दीपकम् अध्याय 4 गीतम् – अहं पठामि

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
गीतम् – अहं पठामि — अहं पठामि संस्कृतम् । अहं वदामि संस्कृतम् । अहं लिखामि संस्कृतम् । सदैव सुन्दराक्षरम् ॥ अहं स्मरामि मातरम् । अहं भजामि मातरम् । अहं नमामि मातरम् । सदैव भक्तिपूर्वकम् ॥ — अस्य गीतस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर

हिन्दी अनुवाद —

संस्कृतम्हिन्दी
अहं पठामि संस्कृतम् ।मैं संस्कृत पढ़ता / पढ़ती हूँ।
अहं वदामि संस्कृतम् ।मैं संस्कृत बोलता / बोलती हूँ।
अहं लिखामि संस्कृतम् ।मैं संस्कृत लिखता / लिखती हूँ।
सदैव सुन्दराक्षरम् ॥— और सदा सुन्दर अक्षरों में।
अहं स्मरामि मातरम् ।मैं माता का स्मरण करता हूँ।
अहं भजामि मातरम् ।मैं माता का भजन (आराधना) करता हूँ।
अहं नमामि मातरम् ।मैं माता को नमन करता हूँ।
सदैव भक्तिपूर्वकम् ॥— और सदा भक्तिपूर्वक (श्रद्धा के साथ)।

भावः — पहला पद्य भाषा का संकल्प है — मैं संस्कृत केवल पढ़ूँगा नहीं, बोलूँगा और लिखूँगा भी, और लिखूँगा भी सुन्दर अक्षरों में। दूसरा पद्य श्रद्धा का संकल्प है — माता का स्मरण, आराधना और नमन सदा भक्ति के साथ करूँगा। गीत के साथ छपे चित्र में वीणावादिनी सरस्वती हैं, इसलिए यहाँ ‘माता’ का अर्थ वाग्देवी सरस्वती तथा अपनी जननी — दोनों लिया जा सकता है।

गीत पाठ का अभ्यास भी है: आठों पंक्तियाँ ‘अहम्’ से शुरू होती हैं और हर क्रिया उत्तमपुरुष एकवचन में है — पठामि, वदामि, लिखामि, स्मरामि, भजामि, नमामि। सबका अन्त –आमि पर है — यही पृष्ठ 59 की सारणी में ‘गच्छामि’ के रूप में पढ़ा था। पाठ का व्याकरण गीत बनकर याद हो जाता है।
व्याकरण की तीन बातें: (1) संस्कृतम् और मातरम् कर्म हैं, इसलिए द्वितीया विभक्ति एकवचन में हैं (‘मातृ’ शब्द का द्वितीया एकवचन = मातरम्)। (2) सदैव = सदा + एव (वृद्धि-सन्धि : आ + ए = ऐ)। (3) सुन्दराक्षरम् = सुन्दर + अक्षरम् (दीर्घ-सन्धि : अ + अ = आ) तथा भक्तिपूर्वकम् — दोनों यहाँ क्रियाविशेषण की तरह प्रयुक्त हैं, अर्थात् ‘सुन्दर अक्षरों में’, ‘भक्ति के साथ’।
करके देखिए: गीत को ‘अहम्’ की जगह ‘वयम्’ रखकर गाइए — वयं पठामः संस्कृतम्। वयं वदामः संस्कृतम्। पूरी कक्षा एक साथ गा सकेगी, और बहुवचन का अभ्यास भी हो जाएगा।
प्र2.
गीते आगतानां क्रियापदानां पुरुषं वचनं च लिखन्तु, तेषां च मध्यमपुरुषे उत्तमपुरुषे च रूपाणि लिखन्तु ।
उत्तर

गीत के छहों क्रियापद लट्-लकार, उत्तमपुरुष, एकवचन के हैं। नीचे उन्हीं धातुओं के अन्य रूप भी दिए गए हैं —

धातुःगीते रूपम् (उत्तम., एक.)मध्यमपुरुषः (त्वम्)प्रथमपुरुषः (सः)उत्तमपुरुषः (वयम्)अर्थः
पठ्पठामिपठसिपठतिपठामःपढ़ना
वद्वदामिवदसिवदतिवदामःबोलना
लिख्लिखामिलिखसिलिखतिलिखामःलिखना
स्मृस्मरामिस्मरसिस्मरतिस्मरामःस्मरण करना
भज्भजामिभजसिभजतिभजामःभजना, सेवा करना
नम्नमामिनमसिनमतिनमामःनमन करना
एक साँचा, छह धातुएँ: छहों में धातु के आगे वही तीन प्रत्यय लगे हैं — –आमि (मैं), –सि (तुम), –ति (वह)। इसलिए किसी भी नई धातु का रूप बनाना हो तो यही साँचा लगाइए : खाद् → खादामि, खादसि, खादति; क्रीड् → क्रीडामि, क्रीडसि, क्रीडति।
दो धातुओं में हल्का परिवर्तन: ‘स्मृ’ की ‘ऋ’ बदलकर ‘अर्’ हो जाती है — स्मृ → स्मति (गुण-परिवर्तन)। ‘नम्’ में कुछ नहीं बदलता — नमति। पहले दिन ही सब नियम याद करने की आवश्यकता नहीं; अभी केवल रूप पहचानिए।
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