दीपकम् अध्याय 15 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
कोष्ठकात् समुचितं पदं चित्वा वाक्यानि रचयन्तु — (क) अहं …………… गायनं करोमि । (पादेन, नासिकया, मुखेन) (ख) अहं …………… धावनं करोमि । (पादाभ्यां, ललाटेन, कूर्परेण) (ग) अहं …………… आघ्राणं करोमि । (नखैः, नासिकया, चरणेन) (घ) अहं …………… श्रवणं करोमि । (कर्णाभ्याम्, नासिकया, अङ्गुष्ठैः) (ङ) अहं …………… भोजनं करोमि । (मुखेन, पादेन, नासिकया)
उत्तर

यह पूरा प्रश्न तृतीया विभक्ति पर है। नियम एक ही है — करणे तृतीया, यानी जिस साधन से काम हो, उसमें तृतीया विभक्ति लगती है।

पूर्णं वाक्यम्हिन्दीपदस्य विवरणम्
(क) अहं मुखेन गायनं करोमि ।मैं मुँह से गाता हूँ।मुख (नपुं.) — तृतीया, एकवचन (मुख एक है)
(ख) अहं पादाभ्यां धावनं करोमि ।मैं दोनों पैरों से दौड़ता हूँ।पाद (पुं.) — तृतीया, द्विवचन (पैर दो हैं)
(ग) अहं नासिकया आघ्राणं करोमि ।मैं नाक से सूँघता हूँ।नासिका (स्त्री.) — तृतीया, एकवचन
(घ) अहं कर्णाभ्यां श्रवणं करोमि ।मैं दोनों कानों से सुनता हूँ।कर्ण (पुं.) — तृतीया, द्विवचन (कान दो हैं)
(ङ) अहं मुखेन भोजनं करोमि ।मैं मुँह से भोजन करता हूँ।मुख (नपुं.) — तृतीया, एकवचन
तृतीया विभक्ति के तीन साँचे यहीं पूरे हो जाते हैं:
• अकारान्त पुं./नपुं. — एकवचन -ेन (मुखेन, पादेन, चरणेन), द्विवचन -आभ्याम् (पादाभ्याम्, कर्णाभ्याम्), बहुवचन -ैः (नखैः, अङ्गुष्ठैः)
• आकारान्त स्त्रीलिङ्ग — एकवचन -या (नासिकया, जिह्वया)
• ध्यान दीजिए — जो अङ्ग शरीर में दो हैं उनका द्विवचन ही आएगा, ठीक वैसे ही जैसे पाठ में माधव ने कहा — ‘नयनाभ्यां पश्यामि, कर्णाभ्यां शृणोमि, पादाभ्यां चलामि’।
Tip — गलत विकल्प भी पढ़ लीजिए, ये पहचान पक्की कराते हैं: ललाटेन = माथे से, कूर्परेण = कोहनी से, नखैः = नाखूनों से, अङ्गुष्ठैः = अँगूठों से, चरणेन = पैर से। ये सब रूप व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध हैं — इनमें दोष केवल यह है कि अर्थ नहीं बनता। इसलिए ऐसे प्रश्नों में पहले अर्थ देखिए, फिर रूप।
प्र2.
पट्टिकातः समुचितं शरीराङ्गं चित्वा भगिनी कुत्र किं धरति इति सूचयन्तु — (पट्टिका : कण्ठे, ललाटे, नयनयोः, ओष्ठयोः, पादयोः, कर्णयोः, हस्तयोः, वामहस्ते, अङ्गुल्यां, नेत्रयोः) — भगिनी …… पादुकाद्वयं धरति । भगिनी …… मुद्रिकां धरति । भगिनी …… मालां धरति । भगिनी …… उपनेत्रं धरति । भगिनी …… ओष्ठरागं धरति । भगिनी …… कङ्कणानि धरति । भगिनी …… घटीयन्त्रं धरति । भगिनी …… कुण्डलद्वयं धरति । भगिनी …… कुङ्कुमं धरति । भगिनी …… कज्जलं धरति ।
उत्तर

यह पूरा प्रश्न सप्तमी विभक्ति पर है — नियम है अधिकरणे सप्तमी, यानी जिस अङ्ग में / पर कोई वस्तु पहनी जाती है, उसमें सप्तमी लगती है। पट्टिका के दस शब्द ठीक दस वाक्यों के लिए हैं।

पूर्णं वाक्यम्हिन्दीविभक्तिः तथा वचनम्
भगिनी पादयोः पादुकाद्वयं धरति ।बहन दोनों पैरों में चप्पलों की जोड़ी पहनती है।पाद — सप्तमी, द्विवचन
भगिनी अङ्गुल्यां मुद्रिकां धरति ।बहन अङ्गुली में अँगूठी पहनती है।अङ्गुली — सप्तमी, एकवचन
भगिनी कण्ठे मालां धरति ।बहन गले में माला पहनती है।कण्ठ — सप्तमी, एकवचन
भगिनी नयनयोः उपनेत्रं धरति ।बहन आँखों पर चश्मा लगाती है।नयन — सप्तमी, द्विवचन
भगिनी ओष्ठयोः ओष्ठरागं धरति ।बहन होंठों पर लिपस्टिक लगाती है।ओष्ठ — सप्तमी, द्विवचन
भगिनी हस्तयोः कङ्कणानि धरति ।बहन दोनों हाथों में कंगन पहनती है।हस्त — सप्तमी, द्विवचन
भगिनी वामहस्ते घटीयन्त्रं धरति ।बहन बाएँ हाथ में घड़ी पहनती है।वामहस्त — सप्तमी, एकवचन
भगिनी कर्णयोः कुण्डलद्वयं धरति ।बहन दोनों कानों में कुण्डलों की जोड़ी पहनती है।कर्ण — सप्तमी, द्विवचन
भगिनी ललाटे कुङ्कुमं धरति ।बहन माथे पर कुमकुम लगाती है।ललाट — सप्तमी, एकवचन
भगिनी नेत्रयोः कज्जलं धरति ।बहन आँखों में काजल लगाती है।नेत्र — सप्तमी, द्विवचन
वचन कैसे तय हुआ? जो अङ्ग शरीर में एक है उसका एकवचन — कण्ठे, ललाटे, वामहस्ते, अङ्गुल्याम्। जो दो हैं उनका द्विवचन — पादयोः, नयनयोः, ओष्ठयोः, हस्तयोः, कर्णयोः, नेत्रयोः। ध्यान दीजिए कि द्विवचन का साँचा एक ही है — सप्तमी द्विवचन में सदा ‘-योः’ (पादयोः, कर्णयोः, हस्तयोः) चाहे शब्द पुंलिङ्ग हो या नपुंसकलिङ्ग।
Check it yourself — नयनयोः और नेत्रयोः दोनों का अर्थ ‘आँखों में’ ही है। ‘नयनम्’ और ‘नेत्रम्’ पर्यायवाची हैं, इसलिए इन दोनों को उपनेत्रम् और कज्जलम् वाले वाक्यों में आपस में बदलकर लिखा जा सकता है — दोनों उत्तर शुद्ध माने जाएँगे। इसी तरह ‘वामहस्ते’ केवल घड़ी वाले वाक्य में ही फिट होता है, क्योंकि घड़ी एक ही हाथ में पहनी जाती है; इसीलिए कंगन वाले वाक्य के लिए द्विवचन ‘हस्तयोः’ बचता है।
प्र3.
वाक्यं शुद्धम् अशुद्धं वा इति सूचयन्तु — (क) अहं कर्णाभ्यां भोजनं करोमि । (ख) अहं नासिकाद्वारा श्वासं स्वीकरोमि । (ग) अहम् अङ्गुष्ठैः गणनां करोमि । (घ) अहं नयनाभ्यां श्रवणं करोमि । (ङ) अहं हस्तेन कार्यं करोमि ।
उत्तर

यहाँ व्याकरण नहीं, अर्थ जाँचना है — क्या वह काम सचमुच उसी अङ्ग से होता है? जहाँ उत्तर ‘अशुद्धम्’ है, वहाँ शुद्ध वाक्य भी साथ दिया है।

वाक्यम्उत्तरम्कारणम् तथा शुद्धं वाक्यम्
(क) अहं कर्णाभ्यां भोजनं करोमि ।अशुद्धम्कानों से भोजन नहीं होता, सुना जाता है । शुद्धम् — अहं मुखेन भोजनं करोमि ।
(ख) अहं नासिकाद्वारा श्वासं स्वीकरोमि ।शुद्धम्साँस नाक से ही ली जाती है । (नासिकाद्वारा = नासिका के द्वारा)
(ग) अहम् अङ्गुष्ठैः गणनां करोमि ।अशुद्धम्गिनती अँगूठों से नहीं, अङ्गुलियों से होती है — और अँगूठे दो ही होते हैं, बहुवचन भी गलत है । शुद्धम् — अहम् अङ्गुलिभिः गणनां करोमि ।
(घ) अहं नयनाभ्यां श्रवणं करोमि ।अशुद्धम्आँखों से देखा जाता है, सुना नहीं । शुद्धम् — अहं कर्णाभ्यां श्रवणं करोमि । (अथवा — अहं नयनाभ्यां दर्शनं करोमि ।)
(ङ) अहं हस्तेन कार्यं करोमि ।शुद्धम्हाथ से ही काम होता है । ‘हस्ताभ्यां कार्यं करोमि’ भी शुद्ध है ।
यह प्रश्न पाठ की परीक्षा है: तीनों अशुद्ध वाक्यों में अङ्ग और उसका काम आपस में बदल दिए गए हैं। पाठ में माधव ने जो सूची दी थी, उसी से सारे उत्तर मिल जाते हैं — ‘नयनाभ्यां पश्यामि, कर्णाभ्यां शृणोमि, मुखेन भाषणं करोमि भोजनं करोमि च, उदरेण शक्तिं प्राप्नोमि, पादाभ्यां चलामि’। इसीलिए पाठ को केवल पढ़ना नहीं, याद रखना चाहिए।
Tip — अङ्गुष्ठः और अङ्गुली का अन्तर: अङ्गुष्ठः = अँगूठा (हाथ में एक, पैर में एक — इसीलिए ‘पादाङ्गुष्ठः’ भी पृष्ठ 158 में है)। अङ्गुली = अङ्गुली (एक हाथ में चार, अँगूठे को मिलाकर पाँच)। इसलिए ‘दश अङ्गुल्यः’ ठीक है (प्रश्न ३ ङ), पर ‘अङ्गुष्ठैः गणना’ ठीक नहीं।
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