दीपकम् अध्याय 5 संख्यागीतम् (पद्यांशाः)

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
एकः सूर्यः चन्द्रोऽप्येकः मानवकुलमप्येकम् । द्वे नयने ननु जीविनि सकले प्रभवति सर्वो द्रष्टुम् ॥ — अस्य पद्यांशस्य अन्वयं, हिन्दी-अर्थं, भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

अन्वयः — सूर्यः एकः (अस्ति), चन्द्रः अपि एकः (अस्ति), मानवकुलम् अपि एकम् (अस्ति) । सकले जीविनि ननु द्वे नयने (स्तः), (अतः) सर्वः द्रष्टुं प्रभवति ।

पद-विच्छेदःअर्थः
चन्द्रोऽप्येकः = चन्द्रः + अपि + एकःचन्द्रमा भी एक (है)
मानवकुलमप्येकम् = मानवकुलम् + अपि + एकम्मनुष्य-जाति भी एक ही (है)
ननुनिश्चय ही, सचमुच (अव्ययम्)
जीविनि सकलेहर प्राणी में (सप्तमी एकवचन)
प्रभवति द्रष्टुम्देखने में समर्थ होता है

हिन्दी अर्थ — सूर्य एक है, चन्द्रमा भी एक ही है, और मनुष्यों का कुल भी एक ही है। हर जीव में सचमुच दो आँखें होती हैं, (इन्हीं से) हर कोई देख पाता है।

भावः — कवि ने ‘एक’ और ‘दो’ को सिखाने के लिए ऐसे उदाहरण चुने जो हर बच्चे की आँखों के सामने रहते हैं — आकाश में एक सूरज, एक चाँद, और अपने चेहरे पर दो आँखें। साथ ही एक बड़ी बात चुपचाप कह दी — ‘मानवकुलम् अपि एकम्’ — रंग, भाषा, देश चाहे अलग हों, मनुष्य-जाति एक ही है। गिनती के गीत में यह वसुधैव कुटुम्बकम् का बीज है।
व्याकरण-सङ्केतः: ‘द्वे नयने’ — नपुंसकलिङ्गे द्विवचनम् (नयनम् → नयने)। संस्कृत में आँख, कान, हाथ, पैर जैसे जोड़े वाले अङ्गों के लिए द्विवचन ही चलता है — द्वे नयने, द्वौ कर्णौ, द्वौ हस्तौ, द्वौ पादौ।
प्र2.
लोकशङ्करस्त्रिनयनमूर्तिः नमाम्यहं तं प्रतिदिवसम् । चतुर्मुखोऽयं जगतः स्रष्टा तेन हि सृष्टं जीवकुलम् ॥ — अस्य पद्यांशस्य अन्वयं, हिन्दी-अर्थं, भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

अन्वयः — लोकशङ्करः त्रिनयनमूर्तिः (अस्ति), तम् अहं प्रतिदिवसं नमामि । अयं चतुर्मुखः जगतः स्रष्टा (अस्ति), तेन हि जीवकुलं सृष्टम् ।

पद-विच्छेदःअर्थः
लोकशङ्करस्त्रिनयनमूर्तिः = लोकशङ्करः + त्रिनयनमूर्तिःसंसार का कल्याण करने वाले शिव — तीन नेत्रों वाली मूर्ति (विसर्ग-सन्धिः)
नमाम्यहं = नमामि + अहम्मैं नमस्कार करता हूँ (यण्-सन्धिः)
चतुर्मुखोऽयं = चतुर्मुखः + अयम्यह चार मुख वाला (ब्रह्मा)
स्रष्टासृष्टिकर्ता, रचने वाला
तेन हि सृष्टम्उसी के द्वारा रचा गया

हिन्दी अर्थ — संसार का कल्याण करने वाले शिव तीन नेत्रों वाले हैं; मैं प्रतिदिन उन्हें प्रणाम करता हूँ। ये चार मुख वाले (ब्रह्मा) जगत् के रचयिता हैं; उन्होंने ही जीव-जगत् की रचना की है।

भावः — यहाँ तीन और चार सिखाए गए हैं — पर सूखे अङ्कों की तरह नहीं। ‘तीन’ के लिए त्रिनयन शिव और ‘चार’ के लिए चतुर्मुख ब्रह्मा — दोनों ऐसी छवियाँ हैं जो बच्चे ने मन्दिर में, कैलेण्डर में, कथा में देखी होती हैं। जो चित्र मन में बस जाए, वह संख्या भूलती नहीं। साथ ही यह भी बता दिया कि ‘नमामि’ — नमन करना — प्रतिदिन का काम है।
शब्द बनाना सीखिए: त्रि + नयन = त्रिनयनः (तीन आँखों वाला), चतुर् + मुख = चतुर्मुखः (चार मुखों वाला), षट् + मुख = षण्मुखः (छह मुखों वाला)। यह बहुव्रीहि समास है — समास का अर्थ किसी तीसरे व्यक्ति पर जाता है।
प्र3.
पञ्चाङ्गुलयो मम करकमले लोके विदधति गणनाम् । सुरसेनानीः षण्मुखदेवः सततं पात्ययममरगणम् ॥ — अस्य पद्यांशस्य अन्वयं, हिन्दी-अर्थं, भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

अन्वयः — मम करकमले पञ्च अङ्गुलयः (सन्ति, याः) लोके गणनां विदधति । सुरसेनानीः षण्मुखदेवः अयम् अमरगणं सततं पाति ।

पद-विच्छेदःअर्थः
पञ्चाङ्गुलयो = पञ्च + अङ्गुलयःपाँच उँगलियाँ (दीर्घ-सन्धिः)
करकमलेकमल जैसे (सुन्दर) हाथ में (हस्तारविन्दे)
विदधतिकरती हैं (कुर्वन्ति)
सुरसेनानीःदेवताओं के सेनापति — कार्तिकेय
पात्ययममरगणम् = पाति + अयम् + अमरगणम्यह देव-समूह की रक्षा करता है (यण्-सन्धिः: इ + अ = य)

हिन्दी अर्थ — मेरे कमल-से हाथ में पाँच उँगलियाँ हैं, जो संसार में गिनती करने का काम करती हैं। देवताओं के सेनापति ये छह मुख वाले कार्तिकेय देव देव-समूह की सदा रक्षा करते हैं।

भावः — कवि ने ‘पाँच’ के लिए सबसे नज़दीकी वस्तु उठाई — अपना ही हाथ। गिनती की पहली पाठशाला उँगलियाँ ही हैं, इसीलिए ‘लोके विदधति गणनाम्’ कहा गया — दुनिया भर में लोग उँगलियों से ही गिनना शुरू करते हैं। और ‘छह’ के लिए षण्मुख कार्तिकेय — जिनके छह मुख हैं, और जो देवसेना के रक्षक हैं। शरीर और देवता, दोनों संख्या के जीते-जागते चित्र बन जाते हैं।
पुस्तक का ही शब्दार्थ देखिए (पृष्ठ 63): ‘पाति = रक्षति = रक्षा करता है’। इसी से सिद्ध होता है कि ‘पात्ययम्’ का विच्छेद पाति + अयम् है — और सन्धि का नियम है इ + अ = य् (यण् सन्धि), जैसे प्रति + एकः = प्रत्येकः।
प्र4.
सप्त वासराः सप्ताहे ननु स्वराः सुमधुराः सप्त । ऊर्ध्वमधस्तात् लोकाः सप्त ख्याता ऋषयः सप्त ॥ — अस्य पद्यांशस्य अन्वयं, हिन्दी-अर्थं, भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

अन्वयः — सप्ताहे ननु सप्त वासराः (भवन्ति) । सुमधुराः स्वराः (अपि) सप्त (सन्ति) । ऊर्ध्वम् अधस्तात् (च) लोकाः सप्त (सन्ति) । ख्याताः ऋषयः (अपि) सप्त (सन्ति) ।

‘सप्त’ किसकासंस्कृतम्वे सात कौन-से
दिनसप्त वासराःरविः, सोमः, मङ्गलः, बुधः, गुरुः, शुक्रः, शनिः
स्वरसप्त स्वराःषड्जः (सा), ऋषभः (रे), गान्धारः (ग), मध्यमः (म), पञ्चमः (प), धैवतः (ध), निषादः (नि)
लोकसप्त लोकाःभूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् — ऊपर के; और नीचे के भी सात (पाताल आदि)
ऋषिसप्त ऋषयःमरीचिः, अत्रिः, अङ्गिराः, पुलस्त्यः, पुलहः, क्रतुः, वसिष्ठः (पृष्ठ 68)

हिन्दी अर्थ — सप्ताह में निश्चय ही सात दिन होते हैं; मीठे स्वर भी सात होते हैं; ऊपर और नीचे के लोक भी सात हैं; और प्रसिद्ध ऋषि भी सात हैं।

भावः — यह पूरा पद्य केवल एक संख्या — सात — पर टिका है, पर उसे चार अलग-अलग दुनियाओं से जोड़ देता है: कैलेण्डर (सप्ताह), संगीत (स्वर), शास्त्र (लोक) और परम्परा (सप्तर्षि)। एक ही संख्या जब चार जगह दिखे, तो वह पक्की याद हो जाती है। पृष्ठ 62 पर छपे कैलेण्डर और हारमोनियम बजाते व्यक्ति के चित्र ठीक यही दो उदाहरण आँखों के सामने रख देते हैं।
पद-विच्छेदः: ऊर्ध्वमधस्तात् = ऊर्ध्वम् + अधस्तात् (ऊपर + नीचे)। ‘ऊर्ध्वम्’ और ‘अधः’ दोनों शब्द अगले पृष्ठ पर ‘दश दिशाः’ में फिर आएँगे — क्योंकि आठ दिशाओं के साथ ऊपर और नीचे मिलाकर ही दस दिशाएँ बनती हैं।
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