प्र1.
पट्टिकातः शिष्टाचारस्य पदानि चित्वा लिखन्तु — कलहः, गुरुवन्दनम्, वृद्धसेवा, अतिथिसत्कारः, अहङ्कारः, मातृप्रेम, पितृभक्तिः, ज्येष्ठेषु आदरः, कनिष्ठेषु प्रीतिः, परस्परद्वेषः, बन्धुषु प्रीतिः, असूया, स्वाभिमानम्, परोपकारः, प्राणिषु दया, प्रियवचनम्, हिंसा, सत्यकथनम्, सत्पात्रे दानम्, सर्वेषु मैत्रीभावः, अहिंसा, समयपालनम्, स्वच्छता, प्रकृतिरक्षणम्, भ्रातृषु भगिनीषु च स्नेहः । (यथा – गुरुवन्दनम्)
उत्तर
पीली पट्टिका में २५ पद हैं। इनमें से पाँच दुर्गुण हैं — उन्हें छोड़ देना है; शेष सब शिष्टाचार के पद हैं।
शिष्टाचारस्य पदानि —
| क्रमः | शिष्टाचारपदम् | हिन्दी अर्थ |
|---|---|---|
| १ | गुरुवन्दनम् (यथा) | गुरु को प्रणाम करना |
| २ | वृद्धसेवा | बुज़ुर्गों की सेवा |
| ३ | अतिथिसत्कारः | अतिथि का आदर-सत्कार |
| ४ | मातृप्रेम | माता से प्रेम |
| ५ | पितृभक्तिः | पिता के प्रति भक्ति |
| ६ | ज्येष्ठेषु आदरः | बड़ों के प्रति आदर |
| ७ | कनिष्ठेषु प्रीतिः | छोटों से स्नेह |
| ८ | बन्धुषु प्रीतिः | सगे-सम्बन्धियों से प्रेम |
| ९ | स्वाभिमानम् | आत्म-सम्मान |
| १० | परोपकारः | दूसरों का भला करना |
| ११ | प्राणिषु दया | सब प्राणियों पर दया |
| १२ | प्रियवचनम् | मीठा बोलना |
| १३ | सत्यकथनम् | सच बोलना |
| १४ | सत्पात्रे दानम् | योग्य पात्र को दान |
| १५ | सर्वेषु मैत्रीभावः | सबके प्रति मित्रता का भाव |
| १६ | अहिंसा | किसी को न सताना |
| १७ | समयपालनम् | समय की पाबन्दी |
| १८ | स्वच्छता | सफ़ाई |
| १९ | प्रकृतिरक्षणम् | प्रकृति की रक्षा |
| २० | भ्रातृषु भगिनीषु च स्नेहः | भाइयों और बहनों से स्नेह |
एतानि पदानि न चेतव्यानि (दुर्गुणाः) —
| त्याज्यपदम् | अर्थः | किमर्थं त्याज्यम् |
|---|---|---|
| कलहः | झगड़ा | शिष्टाचार का उलटा — यह सम्बन्ध तोड़ता है |
| अहङ्कारः | घमण्ड | ‘स्वाभिमान’ से अलग — यह दूसरों को छोटा समझता है |
| परस्परद्वेषः | आपसी बैर | मैत्रीभाव का विपरीत |
| असूया | ईर्ष्या, दूसरे के गुण में दोष देखना | प्रीति का विपरीत |
| हिंसा | किसी को कष्ट देना | अहिंसा और दया का विपरीत |
‘स्वाभिमानम्’ और ‘अहङ्कारः’ का भेद ही इस प्रश्न की असली परीक्षा है: स्वाभिमान का अर्थ है — अपने को गिरने न देना, ग़लत काम न करना; यह गुण है। अहङ्कार का अर्थ है — अपने को दूसरों से ऊँचा मानना; यह दोष है। दोनों को एक साथ रखकर पुस्तक ने चुपचाप यह भेद सिखा दिया।
Tip: पुस्तक में उत्तर के लिए १६ रिक्त स्थान (चार पंक्तियाँ × चार खाने) छपे हैं, जबकि पट्टिका में शिष्टाचार के पद २० हैं। इसलिए बचे हुए पद अपनी कॉपी में नीचे लिख लीजिए — ध्यान रहे, ‘बन्धुषु’ और ‘प्रीतिः’ पट्टिका में अलग-अलग खानों में छपे हैं, पर वे एक ही पद हैं — बन्धुषु प्रीतिः।