प्र1.
पर्यावरणसंरक्षणस्य विषये एका प्रदर्शनी विद्यालये आयोजिता अस्ति । छात्राः तां प्रदर्शनीं पश्यन्ति । शिक्षकेण सह संलापं च कुर्वन्ति । … (मुदिता सुभाषितं श्रावयति, अन्ये छात्राः अपि गायन्ति) — अस्य संलापस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर
पाठ का पहला पृष्ठ एक चित्र-संलाप है। विद्यालय के मैदान में पर्यावरण-संरक्षण की प्रदर्शनी लगी है, बच्चे चित्रफलक देख रहे हैं और शिक्षक से बात कर रहे हैं। नीचे पूरा अनुवाद पंक्ति-दर-पंक्ति दिया है।
| संस्कृतम् (मूलः पाठः) | हिन्दी अनुवादः |
|---|---|
| पर्यावरणसंरक्षणस्य विषये एका प्रदर्शनी विद्यालये आयोजिता अस्ति । | पर्यावरण-संरक्षण के विषय में विद्यालय में एक प्रदर्शनी आयोजित की गई है। |
| छात्राः तां प्रदर्शनीं पश्यन्ति । शिक्षकेण सह संलापं च कुर्वन्ति । | छात्र उस प्रदर्शनी को देखते हैं और शिक्षक के साथ बातचीत करते हैं। |
| छात्रा — श्रीमन् ! अहं जीवशास्त्रस्य पुस्तके पठामि यत् वृक्षाः शुद्धं वायुं यच्छन्ति । | छात्रा — श्रीमान् जी! मैं जीवविज्ञान की पुस्तक में पढ़ती हूँ कि पेड़ शुद्ध वायु देते हैं। |
| अन्या छात्रा — श्रीमन् ! मम माता अपि वदति यत् वृक्षाः पूज्याः भवन्ति । | दूसरी छात्रा — श्रीमान् जी! मेरी माँ भी कहती हैं कि पेड़ पूजनीय होते हैं। |
| शिक्षकः — प्रियाः छात्राः ! सत्यम्, वृक्षाः शुद्धं वायुं, फलानि, पुष्पाणि च सर्वम् अपि यच्छन्ति । अतः ते पूज्याः । | शिक्षक — प्रिय छात्रो! सच है, पेड़ शुद्ध वायु, फल, फूल — सब कुछ देते हैं। इसीलिए वे पूजनीय हैं। |
| मुदिता — श्रीमन् ! अहम् एकं सुभाषितं पठितवती यत् ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः’ सन्ति इति । | मुदिता — श्रीमान् जी! मैंने एक सुभाषित पढ़ा है कि ‘पेड़ सज्जन पुरुष हैं’। |
| शिक्षकः — किम् एवम् ? अस्तु, तर्हि तत् सुभाषितं श्रावयतु । | शिक्षक — क्या ऐसा है? ठीक है, तो वह सुभाषित सुनाइए। |
| मुदिता — अस्तु श्रीमन् ! | मुदिता — ठीक है, श्रीमान् जी! |
| (मुदिता सुभाषितं श्रावयति, अन्ये छात्राः अपि गायन्ति ।) | (मुदिता सुभाषित सुनाती है, दूसरे छात्र भी गाते हैं।) |
यह संलाप पाठ की भूमिका है: पूरा पाठ कोई कहानी नहीं, सुभाषितों का संग्रह है। संलाप का काम केवल इतना है कि वह प्रश्न खड़ा कर दे — ‘वृक्ष सज्जनों जैसे कैसे हैं?’ — और आगे के छह सुभाषित उसी का उत्तर देते हैं।
ध्यान दीजिए — संलाप में आए तीन उपयोगी प्रयोग:
• यत् … इति — ‘कि …’ के अर्थ में (पठामि यत् वृक्षाः शुद्धं वायुं यच्छन्ति)।
• श्रीमन् — सम्बोधन का रूप, आदरपूर्वक ‘श्रीमान् जी!’
• श्रावयतु — लोट्लकार, प्रेरणार्थक ‘सुनवाइए / सुनाइए’। इसी प्रकार अस्तु = ‘ठीक है / ऐसा ही हो’।
• यत् … इति — ‘कि …’ के अर्थ में (पठामि यत् वृक्षाः शुद्धं वायुं यच्छन्ति)।
• श्रीमन् — सम्बोधन का रूप, आदरपूर्वक ‘श्रीमान् जी!’
• श्रावयतु — लोट्लकार, प्रेरणार्थक ‘सुनवाइए / सुनाइए’। इसी प्रकार अस्तु = ‘ठीक है / ऐसा ही हो’।