प्र1.
पुष्प-पत्र-फलच्छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः । धन्या महीरुहा येषां विमुखा यान्ति नार्थिनः ॥ — अस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं भावार्थं च लिखन्तु ।
उत्तर
पदच्छेदः — पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः + धन्याः + महीरुहाः + येषाम् + विमुखाः + यान्ति + न + अर्थिनः ।
अन्वयः — येषां पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः अर्थिनः विमुखाः न यान्ति, (ते) महीरुहाः धन्याः (सन्ति) ।
हिन्दी अर्थ — वे पेड़ धन्य हैं, जिनके फूल, पत्ते, फल, छाया, जड़, छाल और लकड़ी से माँगने वाले कभी निराश होकर नहीं लौटते।
| वृक्षस्य दानम् | संस्कृत-पदम् | हिन्दी | उपयोगः |
|---|---|---|---|
| १ | पुष्पम् | फूल | पूजा, सुगन्ध, औषधि |
| २ | पत्रम् | पत्ता | पत्तल, चारा, खाद |
| ३ | फलम् | फल | भोजन |
| ४ | छाया | छाया | पथिक और पशुओं को विश्राम |
| ५ | मूलम् | जड़ | औषधि, भूमि को बाँधना |
| ६ | वल्कलम् | छाल | वस्त्र, औषधि |
| ७ | दारु | लकड़ी | ईंधन, गृह-निर्माण |
भावार्थः (पुस्तक के शब्दों में) — प्राणिनः वृक्षात् पुष्पाणि, पत्राणि, फलानि, छायां, मूलानि, वल्कलानि काष्ठानि च प्राप्नुवन्ति । अर्थात् वृक्षाणां पार्श्वे यत् किमपि अस्ति तत् सर्वम् अपि प्राणिनां कृते एव अस्ति । वृक्षाः कदापि याचकान् निराशान् न कुर्वन्ति । अतः वृक्षाः धन्याः सन्ति ।
भाव — वृक्ष का कोई भी अङ्ग अपने लिए नहीं है — सात वस्तुएँ गिनाकर कवि यही सिद्ध करता है। जो पूरा का पूरा दूसरों के काम आ जाए, वही ‘धन्य’ है।
भाव — वृक्ष का कोई भी अङ्ग अपने लिए नहीं है — सात वस्तुएँ गिनाकर कवि यही सिद्ध करता है। जो पूरा का पूरा दूसरों के काम आ जाए, वही ‘धन्य’ है।
व्याकरण-संकेत: ‘पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः’ एक बड़ा द्वन्द्व समास है जो तृतीया विभक्ति, बहुवचन में है — ‘इनके द्वारा’। श्लोक में ‘फल+छाया’ में छत्व-सन्धि से ‘फलच्छाया’ बना है।