दीपकम् अध्याय 5 कार्यकलापः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
संख्यागीतम् — एकं द्वे, एकं द्वे । पश्यत किमस्ति मम हस्ते । त्रीणि चत्वारि, त्रीणि चत्वारि । हस्ते पात्रं, पात्रे वारि । पञ्च षट्, पञ्च षट् । जम्बीररसं योजयत । सप्त अष्ट, सप्त अष्ट । लवणं गुडं च मेलयत । नव दश, नव दश । शनैः शनैः मन्थयत ॥ — अस्य गीतस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर

यह गिनती का गीत भी है और शिकंजी बनाने की विधि भी — हर जोड़ी के साथ एक नया काम।

संख्यासंस्कृतम्हिन्दी
१, २एकं द्वे, एकं द्वे । पश्यत किमस्ति मम हस्ते ।एक दो, एक दो। देखो, मेरे हाथ में क्या है ?
३, ४त्रीणि चत्वारि, त्रीणि चत्वारि । हस्ते पात्रं, पात्रे वारि ।तीन चार, तीन चार। हाथ में बर्तन है, बर्तन में पानी है।
५, ६पञ्च षट्, पञ्च षट् । जम्बीररसं योजयत ।पाँच छह, पाँच छह। (उसमें) नींबू का रस मिलाओ।
७, ८सप्त अष्ट, सप्त अष्ट । लवणं गुडं च मेलयत ।सात आठ, सात आठ। नमक और गुड़ मिलाओ।
९, १०नव दश, नव दश । शनैः शनैः मन्थयत ॥नौ दस, नौ दस। धीरे-धीरे मथो (घोलो)।

व्याकरण-विवेचनम् (संस्कृतम्): ‘पश्यत, योजयत, मेलयत, मन्थयत’ — सर्वाणि लोट्-लकारे मध्यमपुरुषस्य बहुवचनानि (= तुम सब देखो / मिलाओ / मथो)। ‘हस्ते, पात्रे’ — सप्तमी-विभक्तेः एकवचने। ‘किमस्ति = किम् + अस्ति’ । ‘जम्बीररसम्, लवणम्, गुडम्’ — द्वितीया-विभक्तिः (कर्मणि द्वितीया), यतः तानि मेलनस्य कर्माणि सन्ति ।

यह ‘कार्यकलापः’ क्यों है, ‘पाठः’ नहीं: क्योंकि इसे केवल पढ़ना नहीं — करके देखना है। पृष्ठ 68 के चित्र में माँ और बेटी रसोई में नींबू-पानी बना रही हैं। कक्षा में सचमुच पात्र, जल, नींबू, नमक और गुड़ लेकर, हर पंक्ति गाते हुए वही क्रिया कीजिए — जो शब्द हाथ से जुड़ जाए, वह कभी नहीं भूलता।
शब्दार्थाः: पात्रम् = बर्तन; वारि = जल; जम्बीरः = नींबू; जम्बीररसः = नींबू का रस; लवणम् = नमक; गुडः = गुड़; मेलयत = मिलाओ; मन्थयत = मथो/घोलो; शनैः शनैः = धीरे-धीरे।
प्र2.
संख्यागीते आगतानां संख्यापदानां क्रमं लिखन्तु, तेषां च अङ्कान् लिखन्तु ।
उत्तर

गीत में एक से दस तक की संख्याएँ जोड़ी-जोड़ी में आई हैं, और हर जोड़ी दो-दो बार दोहराई गई है।

एकं – द्वे → १, २
त्रीणि – चत्वारि → ३, ४
पञ्च – षट् → ५, ६
सप्त – अष्ट → ७, ८
नव – दश → ९, १०
कुल संख्यापदानि = दश
अङ्कःसंख्यापदम्लिङ्गम्टिप्पणी
एकम्नपुंसकलिङ्गम्पुंसि ‘एकः’, स्त्रियां ‘एका’
द्वेनपुंसकलिङ्गम्पुंसि ‘द्वौ’, स्त्रियां ‘द्वे’
त्रीणिनपुंसकलिङ्गम्पुंसि ‘त्रयः’, स्त्रियां ‘तिस्रः’
चत्वारिनपुंसकलिङ्गम्पुंसि ‘चत्वारः’, स्त्रियां ‘चतस्रः’
५ – १०पञ्च, षट्, सप्त, अष्ट, नव, दशत्रिषु लिङ्गेषु समानम्रूप नहीं बदलता
गीत में नपुंसकलिङ्ग के रूप क्यों: क्योंकि गिनती अपने-आप में किसी वस्तु से जुड़ी नहीं है — केवल संख्या बोली जा रही है। ऐसी स्वतन्त्र गिनती में संस्कृत नपुंसकलिङ्ग के रूप लेती है — एकम्, द्वे, त्रीणि, चत्वारि। पर जैसे ही कोई संज्ञा जुड़े, रूप उसी के लिङ्ग में ढल जाएगा — एकः सूर्यः, चत्वारः बालकाः, तिस्रः बालिकाः।
Try This: गीत को ताली के साथ गाइए — हर संख्या पर एक ताली। ‘एकं द्वे’ पर दो ताली, ‘त्रीणि चत्वारि’ पर दो ताली … पद्य की पंक्ति ‘कुर्मो बहुधा करतालम्’ का यही अर्थ है।
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