प्र1.
अधोलिखितां प्रहेलिकां पठित्वा उत्तरं वदन्तु — वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजः त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः । त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी जलं च बिभ्रन्न घटो न मेघः ॥
उत्तर
उत्तरम् — नारिकेलम् / नारिकेलः (नारिकेलफलम्) । [हिन्दी: नारियल]
प्रहेलिका की चारों पंक्तियाँ एक ही ढंग से बनी हैं — पहले एक लक्षण बताया जाता है, फिर तुरन्त ‘न च’ कहकर उस लक्षण वाले प्रसिद्ध व्यक्ति/वस्तु का निषेध कर दिया जाता है। जो सब लक्षण एक साथ रखता हो पर उनमें से कोई न हो — वही उत्तर है।
| पंक्तिः | अर्थः | नारिकेले कथम् घटते |
|---|---|---|
| वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजः | पेड़ की चोटी पर रहता है, पर पक्षिराज (गरुड़) नहीं है | नारियल का फल सदा वृक्ष की सबसे ऊपरी शाखा पर ही लगता है |
| त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः | तीन आँखें रखता है, पर शूलपाणि (शिव) नहीं है | नारियल की गिरी पर तीन छिद्र होते हैं, जो तीन आँखों जैसे दिखते हैं |
| त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी | छाल का वस्त्र पहनता है, पर सिद्ध योगी नहीं है | नारियल के ऊपर रेशेदार छिलका (जटा) लिपटा रहता है, मानो वल्कल-वस्त्र हो |
| जलं च बिभ्रन्न घटो न मेघः | जल धारण करता है, पर न घड़ा है न बादल | नारियल के भीतर मीठा जल भरा रहता है |
चित्र भी संकेत देता है: पृष्ठ 167 पर प्रहेलिका के दोनों ओर नारिकेल-वृक्षों के चित्र छपे हैं और नीचे गिरे हुए नारियल भी दिखते हैं — यही उत्तर का सबसे सीधा सुराग है।
व्याकरण-संकेत: ‘बिभ्रन्न’ = बिभ्रत् + न (बिभ्रत् = धारण करता हुआ, ‘भृ’ धातु का शतृ-प्रत्ययान्त रूप)। ‘त्वग्वस्त्रधारी’ = त्वक् (छाल) + वस्त्र + धारी।
Try this: इसी ढाँचे पर स्वयं एक प्रहेलिका बनाइए — ‘नेत्रं धारयति न च मानवः, जलं वहति न च नदी’ … और मित्रों से पूछिए।
Try this: इसी ढाँचे पर स्वयं एक प्रहेलिका बनाइए — ‘नेत्रं धारयति न च मानवः, जलं वहति न च नदी’ … और मित्रों से पूछिए।