दीपकम् अध्याय 6 योग्यताविस्तरः

अद्यतन2026-09-05

प्र1.
प्राचीनभारते जनाः समयनिर्देशार्थं सूर्यस्य गतिं पश्यन्ति स्म । तस्य कृते ते बहुविधस्य विज्ञानस्य आविष्करणं कृतवन्तः । तादृशानि विज्ञानयन्त्राणि सामान्यतः वयं प्रसिद्धेषु देवालयेषु पश्यामः । यथा ओडिशाराज्ये कोणार्कक्षेत्रे विद्यमाने सूर्यमन्दिरे चक्राणि सन्ति । — अस्य गद्यांशस्य हिन्दी-अनुवादं कुर्वन्तु ।
उत्तर

हिन्दी अनुवाद —

संस्कृतम्हिन्दी
प्राचीनभारते जनाः समयनिर्देशार्थं सूर्यस्य गतिं पश्यन्ति स्म ।प्राचीन भारत में लोग समय जानने (बताने) के लिए सूर्य की गति देखा करते थे।
तस्य कृते ते बहुविधस्य विज्ञानस्य आविष्करणं कृतवन्तः ।उसके लिए उन्होंने अनेक प्रकार के विज्ञान का आविष्कार किया।
तादृशानि विज्ञानयन्त्राणि सामान्यतः वयं प्रसिद्धेषु देवालयेषु पश्यामः ।वैसे वैज्ञानिक यन्त्र प्रायः हम प्रसिद्ध देव-मन्दिरों में देखते हैं।
यथा ओडिशाराज्ये कोणार्कक्षेत्रे विद्यमाने सूर्यमन्दिरे चक्राणि सन्ति ।जैसे ओडिशा राज्य के कोणार्क क्षेत्र में स्थित सूर्यमन्दिर में (पत्थर के) पहिये बने हैं।

व्याकरण-विवेचनम् (संस्कृतम्): ‘पश्यन्ति स्म’ — लट्-लकारेण सह ‘स्म’ इति अव्ययं योजितं चेत् भूतकालस्य अर्थः भवति (= देखा करते थे) । ‘समयनिर्देशार्थम्’ = समयनिर्देशाय, चतुर्थ्यर्थे तादर्थ्यम् । ‘कृतवन्तः’ इति क्तवतु-प्रत्ययान्तं भूतकालिकं रूपम् (पुंलिङ्ग, प्रथमा बहुवचन) । ‘देवालयेषु’, ‘सूर्यमन्दिरे’, ‘कोणार्कक्षेत्रे’ — अधिकरणे सप्तमी

यह अंश पाठ से क्यों जोड़ा गया: पूरा पाठ ‘कितने बजे’ पर चलता है — और यह पृष्ठ पूछता है कि घड़ी से पहले भारत में समय कैसे नापा जाता था। उत्तर है — सूर्य की छाया से। कोणार्क के सूर्यमन्दिर के पत्थर के पहिये असल में धूपघड़ी हैं; उनके आरे (spokes) और उन पर पड़ती छाया से समय पढ़ा जाता था। यानी विज्ञान मन्दिर की दीवार पर ही उकेरा हुआ था।
Did you know? ‘देवालयः’ = देव + आलय (दीर्घसन्धि) = देवता का घर, मन्दिर। ‘विद्यमाने’ का अर्थ है ‘जो विद्यमान है, स्थित है’ — यह शतृ/शानच्-प्रत्ययान्त रूप सप्तमी में है।
प्र2.
योग्यताविस्तरे प्रदत्तानां चित्राणां परिचयं लिखन्तु — सूर्यमन्दिरम् – कोणार्कः (ओडिशा), घटिकायन्त्रम् – जन्तरमन्तरं जयपुरम्, मिश्रयन्त्रम् – जन्तरमन्तरं देहली ।
उत्तर

पृष्ठ 76 पर चार चित्र हैं — दो कोणार्क के और दो जन्तर-मन्तर के।

चित्रम्स्थानम्किं दर्शयतिसमयेन सह सम्बन्धः
सूर्यमन्दिरम्कोणार्कः, ओडिशारथ के आकार का मन्दिर, जिसकी दीवारों पर विशाल पत्थर-चक्रचक्र के आरों पर पड़ती छाया से दिन का समय पढ़ा जाता था — प्रस्तर-सूर्यघटी
पत्थर का चक्रम्कोणार्कः, ओडिशाबारह जोड़े पहिये, हर पहिये में आरेपहिये स्वयं धूपघड़ी हैं; आरे समय के भागों को दर्शाते हैं
घटिकायन्त्रम्जन्तरमन्तरम्, जयपुरम्ढालू त्रिकोणाकार दीवार वाला विशाल सूर्यघटी-यन्त्रछाया की स्थिति से समय की सूक्ष्म गणना
मिश्रयन्त्रम्जन्तरमन्तरम्, देहलीकई यन्त्रों को मिलाकर बना एक ही ढाँचासमय के साथ-साथ दिन की लम्बाई तथा ग्रह-स्थिति भी बताता है

संस्कृतेन उत्तरम् — कोणार्कस्य सूर्यमन्दिरे प्रस्तरचक्राणि सूर्यघटिकारूपेण कार्यं कुर्वन्ति । जयपुरे देहल्यां च जन्तरमन्तरनामकेषु वेधशालासु घटिकायन्त्रं मिश्रयन्त्रं च विद्येते । (हिन्दी: कोणार्क के सूर्यमन्दिर में पत्थर के चक्र धूपघड़ी का काम करते हैं। जयपुर और दिल्ली की जन्तर-मन्तर नामक वेधशालाओं में घटिकायन्त्र तथा मिश्रयन्त्र हैं।)

‘घटिका’ शब्द से ही ‘घड़ी’ बना: प्राचीन भारत में समय की एक इकाई थी घटिका (लगभग २४ मिनट) — दिन-रात में ६० घटिकाएँ। जिस यन्त्र से यह नापी जाती थी, वह घटिकायन्त्रम्। हिन्दी का ‘घड़ी’ उसी का बचा हुआ रूप है। जन्तर-मन्तर की वेधशालाएँ महाराजा सवाई जयसिंह ने अठारहवीं शताब्दी में बनवाईं।
Tip: ‘यन्त्रम्’ नपुंसकलिङ्ग है, अतः बहुवचन ‘यन्त्राणि’ — पाठ में भी ‘घटीयन्त्राणि’, ‘विज्ञानयन्त्राणि’, ‘चक्राणि’ — तीनों नपुंसकलिङ्ग बहुवचन।
प्र3.
प्रातःस्मरणम् — कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती । करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम् ॥ भूमिवन्दना — समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले । विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे ॥ — अनयोः श्लोकयोः अन्वयं, हिन्दी-अर्थं, भावं च लिखन्तु ।
उत्तर

(१) प्रातःस्मरणम्

अन्वयः — कराग्रे लक्ष्मीः वसते, करमध्ये सरस्वती (वसते), करमूले तु गोविन्दः (वसति) ; (अतः) प्रभाते करदर्शनम् (कर्तव्यम्) ।

पदम्अर्थः
कराग्रेहाथ के अगले भाग में — उँगलियों के सिरे पर (सप्तमी एकवचन)
करमध्येहथेली के बीच में
करमूलेहाथ के मूल में — कलाई के पास
करदर्शनम्अपने हाथों को देखना

हिन्दी अर्थ — हाथ के अगले भाग में लक्ष्मी का वास है, हथेली के बीच में सरस्वती का और हाथ के मूल में गोविन्द (विष्णु) का; इसलिए सुबह उठते ही अपने हाथों के दर्शन करने चाहिए।

भावः — यह श्लोक कहता है कि जो कुछ पाना है, वह अपने ही हाथों में है — धन (लक्ष्मी), विद्या (सरस्वती) और सफलता का आशीर्वाद (गोविन्द)। बाहर किसी को खोजने से पहले दिन का आरम्भ अपने परिश्रम के साधन — अपने हाथ — को देखकर हो। यही कारण है कि यह पाठ की दिनचर्या के ठीक साथ रखा गया है : उठते ही पहला काम है करदर्शन, फिर भूमिवन्दन।

(२) भूमिवन्दना

अन्वयः — हे समुद्रवसने, पर्वतस्तनमण्डले, विष्णुपत्नि देवि ! तुभ्यं नमः (अस्तु) ; मे पादस्पर्शं क्षमस्व ।

पदम्अर्थः
समुद्रवसनेजिसका वस्त्र समुद्र है (सम्बोधन एकवचन, बहुव्रीहि)
पर्वतस्तनमण्डलेपर्वत ही जिसका वक्षःस्थल है
विष्णुपत्निहे विष्णु की पत्नी (भूदेवी) ! (सम्बोधन)
पादस्पर्शं क्षमस्व मेमेरे पैरों के स्पर्श को क्षमा करो (क्षम् धातु, लोट् मध्यमपुरुष एकवचन)

हिन्दी अर्थ — हे देवि ! समुद्र तुम्हारा वस्त्र है और पर्वत तुम्हारा वक्षःस्थल; हे विष्णुपत्नी (पृथ्वी) ! तुम्हें नमस्कार है — मेरे चरणों के स्पर्श के लिए मुझे क्षमा करो।

भावः — पृथ्वी को माता माना गया है, इसलिए सुबह बिस्तर से उतरकर पहला पैर रखने से पहले यह श्लोक बोला जाता है। इसमें पूरी पृथ्वी का चित्र एक ही पंक्ति में खींच दिया गया है — समुद्र उसका वस्त्र, पर्वत उसका शरीर। और भाव यह है कि जिस धरती पर हम चलते हैं, उसके प्रति भी विनय हो। पाठ का दूसरा चित्र इसी को दिखाता है — ‘प्रथमं भूमेः वन्दनं करोमि’।
अलङ्कारः: ‘समुद्रवसने’ और ‘पर्वतस्तनमण्डले’ में रूपक अलङ्कार है — समुद्र पर वस्त्र का और पर्वत पर शरीर का आरोप किया गया है। ‘करमध्ये सरस्वती’ में भी वही युक्ति है।
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