प्र1.
‘म्’ इत्यस्य अनुस्वारस्य च लेखननियमं लिखन्तु । यथा — पुस्तकं नास्ति । पुस्तकम् अस्ति ।
उत्तर
नियमः (पुस्तकस्य शब्देषु): व्यञ्जनवर्णात् पूर्वं पदान्तस्य ‘म्’ इत्यस्य स्थाने ‘अनुस्वारः’ लेखनीयः ।
हिन्दी में नियम — यदि किसी पद के अन्त में म् हो और उसके तुरन्त बाद कोई व्यञ्जन आए, तो उस ‘म्’ के स्थान पर अनुस्वार (ं) लिखा जाता है। यदि आगे स्वर हो, तो ‘म्’ ज्यों का त्यों रहता है।
| वाक्यम् | आगे क्या है ? | क्या लिखा जाएगा | हिन्दी |
|---|---|---|---|
| पुस्तकम् + न अस्ति | ‘न्’ = व्यञ्जन | पुस्तकं नास्ति । | पुस्तक नहीं है। |
| पुस्तकम् + अस्ति | ‘अ’ = स्वर | पुस्तकम् अस्ति । | पुस्तक है। |
यह नियम बनाया क्यों गया ? ‘म्’ को बोलने में होंठ पूरे बन्द करने पड़ते हैं। यदि आगे व्यञ्जन आ जाए तो होंठ बन्द करके तुरन्त दूसरा व्यञ्जन बोलना कठिन हो जाता है, इसलिए उच्चारण नाक से निकलने वाली हल्की ध्वनि में बदल जाता है — वही अनुस्वार है। स्वर से पहले ऐसी कठिनाई नहीं होती, इसलिए वहाँ ‘म्’ बना रहता है।
दो-तीन बार बोलकर देखिए: ‘पुस्तकम् नास्ति’ — जीभ और होंठ अटकते हैं; ‘पुस्तकं नास्ति’ — बहता हुआ निकलता है। संस्कृत के सन्धि-नियम अधिकतर बोलने की सुविधा से ही बने हैं।