दीपकम् अध्याय 16 षोडशः पाठः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पर्यावरणसंरक्षणस्य विषये एका प्रदर्शनी विद्यालये आयोजिता अस्ति । छात्राः तां प्रदर्शनीं पश्यन्ति । शिक्षकेण सह संलापं च कुर्वन्ति । … (मुदिता सुभाषितं श्रावयति, अन्ये छात्राः अपि गायन्ति) — अस्य संलापस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर

पाठ का पहला पृष्ठ एक चित्र-संलाप है। विद्यालय के मैदान में पर्यावरण-संरक्षण की प्रदर्शनी लगी है, बच्चे चित्रफलक देख रहे हैं और शिक्षक से बात कर रहे हैं। नीचे पूरा अनुवाद पंक्ति-दर-पंक्ति दिया है।

संस्कृतम् (मूलः पाठः)हिन्दी अनुवादः
पर्यावरणसंरक्षणस्य विषये एका प्रदर्शनी विद्यालये आयोजिता अस्ति ।पर्यावरण-संरक्षण के विषय में विद्यालय में एक प्रदर्शनी आयोजित की गई है।
छात्राः तां प्रदर्शनीं पश्यन्ति । शिक्षकेण सह संलापं च कुर्वन्ति ।छात्र उस प्रदर्शनी को देखते हैं और शिक्षक के साथ बातचीत करते हैं।
छात्रा — श्रीमन् ! अहं जीवशास्त्रस्य पुस्तके पठामि यत् वृक्षाः शुद्धं वायुं यच्छन्ति ।छात्रा — श्रीमान् जी! मैं जीवविज्ञान की पुस्तक में पढ़ती हूँ कि पेड़ शुद्ध वायु देते हैं।
अन्या छात्रा — श्रीमन् ! मम माता अपि वदति यत् वृक्षाः पूज्याः भवन्ति ।दूसरी छात्रा — श्रीमान् जी! मेरी माँ भी कहती हैं कि पेड़ पूजनीय होते हैं।
शिक्षकः — प्रियाः छात्राः ! सत्यम्, वृक्षाः शुद्धं वायुं, फलानि, पुष्पाणि च सर्वम् अपि यच्छन्ति । अतः ते पूज्याः ।शिक्षक — प्रिय छात्रो! सच है, पेड़ शुद्ध वायु, फल, फूल — सब कुछ देते हैं। इसीलिए वे पूजनीय हैं।
मुदिता — श्रीमन् ! अहम् एकं सुभाषितं पठितवती यत् ‘वृक्षाः सत्पुरुषाः’ सन्ति इति ।मुदिता — श्रीमान् जी! मैंने एक सुभाषित पढ़ा है कि ‘पेड़ सज्जन पुरुष हैं’।
शिक्षकः — किम् एवम् ? अस्तु, तर्हि तत् सुभाषितं श्रावयतु ।शिक्षक — क्या ऐसा है? ठीक है, तो वह सुभाषित सुनाइए।
मुदिता — अस्तु श्रीमन् !मुदिता — ठीक है, श्रीमान् जी!
(मुदिता सुभाषितं श्रावयति, अन्ये छात्राः अपि गायन्ति ।)(मुदिता सुभाषित सुनाती है, दूसरे छात्र भी गाते हैं।)
यह संलाप पाठ की भूमिका है: पूरा पाठ कोई कहानी नहीं, सुभाषितों का संग्रह है। संलाप का काम केवल इतना है कि वह प्रश्न खड़ा कर दे — ‘वृक्ष सज्जनों जैसे कैसे हैं?’ — और आगे के छह सुभाषित उसी का उत्तर देते हैं।
ध्यान दीजिए — संलाप में आए तीन उपयोगी प्रयोग:
यत् … इति — ‘कि …’ के अर्थ में (पठामि यत् वृक्षाः शुद्धं वायुं यच्छन्ति)।
श्रीमन् — सम्बोधन का रूप, आदरपूर्वक ‘श्रीमान् जी!’
श्रावयतु — लोट्लकार, प्रेरणार्थक ‘सुनवाइए / सुनाइए’। इसी प्रकार अस्तु = ‘ठीक है / ऐसा ही हो’।
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