दीपकम् अध्याय 16 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अधोलिखितां प्रहेलिकां पठित्वा उत्तरं वदन्तु — वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजः त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिः । त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगी जलं च बिभ्रन्न घटो न मेघः ॥
उत्तर

उत्तरम् — नारिकेलम् / नारिकेलः (नारिकेलफलम्) । [हिन्दी: नारियल]

प्रहेलिका की चारों पंक्तियाँ एक ही ढंग से बनी हैं — पहले एक लक्षण बताया जाता है, फिर तुरन्त ‘न च’ कहकर उस लक्षण वाले प्रसिद्ध व्यक्ति/वस्तु का निषेध कर दिया जाता है। जो सब लक्षण एक साथ रखता हो पर उनमें से कोई न हो — वही उत्तर है।

पंक्तिःअर्थःनारिकेले कथम् घटते
वृक्षाग्रवासी न च पक्षिराजःपेड़ की चोटी पर रहता है, पर पक्षिराज (गरुड़) नहीं हैनारियल का फल सदा वृक्ष की सबसे ऊपरी शाखा पर ही लगता है
त्रिनेत्रधारी न च शूलपाणिःतीन आँखें रखता है, पर शूलपाणि (शिव) नहीं हैनारियल की गिरी पर तीन छिद्र होते हैं, जो तीन आँखों जैसे दिखते हैं
त्वग्वस्त्रधारी न च सिद्धयोगीछाल का वस्त्र पहनता है, पर सिद्ध योगी नहीं हैनारियल के ऊपर रेशेदार छिलका (जटा) लिपटा रहता है, मानो वल्कल-वस्त्र हो
जलं च बिभ्रन्न घटो न मेघःजल धारण करता है, पर न घड़ा है न बादलनारियल के भीतर मीठा जल भरा रहता है
चित्र भी संकेत देता है: पृष्ठ 167 पर प्रहेलिका के दोनों ओर नारिकेल-वृक्षों के चित्र छपे हैं और नीचे गिरे हुए नारियल भी दिखते हैं — यही उत्तर का सबसे सीधा सुराग है।
व्याकरण-संकेत: ‘बिभ्रन्न’ = बिभ्रत् + न (बिभ्रत् = धारण करता हुआ, ‘भृ’ धातु का शतृ-प्रत्ययान्त रूप)। ‘त्वग्वस्त्रधारी’ = त्वक् (छाल) + वस्त्र + धारी।
Try this: इसी ढाँचे पर स्वयं एक प्रहेलिका बनाइए — ‘नेत्रं धारयति न च मानवः, जलं वहति न च नदी’ … और मित्रों से पूछिए।
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