठ हैं। आप सब-के-सब मुझे प्रिय हैं।’)

उसने अपना उत्तर तर्क सहित दिया, केवल टालने के लिए नहीं —

अङ्गम्माधवस्य वचनम्हिन्दी
नयनेअहं नयनाभ्यां पश्यामि ।मैं आँखों से देखता हूँ।
कर्णौअहं कर्णाभ्यां शृणोमि ।मैं कानों से सुनता हूँ।
मुखम्अहं मुखेन भाषणं भोजनं च करोमि ।मैं मुँह से बोलता और खाता हूँ।
उदरम्अहम् उदरेण पाचनात् शक्तिं प्राप्नोमि ।मैं पेट से पाचन के द्वारा शक्ति पाता हूँ।
पादौअहं पादाभ्यां चलामि ।मैं पैरों से चलता हूँ।
Check it yourself: ध्यान दीजिए कि झगड़ा रोकने का उपाय उदर ने सुझाया — ‘कोलाहलं न कुर्वन्तु’ (शोर मत कीजिए)। पाठ में उदर सबसे कम बोलता है पर सबसे समझदारी की बात कहता है।
प्र3.
पाठस्य नाम ‘माधवस्य प्रियम् अङ्गम्’ अस्ति । तर्हि माधवस्य प्रियम् अङ्गं किम् आसीत् ? स्वमतं लिखन्तु ।
उत्तर

उत्तरम् — माधवस्य कोऽपि एकः अङ्गः प्रियः न आसीत्; तस्य सर्वाणि अङ्गानि तस्मै प्रियाणि आसन्, यतः सर्वाणि अङ्गानि तस्य कृते उपकारकाणि सन्ति ।
(हिन्दी — माधव को कोई एक अङ्ग प्रिय नहीं था; उसके सारे अङ्ग उसे प्रिय थे, क्योंकि हर अङ्ग उसका उपकार करता है।)

प्रश्न में ही चतुराई छिपी है: शीर्षक ‘प्रियम् अङ्गम्’ एकवचन में है, इसलिए पढ़ते समय लगता है कि उत्तर कोई एक अङ्ग होगा। पर पाठ का पूरा ढाँचा इसी भ्रम को तोड़ने के लिए बना है — हर अङ्ग बारी-बारी से अपना दावा रखता है, और अन्त में माधव बहुवचन में उत्तर देता है — ‘भवन्तः सर्वेऽपि मम प्रियाः’। इसलिए ‘एक ही श्रेष्ठ है’ यह सोच ही गलत है।
Try this — पाठ का सन्देश एक वाक्य में: ‘शरीरस्य सर्वाणि अङ्गानि परस्परं सहयोगेन एव कार्यं कुर्वन्ति, अतः सर्वाणि समानरूपेण महत्त्वपूर्णानि सन्ति ।’ — शरीर के सारे अङ्ग आपस में मिलकर ही काम करते हैं, इसलिए सब बराबर महत्त्वपूर्ण हैं। यही बात परिवार और कक्षा पर भी लागू होती है।
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