प्र1.
उच्चैः पठन्तु अवगच्छन्तु च — त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवदेव ॥
उत्तर
यह एक परम्परागत प्रार्थना-श्लोक है, जो प्रायः पूजा और विद्यालय की प्रार्थना-सभा में गाया जाता है। पुस्तक ने नीचे इसका पद-विच्छेद भी दे दिया है।
अन्वयः (पदक्रमः) —
देवदेव ! त्वम् एव माता, त्वम् एव च पिता,
त्वम् एव बन्धुः, त्वम् एव च सखा,
त्वम् एव विद्या, त्वम् एव द्रविणम्,
त्वम् एव मम सर्वम् (असि) ।
त्वम् एव बन्धुः, त्वम् एव च सखा,
त्वम् एव विद्या, त्वम् एव द्रविणम्,
त्वम् एव मम सर्वम् (असि) ।
हिन्दी अर्थ —
| संस्कृतम् | हिन्दी |
|---|---|
| त्वमेव माता च पिता त्वमेव | तुम ही माता हो और तुम ही पिता हो। |
| त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव | तुम ही भाई-बन्धु हो और तुम ही मित्र हो। |
| त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव | तुम ही विद्या हो और तुम ही धन हो। |
| त्वमेव सर्वं मम देवदेव | हे देवों के देव ! तुम ही मेरा सब कुछ हो। |
भावः — भक्त कहता है कि संसार में जितने भी सम्बन्ध और जितनी भी सम्पत्तियाँ हैं — माता, पिता, भाई, मित्र, विद्या, धन — वे सब मुझे एक ही ईश्वर में मिल जाते हैं। जिसे भगवान् मिल गया, उसे किसी और सहारे की आवश्यकता नहीं। यह पूर्ण समर्पण का श्लोक है — इसीलिए हर पंक्ति में ‘त्वम् एव’ (तुम ही) बार-बार दोहराया गया है।
पाठ से जोड़िए: पूरे श्लोक में एक ही शब्द बार-बार आता है — त्वम्, यानी युष्मद्-शब्द का प्रथमा एकवचन, जो इसी पाठ का मुख्य विषय है। और अन्त में ‘मम सर्वम्’ में अस्मद्-शब्द की षष्ठी विभक्ति है। यानी श्लोक पाठ के दोनों शब्दों — अहम् और त्वम् — का सुन्दर उदाहरण है।
तीन सन्धियाँ पहचानिए: (1) त्वमेव = त्वम् + एव — आगे स्वर ‘ए’ है, इसलिए ‘म्’ बना रहा और जुड़ गया। (2) बन्धुश्च = बन्धुः + च — विसर्ग के बाद ‘च’ आने पर विसर्ग ‘श्’ हो गया। (3) सर्वं मम = सर्वम् + मम — आगे ‘म्’ (व्यञ्जन) है, इसलिए अनुस्वार। तीसरी सन्धि ठीक वही है जो पृष्ठ 52 पर पढ़ी।
‘उच्चैः पठन्तु’ का अर्थ है ‘ज़ोर से पढ़िए’। यह श्लोक कण्ठस्थ करने योग्य है — लय के साथ तीन-चार बार बोलिए, याद अपने-आप हो जाएगा। ‘अवगच्छन्तु’ = समझिए भी, केवल रटिए मत।