दीपकम् अध्याय 4 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
उच्चैः पठन्तु अवगच्छन्तु च — त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥
उत्तर

यह एक परम्परागत प्रार्थना-श्लोक है, जो प्रायः पूजा और विद्यालय की प्रार्थना-सभा में गाया जाता है। पुस्तक ने नीचे इसका पद-विच्छेद भी दे दिया है।

अन्वयः (पदक्रमः) —

देवदेव ! त्वम् एव माता, त्वम् एव च पिता,
त्वम् एव बन्धुः, त्वम् एव च सखा,
त्वम् एव विद्या, त्वम् एव द्रविणम्,
त्वम् एव मम सर्वम् (असि) ।

हिन्दी अर्थ —

संस्कृतम्हिन्दी
त्वमेव माता च पिता त्वमेवतुम ही माता हो और तुम ही पिता हो।
त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेवतुम ही भाई-बन्धु हो और तुम ही मित्र हो।
त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेवतुम ही विद्या हो और तुम ही धन हो।
त्वमेव सर्वं मम देवदेवहे देवों के देव ! तुम ही मेरा सब कुछ हो।

भावः — भक्त कहता है कि संसार में जितने भी सम्बन्ध और जितनी भी सम्पत्तियाँ हैं — माता, पिता, भाई, मित्र, विद्या, धन — वे सब मुझे एक ही ईश्वर में मिल जाते हैं। जिसे भगवान् मिल गया, उसे किसी और सहारे की आवश्यकता नहीं। यह पूर्ण समर्पण का श्लोक है — इसीलिए हर पंक्ति में ‘त्वम् एव’ (तुम ही) बार-बार दोहराया गया है।

पाठ से जोड़िए: पूरे श्लोक में एक ही शब्द बार-बार आता है — त्वम्, यानी युष्मद्-शब्द का प्रथमा एकवचन, जो इसी पाठ का मुख्य विषय है। और अन्त में ‘मम सर्वम्’ में अस्मद्-शब्द की षष्ठी विभक्ति है। यानी श्लोक पाठ के दोनों शब्दों — अहम् और त्वम् — का सुन्दर उदाहरण है।
तीन सन्धियाँ पहचानिए: (1) त्वमेव = त्वम् + एव — आगे स्वर ‘ए’ है, इसलिए ‘म्’ बना रहा और जुड़ गया। (2) बन्धुश्च = बन्धुः + च — विसर्ग के बाद ‘च’ आने पर विसर्ग ‘श्’ हो गया। (3) सर्वं मम = सर्वम् + मम — आगे ‘म्’ (व्यञ्जन) है, इसलिए अनुस्वार। तीसरी सन्धि ठीक वही है जो पृष्ठ 52 पर पढ़ी।
‘उच्चैः पठन्तु’ का अर्थ है ‘ज़ोर से पढ़िए’। यह श्लोक कण्ठस्थ करने योग्य है — लय के साथ तीन-चार बार बोलिए, याद अपने-आप हो जाएगा। ‘अवगच्छन्तु’ = समझिए भी, केवल रटिए मत।
प्र2.
उदाहरणानुगुणम् अधोलिखितेषु वाक्येषु पट्टिकातः उचितैः पदैः रिक्तस्थानानि पूरयन्तु — (पट्टिका : त्वं, युवां, यूयं, अहम्, आवां, वयं) यथा – त्वं छात्रः असि । (क) ……… शिक्षकौ स्वः । (ख) मञ्चे ……… नर्तक्यः स्थ । (ग) अत्र ……… अस्मि । (घ) सभायां ……… गायिके स्थः । (ङ) विद्यालये ……… स्मः । (च) वैद्यालये ……… चिकित्सिका असि ।
उत्तर

भरने का तरीक़ा एक ही है — पहले क्रियापद देखिए, उसी से पुरुष और वचन पक्का हो जाता है, और फिर उसी का सर्वनाम भर दीजिए।

क्रमःक्रियापदम्पुरुषः / वचनम्पूर्णं वाक्यम्हिन्दी
यथाअसिमध्यमपुरुषः, एकवचनम्त्वं छात्रः असि । (पुस्तके दत्तम्)तुम छात्र हो।
(क)स्वःउत्तमपुरुषः, द्विवचनम्आवां शिक्षकौ स्वः ।हम दोनों शिक्षक हैं।
(ख)स्थमध्यमपुरुषः, बहुवचनम्मञ्चे यूयं नर्तक्यः स्थ ।मंच पर तुम सब नर्तकियाँ हो।
(ग)अस्मिउत्तमपुरुषः, एकवचनम्अत्र अहम् अस्मि ।यहाँ मैं हूँ।
(घ)स्थःमध्यमपुरुषः, द्विवचनम्सभायां युवां गायिके स्थः ।सभा में तुम दोनों गायिकाएँ हो।
(ङ)स्मःउत्तमपुरुषः, बहुवचनम्विद्यालये वयं स्मः ।विद्यालय में हम सब हैं।
(च)असिमध्यमपुरुषः, एकवचनम्वैद्यालये त्वं चिकित्सिका असि ।चिकित्सालय में तुम चिकित्सिका हो।
जाँच का पक्का तरीक़ा: पट्टिका में ठीक छह पद हैं और रिक्तस्थान भी छह — इसलिए हर पद ठीक एक बार ही आएगा। भरने के बाद गिन लीजिए : त्वं, युवां, यूयं, अहम्, आवां, वयं — छहों एक-एक बार आ गए तो उत्तर निश्चित रूप से ठीक है।
दो सहारे और: (1) संज्ञा का वचन भी सङ्केत देता है — ‘शिक्षक’ द्विवचन है, ‘नर्तक्यः’ बहुवचन। (2) (ग) में ‘अहम् अस्मि’ लिखा है, ‘अहं अस्मि’ नहीं — क्योंकि आगे ‘अ’ स्वर है। यह पृष्ठ 52 का अनुस्वार-नियम है।
शब्दार्थ: मञ्चे = मंच पर, अत्र = यहाँ, सभायाम् = सभा में, विद्यालये = विद्यालय में, वैद्यालये = चिकित्सालय में। ये सब सप्तमी विभक्ति के रूप हैं, जिनका अर्थ ‘में / पर’ होता है।
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