दीपकम् अध्याय 6 वयम् अभ्यासं कुर्मः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
पट्टिकातः शिष्टाचारस्य पदानि चित्वा लिखन्तु — कलहः, गुरुवन्दनम्, वृद्धसेवा, अतिथिसत्कारः, अहङ्कारः, मातृप्रेम, पितृभक्तिः, ज्येष्ठेषु आदरः, कनिष्ठेषु प्रीतिः, परस्परद्वेषः, बन्धुषु प्रीतिः, असूया, स्वाभिमानम्, परोपकारः, प्राणिषु दया, प्रियवचनम्, हिंसा, सत्यकथनम्, सत्पात्रे दानम्, सर्वेषु मैत्रीभावः, अहिंसा, समयपालनम्, स्वच्छता, प्रकृतिरक्षणम्, भ्रातृषु भगिनीषु च स्नेहः । (यथा – गुरुवन्दनम्)
उत्तर

पीली पट्टिका में २५ पद हैं। इनमें से पाँच दुर्गुण हैं — उन्हें छोड़ देना है; शेष सब शिष्टाचार के पद हैं।

शिष्टाचारस्य पदानि —

क्रमःशिष्टाचारपदम्हिन्दी अर्थ
गुरुवन्दनम् (यथा)गुरु को प्रणाम करना
वृद्धसेवाबुज़ुर्गों की सेवा
अतिथिसत्कारःअतिथि का आदर-सत्कार
मातृप्रेममाता से प्रेम
पितृभक्तिःपिता के प्रति भक्ति
ज्येष्ठेषु आदरःबड़ों के प्रति आदर
कनिष्ठेषु प्रीतिःछोटों से स्नेह
बन्धुषु प्रीतिःसगे-सम्बन्धियों से प्रेम
स्वाभिमानम्आत्म-सम्मान
१०परोपकारःदूसरों का भला करना
११प्राणिषु दयासब प्राणियों पर दया
१२प्रियवचनम्मीठा बोलना
१३सत्यकथनम्सच बोलना
१४सत्पात्रे दानम्योग्य पात्र को दान
१५सर्वेषु मैत्रीभावःसबके प्रति मित्रता का भाव
१६अहिंसाकिसी को न सताना
१७समयपालनम्समय की पाबन्दी
१८स्वच्छतासफ़ाई
१९प्रकृतिरक्षणम्प्रकृति की रक्षा
२०भ्रातृषु भगिनीषु च स्नेहःभाइयों और बहनों से स्नेह

एतानि पदानि न चेतव्यानि (दुर्गुणाः) —

त्याज्यपदम्अर्थःकिमर्थं त्याज्यम्
कलहःझगड़ाशिष्टाचार का उलटा — यह सम्बन्ध तोड़ता है
अहङ्कारःघमण्ड‘स्वाभिमान’ से अलग — यह दूसरों को छोटा समझता है
परस्परद्वेषःआपसी बैरमैत्रीभाव का विपरीत
असूयाईर्ष्या, दूसरे के गुण में दोष देखनाप्रीति का विपरीत
हिंसाकिसी को कष्ट देनाअहिंसा और दया का विपरीत
‘स्वाभिमानम्’ और ‘अहङ्कारः’ का भेद ही इस प्रश्न की असली परीक्षा है: स्वाभिमान का अर्थ है — अपने को गिरने न देना, ग़लत काम न करना; यह गुण है। अहङ्कार का अर्थ है — अपने को दूसरों से ऊँचा मानना; यह दोष है। दोनों को एक साथ रखकर पुस्तक ने चुपचाप यह भेद सिखा दिया।
Tip: पुस्तक में उत्तर के लिए १६ रिक्त स्थान (चार पंक्तियाँ × चार खाने) छपे हैं, जबकि पट्टिका में शिष्टाचार के पद २० हैं। इसलिए बचे हुए पद अपनी कॉपी में नीचे लिख लीजिए — ध्यान रहे, ‘बन्धुषु’ और ‘प्रीतिः’ पट्टिका में अलग-अलग खानों में छपे हैं, पर वे एक ही पद हैं — बन्धुषु प्रीतिः
प्र2.
उदाहरणानुगुणं समयं संख्याभिः लिखन्तु — यथा – पादोन-सप्तवादनम् – ६:४५ । (क) सार्ध-दशवादनम् (ख) दशवादनम् (ग) सपाद-षड्वादनम् (घ) सार्ध-चतुर्वादनम् (ङ) पादोन-एकादशवादनम् ।
उत्तर

हर शब्द के तीन भाग देखिए — उपसर्ग-जैसा पद (सपाद/सार्ध/पादोन), संख्या, और वादनम्

क्रमःसंस्कृतम्गणनाउत्तरम् (अङ्केषु)हिन्दी
यथापादोन-सप्तवादनम्७:०० − ०:१५६:४५पौने सात
(क)सार्ध-दशवादनम्१०:०० + ०:३०१०:३०साढ़े दस
(ख)दशवादनम्पूर्णः समयः१०:००दस बजे
(ग)सपाद-षड्वादनम्६:०० + ०:१५६:१५सवा छह
(घ)सार्ध-चतुर्वादनम्४:०० + ०:३०४:३०साढ़े चार
(ङ)पादोन-एकादशवादनम्११:०० − ०:१५१०:४५पौने ग्यारह
(ङ) पर सबसे ज़्यादा ग़लती होती है: ‘एकादश’ यानी ग्यारह, और ‘पादोन’ यानी एक चौथाई कम — तो उत्तर १०:४५ है, ११:४५ नहीं। मन-ही-मन ऐसा कहिए — ‘ग्यारह बजने में पन्द्रह मिनट बाक़ी’। वही तो ‘पौने ग्यारह’ है।
Check it yourself: जिस उत्तर में मिनट :४५ हों, उसमें घण्टा शब्द में लिखी संख्या से एक कम होना ही चाहिए। जिनमें :१५ या :३० हों, उनमें घण्टा वही रहेगा।
प्र3.
उदाहरणानुगुणं समयम् अक्षरैः लिखन्तु — यथा – ०६:०० – षड्वादनम् । (क) ०५:३० (ख) ०९:४५ (ग) १२:०० (घ) ०६:४५ (ङ) ११:३० ।
उत्तर

अब उलटा काम है — अङ्क देखकर संस्कृत शब्द बनाना। पहले मिनट देखिए, फिर घण्टा।

क्रमःअङ्केषुनिमेषाः किं सूचयन्तिउत्तरम् (अक्षरैः)हिन्दी
यथा०६:००:०० → पूर्णःषड्वादनम्छह बजे
(क)०५:३०:३० → सार्धसार्ध-पञ्चवादनम्साढ़े पाँच
(ख)०९:४५:४५ → पादोन (अग्रिमः घण्टः)पादोन-दशवादनम्पौने दस
(ग)१२:००:०० → पूर्णःद्वादशवादनम्बारह बजे
(घ)०६:४५:४५ → पादोन (अग्रिमः घण्टः)पादोन-सप्तवादनम्पौने सात
(ङ)११:३०:३० → सार्धसार्ध-एकादशवादनम्साढ़े ग्यारह
नियमः —
मिनट :०० → केवल संख्या + वादनम्
मिनट :१५सपाद + उसी घण्टे की संख्या
मिनट :३०सार्ध + उसी घण्टे की संख्या
मिनट :४५पादोन + अगले घण्टे की संख्या
(ख) और (घ) में घण्टा बदलना ही असली चाल है: ०९:४५ में घड़ी पर ‘९’ दिख रहा है, पर संस्कृत नाम में ‘दश’ आएगा — पादोन-दशवादनम्। कारण वही — पादोन का अर्थ है ‘उस घण्टे में से चौथाई कम’, इसलिए संख्या हमेशा एक आगे की लिखी जाती है।
Tip: ‘षट्’ से ‘षड्वादनम्’ बना — यहाँ ट् का ड् हुआ। इसी तरह ‘चतुर्’ से चतुर्वादनम्, ‘नव’ से नववादनम्, ‘एकादश’ से एकादशवादनम्। संख्या का मूल रूप ही जोड़ना है।
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