प्र1.
पृष्ठ 47 — मम नाम भरतः । अहं छात्रः । मम नाम गणेशः । अहं शिक्षकः । मम नाम गौतमः । अहं चिकित्सकः । मम नाम राघवः । अहं कृषकः । — एतेषां वाक्यानां हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु, व्याकरणं च स्पष्टीकुर्वन्तु ।
उत्तर
पाठ का पहला पृष्ठ चार चित्रों से अपना परिचय देना सिखाता है। हर परिचय में दो ही वाक्य हैं — पहले नाम, फिर काम।
| चित्रम् | संस्कृतम् | हिन्दी |
|---|---|---|
| कक्षा में खड़ा विद्यार्थी | मम नाम भरतः । अहं छात्रः । | मेरा नाम भरत है। मैं छात्र हूँ। |
| श्यामपट के पास खड़ा अध्यापक | मम नाम गणेशः । अहं शिक्षकः । | मेरा नाम गणेश है। मैं शिक्षक हूँ। |
| चिकित्सालय में बैठा वैद्य | मम नाम गौतमः । अहं चिकित्सकः । | मेरा नाम गौतम है। मैं चिकित्सक (डॉक्टर) हूँ। |
| खेत में घास काटता किसान | मम नाम राघवः । अहं कृषकः । | मेरा नाम राघव है। मैं किसान हूँ। |
व्याकरण-विवेचनम् (संस्कृतम्): ‘मम’ इति अस्मद्-शब्दस्य षष्ठी-विभक्तेः एकवचनम् (= मेरा)। ‘अहम्’ इति अस्मद्-शब्दस्य प्रथमा-विभक्तेः एकवचनम्। ‘छात्रः, शिक्षकः, चिकित्सकः, कृषकः’ — सर्वाणि पुंलिङ्गे प्रथमा-एकवचनानि।
क्रिया कहाँ गई ? ‘अहं छात्रः।’ में ‘अस्मि’ (हूँ) कहीं दिखता नहीं, फिर भी अर्थ ‘मैं छात्र हूँ’ ही है। संस्कृत में ‘अस्’ धातु का रूप ऐसे परिचय-वाक्यों में छोड़ा जा सकता है — इसे व्याकरण में क्रियापद-अध्याहारः कहते हैं। पृष्ठ 51 पर वही वाक्य क्रिया के साथ भी दिखाए गए हैं — ‘अहम् आरक्षकः अस्मि।’ दोनों शुद्ध हैं।
अनुस्वार पर ध्यान: लिखा है ‘अहं छात्रः’, ‘अहं शिक्षकः’ — यहाँ मूल शब्द अहम् है, पर आगे ‘छ्’, ‘श्’ जैसे व्यञ्जन हैं, इसलिए ‘म्’ बदलकर अनुस्वार हो गया। यही नियम पृष्ठ 52 पर दिया गया है।