दीपकम् अध्याय 15 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
चित्रं दृष्ट्वा अङ्गस्य नाम लिखन्तु — (क) …………… (ख) …………… (ग) …………… (घ) …………… (ङ) ……………
उत्तर

पृष्ठ 155 पर पाँच कार्टून-चित्र छपे हैं — वही हँसते-बोलते अङ्ग जो पाठ के स्वप्न में आए थे। नीचे पहले यह बताया है कि हर चित्र में क्या दिखता है, फिर उसका संस्कृत नाम।

क्रमःचित्रे किम् दृश्यतेउत्तरम् (संस्कृतम्)हिन्दी
(क)पलकों और भौंह वाली एक बड़ी आँखनयनम् (नेत्रम्)आँख
(ख)नीली निकर पहने गोल पेट, नाभि दिखती हैउदरम्पेट
(ग)पाँच अङ्गुलियों वाला पैर का पंजापादः (चरणः)पैर
(घ)मुट्ठी बाँधकर मछली दिखाती हुई मुड़ी बाँहभुजः (बाहुः)भुजा / बाँह
(ङ)लहरदार तहों वाला गोल पिण्ड, नीचे छोटा लघुमस्तिष्कमस्तिष्कम्मस्तिष्क / दिमाग़
लिङ्ग भी साथ-साथ याद कीजिए, क्योंकि आगे वाक्य बनाते समय यही काम आएगा —
नयनम्, उदरम्, मस्तिष्कम् — नपुंसकलिङ्ग (अन्त में ‘-म्’)
पादः, भुजः — पुंलिङ्ग (अन्त में ‘-ः’)
इसीलिए पाठ में ‘पादः वदति’ (पुंलिङ्ग) पर ‘नयनं वदति’ (नपुंसकलिङ्ग) लिखा है।
Check it yourself — (ङ) को पहचानने का तरीका: चित्र की बाहरी रेखा फूलगोभी जैसी लहरदार है और नीचे-दायीं ओर एक छोटा अलग गोला है। ये दोनों मिलकर मस्तिष्क का पक्का पहचान-चिह्न हैं (लहरें = मस्तिष्क की सिलवटें, छोटा गोला = लघुमस्तिष्क)। कान का चित्र पाठ में अलग दिया है और वह इससे बिलकुल अलग दिखता है — इसलिए (ङ) को ‘कर्णः’ मत लिखिए।
प्र2.
कोष्ठकात् समुचितं क्रियापदं चित्वा उदाहरणानुसारम् अङ्गस्य कार्यं लिखन्तु — यथा – नयनं – पश्यति । (क) मुखम् – …………… (चलति, हसति, वदति) (ख) पादः – …………… (लिखति, चलति, पश्यति) (ग) कर्णः – …………… (हसति, वदति, शृणोति) (घ) नासिका – …………… (आघ्राणं करोति, नृत्यति, धावति) (ङ) जिह्वा – …………… (धावनं करोति, आस्वादनं करोति, पश्यति)
उत्तर

हर अङ्ग का मुख्य काम चुनना है। उत्तर के साथ नीचे यह भी दिया है कि पाठ में वही बात कहाँ आई है।

अङ्गम्उत्तरम्हिन्दीपाठात् प्रमाणम्
यथा — नयनम्पश्यतिदेखता हैअहं नयनाभ्यां पश्यामि
(क) मुखम्वदतिबोलता हैमुखेन भाषणं करोमि ; शिक्षकस्य प्रश्नस्य उत्तरं वदति
(ख) पादःचलतिचलता हैमम कारणेन माधवः चलति
(ग) कर्णःशृणोतिसुनता हैयानानां ध्वनिं यदि न शृणोति
(घ) नासिकाआघ्राणं करोतिसूँघती हैअहं नासिकया आघ्राणं करोमि (प्रश्नः ६) ।
(ङ) जिह्वाआस्वादनं करोतिस्वाद लेती हैजिह्वा रसं जानाति — आस्वादनम् = चखना ।
क्रिया का वचन क्यों नहीं बदला? सारे उत्तर प्रथमपुरुष एकवचन (लट् लकार) में हैं — पश्यति, वदति, चलति, शृणोति। कारण यह है कि कर्ता (मुखम्, पादः, कर्णः …) हर बार एकवचन में है, और संस्कृत में क्रिया सदा कर्ता के पुरुष-वचन का अनुसरण करती है। यदि कर्ता ‘कर्णौ’ (द्विवचन) होता तो क्रिया ‘शृणुतः’ हो जाती।
Check it yourself — (क) में दो उत्तर क्यों दिख सकते हैं? हँसना भी तो मुँह ही करता है, इसलिए ‘हसति’ भी गलत नहीं लगता। पर कोष्ठक में ‘हसति’ जान-बूझकर भ्रम फैलाने वाला विकल्प रखा गया है — पाठ में मुख स्वयं अपना काम बताता है: ‘माधवः मम कारणेन भोजनं करोति, भाषणं करोति, उत्तरं वदति’। इसलिए पुस्तक का अपेक्षित उत्तर वदति ही है।
प्र3.
कोष्ठकात् समुचितां संख्यां चित्वा रिक्तस्थानं पूरयन्तु — (क) मम …………… शिरः अस्ति । (एकम्, अनेकं, चत्वारि) (ख) मम …………… पादौ स्तः । (त्रयः, द्वौ, पञ्च) (ग) मम …………… केशाः सन्ति । (दश, अष्ट, बहवः) (घ) मम …………… दन्ताः सन्ति । (चत्वारः, अष्टाविंशतिः, द्वात्रिंशत्) (ङ) मम हस्तयोः …………… अङ्गुल्यः सन्ति । (अष्ट, दश, पञ्चदश)
उत्तर

यहाँ केवल गिनती नहीं देखनी है — संख्यावाचक शब्द को उस संज्ञा के लिङ्ग-वचन से मिलाना भी है जिसकी वह गिनती कर रहा है। इसीलिए कोष्ठक में ‘त्रयः / द्वौ / पञ्च’ जैसे भिन्न-भिन्न रूप दिए हैं।

वाक्यम्उत्तरम्पूर्णं वाक्यम्कारणम्
(क) मम …… शिरः अस्ति ।एकम्मम एकं शिरः अस्ति ।शिर एक ही होता है; ‘शिरः’ नपुंसकलिङ्ग एकवचन है, इसलिए ‘एकम्’ ।
(ख) मम …… पादौ स्तः ।द्वौमम द्वौ पादौ स्तः ।‘पादौ’ तथा ‘स्तः’ दोनों द्विवचन में हैं, इसलिए संख्या भी द्विवचन — द्वौ (पुंलिङ्ग) ।
(ग) मम …… केशाः सन्ति ।बहवःमम बहवः केशाः सन्ति ।बाल गिने नहीं जाते, इसलिए निश्चित संख्या नहीं — ‘बहवः’ (बहुत सारे) ।
(घ) मम …… दन्ताः सन्ति ।द्वात्रिंशत्मम द्वात्रिंशत् दन्ताः सन्ति ।पूर्ण विकसित मनुष्य के 32 दाँत होते हैं — द्वात्रिंशत् = 32 ।
(ङ) मम हस्तयोः …… अङ्गुल्यः सन्ति ।दशमम हस्तयोः दश अङ्गुल्यः सन्ति ।एक हाथ में पाँच, दो हाथों में 5 × 2 = 10 ।
संस्कृत की संख्याओं का एक ज़रूरी नियम: एक से चार तक की संख्याएँ विशेषण की तरह चलती हैं — वे संज्ञा के लिङ्ग और विभक्ति के अनुसार रूप बदलती हैं (एकः/एका/एकम्, द्वौ/द्वे, त्रयः/तिस्रः/त्रीणि, चत्वारः/चतस्रः/चत्वारि)। परन्तु पाँच और उससे आगे की संख्याएँ रूप नहीं बदलतीं — पञ्च, दश, द्वात्रिंशत् सब लिङ्ग-निरपेक्ष हैं। इसीलिए (क) में ‘एकम्’ (नपुंसक) और (ख) में ‘द्वौ’ (पुंलिङ्ग) आया, पर (ङ) में स्त्रीलिङ्ग ‘अङ्गुल्यः’ के साथ भी ‘दश’ ज्यों-का-त्यों रहा।
Did you know? (घ) में ‘अष्टाविंशतिः’ (28) विकल्प भी जान-बूझकर रखा गया है — क्योंकि कक्षा 6 के बच्चे की उम्र में अक्सर 28 ही दाँत निकले होते हैं, अन्तिम चार दाँत (अक्ल दाढ़) बहुत बाद में आते हैं। फिर भी शरीर-रचना की दृष्टि से मनुष्य के दाँतों की पूर्ण संख्या 32 है, इसलिए पुस्तक का अपेक्षित उत्तर द्वात्रिंशत् है।
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