प्र1.
गीतम् – अहं पठामि — अहं पठामि संस्कृतम् । अहं वदामि संस्कृतम् । अहं लिखामि संस्कृतम् । सदैव सुन्दराक्षरम् ॥ अहं स्मरामि मातरम् । अहं भजामि मातरम् । अहं नमामि मातरम् । सदैव भक्तिपूर्वकम् ॥ — अस्य गीतस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर
हिन्दी अनुवाद —
| संस्कृतम् | हिन्दी |
|---|---|
| अहं पठामि संस्कृतम् । | मैं संस्कृत पढ़ता / पढ़ती हूँ। |
| अहं वदामि संस्कृतम् । | मैं संस्कृत बोलता / बोलती हूँ। |
| अहं लिखामि संस्कृतम् । | मैं संस्कृत लिखता / लिखती हूँ। |
| सदैव सुन्दराक्षरम् ॥ | — और सदा सुन्दर अक्षरों में। |
| अहं स्मरामि मातरम् । | मैं माता का स्मरण करता हूँ। |
| अहं भजामि मातरम् । | मैं माता का भजन (आराधना) करता हूँ। |
| अहं नमामि मातरम् । | मैं माता को नमन करता हूँ। |
| सदैव भक्तिपूर्वकम् ॥ | — और सदा भक्तिपूर्वक (श्रद्धा के साथ)। |
भावः — पहला पद्य भाषा का संकल्प है — मैं संस्कृत केवल पढ़ूँगा नहीं, बोलूँगा और लिखूँगा भी, और लिखूँगा भी सुन्दर अक्षरों में। दूसरा पद्य श्रद्धा का संकल्प है — माता का स्मरण, आराधना और नमन सदा भक्ति के साथ करूँगा। गीत के साथ छपे चित्र में वीणावादिनी सरस्वती हैं, इसलिए यहाँ ‘माता’ का अर्थ वाग्देवी सरस्वती तथा अपनी जननी — दोनों लिया जा सकता है।
गीत पाठ का अभ्यास भी है: आठों पंक्तियाँ ‘अहम्’ से शुरू होती हैं और हर क्रिया उत्तमपुरुष एकवचन में है — पठामि, वदामि, लिखामि, स्मरामि, भजामि, नमामि। सबका अन्त –आमि पर है — यही पृष्ठ 59 की सारणी में ‘गच्छामि’ के रूप में पढ़ा था। पाठ का व्याकरण गीत बनकर याद हो जाता है।
व्याकरण की तीन बातें: (1) संस्कृतम् और मातरम् कर्म हैं, इसलिए द्वितीया विभक्ति एकवचन में हैं (‘मातृ’ शब्द का द्वितीया एकवचन = मातरम्)। (2) सदैव = सदा + एव (वृद्धि-सन्धि : आ + ए = ऐ)। (3) सुन्दराक्षरम् = सुन्दर + अक्षरम् (दीर्घ-सन्धि : अ + अ = आ) तथा भक्तिपूर्वकम् — दोनों यहाँ क्रियाविशेषण की तरह प्रयुक्त हैं, अर्थात् ‘सुन्दर अक्षरों में’, ‘भक्ति के साथ’।
करके देखिए: गीत को ‘अहम्’ की जगह ‘वयम्’ रखकर गाइए — वयं पठामः संस्कृतम्। वयं वदामः संस्कृतम्। पूरी कक्षा एक साथ गा सकेगी, और बहुवचन का अभ्यास भी हो जाएगा।