दीपकम् अध्याय 16 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पाठस्य आधारेण अधोलिखितानां प्रश्नानाम् उत्तराणि पूर्णवाक्येन लिखन्तु — (क) नद्यः किं न पिबन्ति ? (ख) वृक्षाः अस्मभ्यं किं किं यच्छन्ति ? (ग) इदं शरीरं किमर्थम् अस्ति ? (घ) दशपुत्रसमः कः भवति ? (ङ) केषां विभूतयः परोपकाराय भवन्ति ? (च) अन्यस्य छायां के कुर्वन्ति ?
उत्तर

पूर्णवाक्येन का अर्थ है — कर्ता और क्रिया दोनों लिखकर पूरा वाक्य बनाइए। सरल तरीका यह है कि प्रश्न के शब्दों को ही उत्तर में दोहरा दीजिए और प्रश्नवाचक शब्द की जगह उत्तर रख दीजिए।

प्रश्नःउत्तरम् (पूर्णवाक्येन)हिन्दी अर्थः
(क) नद्यः किं न पिबन्ति ?नद्यः स्वयम् एव अम्भः (जलं) न पिबन्ति ।नदियाँ स्वयं अपना जल नहीं पीतीं।
(ख) वृक्षाः अस्मभ्यं किं किं यच्छन्ति ?वृक्षाः अस्मभ्यं शुद्धं वायुं, पुष्पाणि, पत्राणि, फलानि, छायां, मूलानि, वल्कलानि, काष्ठानि च यच्छन्ति ।पेड़ हमें शुद्ध वायु, फूल, पत्ते, फल, छाया, जड़ें, छाल और लकड़ी देते हैं।
(ग) इदं शरीरं किमर्थम् अस्ति ?इदं शरीरं परोपकारार्थम् अस्ति ।यह शरीर परोपकार के लिए है।
(घ) दशपुत्रसमः कः भवति ?दशपुत्रसमः द्रुमः (वृक्षः) भवति ।एक पेड़ दस सन्तानों के समान होता है।
(ङ) केषां विभूतयः परोपकाराय भवन्ति ?सतां (सज्जनानां) विभूतयः परोपकाराय भवन्ति ।सज्जनों की सम्पत्तियाँ परोपकार के लिए होती हैं।
(च) अन्यस्य छायां के कुर्वन्ति ?अन्यस्य छायां वृक्षाः कुर्वन्ति ।दूसरों के लिए छाया पेड़ करते हैं।
प्रश्नवाचक शब्द और उत्तर की विभक्ति:किं न पिबन्ति?’ → कर्म पूछा गया है, उत्तर द्वितीया में (अम्भः — नपुंसकलिङ्ग में प्रथमा और द्वितीया का रूप एक-सा होता है)। ‘केषां विभूतयः?’ → सम्बन्ध पूछा है, उत्तर षष्ठी बहुवचन में (सताम् / सज्जनानाम्)। ‘किमर्थम्’ → प्रयोजन पूछा है, उत्तर चतुर्थी या ‘-अर्थम्’ रूप में (परोपकारार्थम्)।
Tip: (ख) का उत्तर पाँचवें सुभाषित से बनता है — ‘पुष्प-पत्र-फल-छाया-मूल-वल्कल-दारुभिः’। सात वस्तुएँ वहीं गिनी हैं; ‘शुद्धं वायुं’ पाठ के आरम्भिक संलाप से जोड़िए। परीक्षा में तीन-चार वस्तुएँ लिख देना भी पर्याप्त होता है।
प्र2.
पट्टिकातः उचितानि पदानि चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयन्तु — (पट्टिका : तिष्ठन्ति, सुजनस्येव, विभूतयः, वृक्षाः, फलानि, दशपुत्रसमः, परोपकारार्थम्) यथा — छायामन्यस्य कुर्वन्ति ................ स्वयमातपे । (क) फलान्यपि परार्थाय ................ सत्पुरुषा इव । (ख) दशह्रदसमः पुत्रः ................ द्रुमः । (ग) ................ येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः । (घ) ................ इदं शरीरम् । (ङ) स्वयं न खादन्ति ................ वृक्षाः । (च) परोपकाराय सतां ................ ।
उत्तर

पट्टिका में सात पद हैं और रिक्तस्थान भी सात — एक ‘यथा’ (उदाहरण) में और छह (क)–(च) में। इसलिए हर पद ठीक एक बार प्रयोग होगा। उदाहरण में तिष्ठन्ति लग चुका है, शेष छह पद छह वाक्यों में बँट जाएँगे।

वाक्यम्पूरितं वाक्यम्हिन्दी
यथाछायामन्यस्य कुर्वन्ति तिष्ठन्ति स्वयमातपे ।दूसरे के लिए छाया करते हैं, स्वयं धूप में खड़े रहते हैं।
(क)फलान्यपि परार्थाय वृक्षाः सत्पुरुषा इव ।फल भी दूसरों के लिए — पेड़ सज्जनों के समान हैं।
(ख)दशह्रदसमः पुत्रः दशपुत्रसमः द्रुमः ।एक सन्तान दस तालाबों के बराबर, एक पेड़ दस सन्तानों के बराबर।
(ग)सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नार्थिनः ।सज्जन के समान, जिनसे याचक निराश होकर नहीं लौटते।
(घ)परोपकारार्थम् इदं शरीरम् ।यह शरीर परोपकार के लिए है।
(ङ)स्वयं न खादन्ति फलानि वृक्षाः ।पेड़ अपने फल स्वयं नहीं खाते।
(च)परोपकाराय सतां विभूतयःसज्जनों की सम्पत्तियाँ परोपकार के लिए होती हैं।
पद चुनने की युक्ति — छन्द और अर्थ दोनों देखिए:
• (क) में क्रिया-कर्ता चाहिए और ‘सत्पुरुषा इव’ बहुवचन है → वृक्षाः
• (ख) पहले तीन चरणों का साँचा ‘दश—समः X’ है, तो चौथे में भी वही → दशपुत्रसमः
• (ग) में ‘येषां … नार्थिनः’ के साथ तुलना चाहिए → सुजनस्येव (= सुजनस्य इव)।
• (घ) में ‘इदं शरीरम्’ का प्रयोजन चाहिए → परोपकारार्थम्
• (ङ) ‘न खादन्ति’ का कर्म चाहिए, नपुंसकलिङ्ग बहुवचन → फलानि
• (च) ‘सतां’ के बाद षष्ठी का सम्बन्धी पद → विभूतयः
Check it yourself: भरने के बाद हर वाक्य को पाठ के मूल श्लोक से मिला लीजिए — छहों वाक्य पाठ के छह सुभाषितों की ही पंक्तियाँ हैं।
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