दीपकम् अध्याय 5 संख्यागीतम् (शेषपद्यांशौ) तथा दश दिशाः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
अष्ट दिग्गजा धरन्ति धरणीम् उपकृतिशीला अतुलबलाः । नव ग्रहा ननु विपुले गगने चरन्ति सततं नियततया ॥ — अस्य पद्यांशस्य अन्वयं, हिन्दी-अर्थं, भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

अन्वयः — उपकृतिशीलाः अतुलबलाः अष्ट दिग्गजाः धरणीं धरन्ति । नव ग्रहाः ननु विपुले गगने सततं नियततया चरन्ति ।

पदम्अर्थः (पुस्तकात्)हिन्दी
दिग्गजाःदिशानां गजाःदिशाओं के हाथी
उपकृतिशीलाःउपकार-स्वभावाःउपकार करने के स्वभाव वाले
अतुलबलाःअतुल्यशक्ति-सम्पन्नाःअतुलनीय बल वाले
नियततयानियमितरूपेणनियमित रूप से
विपुले गगनेविशाले आकाशेविशाल आकाश में

हिन्दी अर्थ — उपकार करने के स्वभाव वाले और अतुलनीय बल वाले आठ दिग्गज (दिशाओं के हाथी) पृथ्वी को धारण करते हैं। नौ ग्रह निश्चय ही विशाल आकाश में सदा नियमित रूप से घूमते रहते हैं।

भावः — ‘आठ’ के लिए परम्परा की कल्पना ली गई — आठ दिशाओं में खड़े आठ हाथी पृथ्वी को थामे हैं; वे बलवान भी हैं और परोपकारी भी। ‘नौ’ के लिए आकाश का सच लिया गया — नौ ग्रह सततं नियततया चलते हैं, यानी बिना रुके और बिना नियम तोड़े। कवि यहाँ चुपके से एक जीवन-शिक्षा भी दे देते हैं — बल का उपयोग दूसरों को सँभालने में हो, और काम में नियमितता हो।
नव ग्रहाः कौन (पृष्ठ 68): सूर्यः, चन्द्रः, मङ्गलः, बुधः, गुरुः, शुक्रः, शनिः, राहुः, केतुः। पृष्ठ 63 के चित्र में सूर्य के चारों ओर कक्षाओं में घूमते ग्रह दिखाए गए हैं — पद्य का ‘चरन्ति’ वही चित्र है।
प्र2.
पूर्वाद्या दश दिशः प्रसिद्धाः सङ्ख्यागणना ननु सरला । गायामो वयममितामोदं कुर्मो बहुधा करतालम् ॥ — अस्य पद्यांशस्य अन्वयं, हिन्दी-अर्थं, भावं च लिखन्तु । कविः कः ?
उत्तर

अन्वयः — पूर्वाद्याः दश दिशः प्रसिद्धाः (सन्ति) । सङ्ख्यागणना ननु सरला (अस्ति) । वयम् अमितामोदं गायामः, बहुधा करतालं कुर्मः ।

पद-विच्छेदःअर्थः
पूर्वाद्याः = पूर्वा + आद्याःपूर्व आदि (पूर्व जिनमें पहली है)
गायामो वयममितामोदं = गायामः + वयम् + अमितामोदम्हम अपार आनन्द से गाते हैं
अमितामोदम्अत्यानन्दपूर्वकम् — अति आनन्दपूर्वक
कुर्मो बहुधा करतालम् = कुर्मः + बहुधा + करतालम्हम बार-बार ताली बजाते हैं

हिन्दी अर्थ — पूर्व आदि दस दिशाएँ प्रसिद्ध हैं। गिनती तो सचमुच सरल है ! हम बहुत आनन्द के साथ गाते हैं और बार-बार ताली बजाते हैं।

कविः — डॉ. जनार्दनहेगडे (इस संख्यागीत के रचयिता; उनका नाम पृष्ठ 63 पर पद्य के नीचे छपा है।)

भावः — यह अन्तिम पद्य दो काम करता है। पहला — ‘दस’ को दस दिशाओं से जोड़कर गिनती पूरी करता है। दूसरा — पूरे गीत का निष्कर्ष बोल देता है: ‘सङ्ख्यागणना ननु सरला’ — गिनती सचमुच आसान है। और सीखने का तरीक़ा भी बता देता है — गाकर और ताली बजाकर। जो पाठ ताली के साथ गाया जाए, वह याद रखने के लिए दोहराना नहीं पड़ता। पाठ का शीर्षक भी इसी पंक्ति से लिया गया है।
‘ननु’ का काम: यह अव्यय पूरे गीत में चार बार आया है — ‘द्वे नयने ननु’, ‘सप्त वासराः सप्ताहे ननु’, ‘नव ग्रहा ननु’, ‘सङ्ख्यागणना ननु सरला’। हर बार अर्थ है — सचमुच, निश्चय ही। यह बात को पक्का करने वाला शब्द है।
प्र3.
गृहस्य दश दिशाः — पूर्वदिशा, पश्चिमदिशा, उत्तरदिशा, दक्षिणदिशा, ईशानदिशा, आग्नेयदिशा, नैर्ऋत्यदिशा, वायव्यदिशा, ऊर्ध्वम्, अधः — (पृष्ठ 63 चित्रम्) । दिशानां नामानि तेषाम् अर्थं च लिखन्तु ।
उत्तर

पृष्ठ 63 के चित्र में एक बालक दोनों हाथ फैलाकर खड़ा है और उसके चारों ओर दस दिशाएँ अङ्कित हैं। दस दिशाएँ = चार मुख्य + चार कोण + ऊपर + नीचे

क्रमःसंस्कृतम्हिन्दीEnglishप्रकारः
पूर्वदिशापूर्वEastमुख्या दिक्
पश्चिमदिशापश्चिमWestमुख्या दिक्
उत्तरदिशाउत्तरNorthमुख्या दिक्
दक्षिणदिशादक्षिणSouthमुख्या दिक्
ईशानदिशाउत्तर-पूर्वNorth-Eastकोणः (विदिक्)
आग्नेयदिशादक्षिण-पूर्वSouth-Eastकोणः (विदिक्)
नैर्ऋत्यदिशादक्षिण-पश्चिमSouth-Westकोणः (विदिक्)
वायव्यदिशाउत्तर-पश्चिमNorth-Westकोणः (विदिक्)
ऊर्ध्वम्ऊपरAboveऊर्ध्वदिक्
१०अधःनीचेBelowअधोदिक्
कोणों के नाम देवताओं से बने हैं: ईशान = ईश (शिव) की दिशा; आग्नेय = अग्नि की दिशा; नैर्ऋत्य = निर्ऋति की दिशा; वायव्य = वायु की दिशा। पृष्ठ 68 की सूची में यही आठ दिक्पाल गिनाए गए हैं — इन्द्रः, अग्निः, यमः, निर्ऋतिः, वरुणः, वायुः, कुबेरः, ईशानः। दिशा का नाम याद रखना हो तो उसके देवता का नाम याद कर लीजिए।
पहचानने का सरल तरीक़ा: सूर्य जिधर उगे वह पूर्वदिशा। पूर्व की ओर मुँह करके खड़े हो जाइए — तब बायाँ हाथ उत्तर, दायाँ हाथ दक्षिण, पीठ की ओर पश्चिम। दोनों मुख्य दिशाओं के बीच का कोना ही विदिक् (कोण) है।
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